संस्कृतिकिताबें ‘बाबासाहेब: माई लाइफ विद डॉ. अंबेडकर’: देखभाल, साथ और सविता आंबेडकर का भुला दिया गया इतिहास

‘बाबासाहेब: माई लाइफ विद डॉ. अंबेडकर’: देखभाल, साथ और सविता आंबेडकर का भुला दिया गया इतिहास

वह बताती हैं कि इतिहास में उनकी भी एक जगह है; उस इतिहास में, जिसने अक्सर उनकी अपनी कहानी के उनके अपने संस्करण को स्वीकार करने से इनकार किया है। इस प्रकार, सविता अंबेडकर की विरासत को सिर्फ नए सिरे से परिभाषित नहीं करतीं बल्कि वह उसमें एक ऐसा अनूठा ताना-बाना और गहराई जोड़ती हैं, जो पहले कभी देखने को नहीं मिली थी।

डॉ. बी.आर. अंबेडकर के जीवन और काम पर लिखी गई ढेरों किताबों में उनकी पढ़ाई और राजनीति में योगदान की बात होती है। फिर भी, उनमें से ज़्यादातर किताबों में उस ‘देखभाल के श्रम’ का ज़िक्र नहीं किया गया है, जिसने उनके बौद्धिक कामों को बनाए रखा। ‘बाबासाहेब: माई लाइफ़ विद डॉ. अंबेडकर’ (2022) एक बेहद निजी और आत्मीय संस्मरण है, जिसे उनकी दूसरी पत्नी सविता अंबेडकर ने लिखा है; उन्हें प्यार से ‘माईसाहेब’ कहा जाता था। यह किताब उनके आपसी रिश्ते के साथ-साथ डॉ. अंबेडकर के जीवन के अंतिम सालों का भी दस्तावेज़ है, जब उनकी सेहत काफ़ी बिगड़ गई थी। ऐसा करते हुए, यह किताब उस चौबीसों घंटे की देखभाल, मेहनत और साथ का एक मार्मिक ब्योरा पेश करती है, जो उन्होंने डॉ. अंबेडकर की पत्नी बनने के बाद उन्हें दिया था। इसके अलावा, डॉ. अंबेडकर के साथ अपनी शादी पर विचार करते हुए, सविता ने उनके साथ अपने रिश्ते के ऐसे पहलुओं को भी सामने लाती हैं, जो कम चर्चा में आए हैं, और उस प्यार और देखभाल को सामने लाया है जिसने उनके जीवन के अंतिम वर्षों को संवारा था।

सविता आंबेडकर के संस्मरण

सविता अंबेडकर का जन्म साल 1909 में मुंबई में एक सारस्वत ब्राह्मण परिवार में हुआ था; तब उनका नाम शारदा कृष्णराव कबीर था। पेशे से वह एक डॉक्टर थीं। डॉ. अंबेडकर से उनकी पहली मुलाक़ात साल 1947 की शुरुआत में एस.एम. राव के घर पर हुई थी। राव भी एक डॉक्टर थे और मुंबई (तत्कालीन बंबई) में रहते थे। इसके तुरंत बाद, साल 1948 में दोनों ने शादी कर ली और साल 1956 में डॉ. अंबेडकर की असामयिक मृत्यु तक दोनों के बीच एक प्रेमपूर्ण और संतोषजनक रिश्ता बना रहा। यह पुस्तक उनकी आत्मकथा ‘डॉ. अंबेडकरंच्या सहवासात’ (1990) का अनुवाद है। इसका मूल मराठी से अनुवाद नदीम खान ने किया है और इसे साल 2022 में पेंगुइन इंडिया ने प्रकाशित किया है। इस पुस्तक में विशेष रूप से सविता अंबेडकर और डॉ. अंबेडकर के बीच लिखे गए कई ऐसे निजी पत्र शामिल हैं जो पहले कभी प्रकाशित नहीं हुए थे। इन पत्रों के माध्यम से पाठकों को डॉ. अंबेडकर के जीवन के अंतिम सालों यानी उनकी मृत्यु से पहले के समय की एक झलक देखने को मिलती है।

सविता की यादों के ज़रिए अंबेडकर का एक नया पहलू सामने आता है; एक ऐसा पहलू जो न केवल समाज के पूर्वाग्रहों और डर से, बल्कि ज़िंदगी की बेरहमी से भी बुरी तरह टूट चुका था। सविता की यह दिल को छू लेने वाली कहानी उनकी महानता को कम नहीं करती बल्कि उसे और भी गहरा बनाती है।

जहां एक ओर आम लोगों की यादों और लोकप्रिय संस्कृति ने मिलकर अंबेडकर के ज़बरदस्त राजनीतिक और बौद्धिक योगदानों को सबके सामने रखा है, वहीं सविता की आत्मकथा चुपके से उनके एक छिपे हुए, कोमल पहलू को उजागर करती है। यहां हम न केवल एक ऐसे इंसान से रूबरू होते हैं जिसने अकेले ही हर दिन अकल्पनीय भेदभाव और अन्याय का सामना किया, बल्कि एक ऐसे इंसान से भी मिलते हैं जिसने चुपचाप तकलीफ़ें सहीं। एक ऐसा इंसान जिसे कभी माँ का प्यार नहीं मिला, एक ऐसा इंसान जो अपनी पत्नी और अपने पांच में से चार बच्चों की मौत के बाद बीमार, कमज़ोर, अकेला और पूरी तरह से तन्हा रह गया था।

सविता की यादों के ज़रिए अंबेडकर का एक नया पहलू सामने आता है; एक ऐसा पहलू जो न केवल समाज के पूर्वाग्रहों और डर से, बल्कि ज़िंदगी की बेरहमी से भी बुरी तरह टूट चुका था। सविता की यह दिल को छू लेने वाली कहानी उनकी महानता को कम नहीं करती बल्कि उसे और भी गहरा बनाती है। उनकी इस कहानी के हर पन्ने पर डॉ. अंबेडकर के प्रति सम्मान और भरोसे का भाव झलकता है। उनका हर शब्द प्यार और आपसी आदर से भरा हुआ है। इस किताब में कोमलता की एक हल्की सी झलक मिलती है। अंबेडकर की जो छवि वह पेश करती हैं, उसमें उनका सार्वजनिक और निजी दोनों रूप एक साथ नज़र आते हैं। एक विशाल व्यक्तित्व और एक ऐसा इंसान जो अंदर से टूटा हुआ होने के बावजूद बेहद प्यार करने वाला था।

हालांकि, यह संस्मरण सविता के देखभाल, श्रम के लैंगिक स्वरूप और सार्वजनिक स्मृति और लोकप्रिय चर्चा से आसानी से गायब हो जाने को दिखाता है। यह काम अचानक या थोड़े समय के लिए नहीं है। यह निरंतर, मांग करने वाला और लगभग हमेशा अनदेखा रहता है, जो रोजमर्रा की जिंदगी में इस तरह शामिल हो जाता है कि इसका राजनीतिक और आर्थिक महत्व ही खत्म हो जाता है।

देखभाल, साथ और प्रेम का श्रम

नारीवादी दृष्टिकोण से देखने पर, इस संस्मरण के केंद्र में एक ऐसा श्रम नजर आता है, जो ज़रूरी होते हुए भी लगातार उपेक्षित रहता है और वह है देखभाल का दैनिक श्रम। जैसे-जैसे डॉ. अंबेडकर का स्वास्थ्य बिगड़ता गया, सविता ने उनकी देखभाल की भूमिका को पूरी तरह से निभाया। अंबेडकर के ‘बुद्ध और उनका धम्म’ पूरा करने में सविता की महत्वपूर्ण भूमिका थी, जैसाकि उन्होंने खुद पुस्तक की एक अप्रकाशित प्रस्तावना (1956) में स्वीकार किया था। हालांकि, यह संस्मरण सविता के देखभाल, श्रम के लैंगिक स्वरूप और सार्वजनिक स्मृति और लोकप्रिय चर्चा से आसानी से गायब हो जाने को दिखाता है। यह काम अचानक या थोड़े समय के लिए नहीं है।

यह निरंतर, मांग करने वाला और लगभग हमेशा अनदेखा रहता है, जो रोजमर्रा की जिंदगी में इस तरह शामिल हो जाता है कि इसका राजनीतिक और आर्थिक महत्व ही खत्म हो जाता है। आज जब हम डॉ. अंबेडकर के जीवन और उनके काम का जश्न मनाते हैं, तब भी उनके कामों को संभव बनाने में किए गए देखभाल के प्रयास स्पष्ट रूप से गायब हैं। इन अनुभवों को बयान करके, यह संस्मरण सूक्ष्म रूप से इतिहास लिखने और बताने के तरीकों को चुनौती देता है। यह उन बातों पर सवाल उठाता है, जिनपर अक्सर ज़ोर दिया जाता है और इस प्रक्रिया में उन बातों को उजागर करता है, जो अक्सर अनकही रह जाती हैं। देखभाल को हाशिए पर नहीं बल्कि केंद्रीय महत्व देते हुए, यह देखभाल श्रम के लिए उस स्थान को दोबारा पाता है जिसे इतिहास ने लंबे समय से अनदेखा कर दिया है।

सविता की इस आत्मकथा में सबसे खास बात उनकी चुपचाप और लगातार की गई देखभाल सामने आती है, जिसने डॉ. आंबेडकर के आखिरी सालों को तूलनामूलक रूप से शांत और कम तकलीफभरा बनाया। उनकी देखभाल किसी अमूर्त या भावुक अर्थ में नहीं की गई थी।

श्रद्धा और संदेह के बीच: सविता आंबेडकर का स्थान

सविता की इस आत्मकथा में सबसे खास बात उनकी चुपचाप और लगातार की गई देखभाल सामने आती है, जिसने डॉ. आंबेडकर के आखिरी सालों को तूलनामूलक रूप से शांत और कम तकलीफभरा बनाया। उनकी देखभाल किसी अमूर्त या भावुक अर्थ में नहीं की गई थी – यह बेहद थकाने वाली, अदृश्य और निस्संदेह शारीरिक मेहनत थी। जैसे-जैसे उनकी तबीयत बिगड़ती गई, सविता ही उनकी दवाइयों का ध्यान रखती थीं, उनकी दिनचर्या संभालती थीं और उन्हें लगातार भावनात्मक सहारा देती थीं। अंबेडकर के जीवन के आखिरी समय में उनके बौद्धिक और राजनीतिक योगदानों के लिए सविता का यह परिश्रम बेहद जरूरी था।

फिर भी, महिलाओं के किए जाने वाले देखभाल के अधिकांश कामों की तरह, उनके इस परिश्रम को भी अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता रहा है, और यह उनके पति के जीवन और काम की ओट में कहीं खो जाता है। रोज़मर्रा के जीवन में देखभाल किस तरह काम करती है– हाव-भाव, त्याग में और शांत अंतरंगता में, इस बात से पर्दा उठाकर, सविता का संस्मरण हमें इस बात पर दोबारा विचार करने के लिए विवश करता है कि हम देखभाल के श्रम को किस नज़रिए से देखते हैं। अपनी बेमिसाल और कोमल शैली में, वह हमसे यह आग्रह करती हैं कि हम न केवल अपनी उपलब्धियों पर ध्यान दें, बल्कि उन प्रयासों पर भी उतना ही ध्यान दें, जिनके बलबूते हमारी ये उपलब्धियां संभव हो पाती हैं।

सविता का संस्मरण हमें इस बात पर दोबारा विचार करने के लिए विवश करता है कि हम देखभाल के श्रम को किस नज़रिए से देखते हैं। अपनी बेमिसाल और कोमल शैली में, वह हमसे यह आग्रह करती हैं कि हम न केवल अपनी उपलब्धियों पर ध्यान दें, बल्कि उन प्रयासों पर भी उतना ही ध्यान दें, जिनके बलबूते हमारी ये उपलब्धियां संभव हो पाती हैं।

इतिहास से मिटाए जाने का चुपचाप विरोध

सविता की संस्मरण-गाथा इतिहास से उनके मिटाए जाने का चुपचाप विरोध करती है – यह केवल देखभाल का एक लेखा-जोखा भर नहीं है, बल्कि याद करने का एक काम भी है। इस तरह यह किताब घटनाओं को सिर्फ़ दोहराने से कहीं ज़्यादा करती है। यह उन घटनाओं से जुड़ी कहानियों में बड़ी नज़ाकत से, फिर भी तीखेपन के साथ हस्तक्षेप करती है और उनमें अपनी जगह को स्पष्ट करती है। उनकी यह कहानी हमेशा इस बात का ध्यान रखती है कि लोग उन्हें कैसे देखते हैं। इसमें उनके पति की हत्या के आरोप (जो उनके ब्राह्मण होने के आधार पर लगाए गए थे) से लेकर दलित-बौद्ध आंदोलन से उनके निष्कासन तक के सभी पहलू शामिल हैं।

इसके साथ ही, इसमें उनके सार्वजनिक जीवन में लौटने और उसमें उनका न्यायसंगत स्थान फिर से स्थापित होने तक की पूरी कहानी भी बताई गई है। इस नज़रिए से यह संस्मरण उनके जीवन की यादों से कहीं बढ़कर है। यह अपने खोए हुए स्थान को दोबारा पाने और अपनी उपस्थिति दर्ज कराने का एक सूक्ष्म और गरिमामय प्रयास है। यह इस बात पर उतनी ही कोमलता सेज़ोर देता है, जितनी कोमलता से वह अपने पति ‘राजा’ कहकर संबोधित किया करती थीं। वह बताती हैं कि इतिहास में उनकी भी एक जगह है; उस इतिहास में, जिसने अक्सर उनकी अपनी कहानी के उनके अपने संस्करण को स्वीकार करने से इनकार किया है। इस प्रकार, सविता अंबेडकर की विरासत को सिर्फ नए सिरे से परिभाषित नहीं करतीं बल्कि वह उसमें एक ऐसा अनूठा ताना-बाना और गहराई जोड़ती हैं, जो पहले कभी देखने को नहीं मिली थी।

सविता का लिखा पाठकों के तौर पर हमें जानबूझकर इस बात पर फिर से सोचने के लिए प्रेरित करता है कि हम न केवल डॉ. अंबेडकर को कैसे याद करते हैं, बल्कि उन लोगों की भी कैसी छवि बनाते हैं जो उनके साथ खड़े थे।

आखिर में, सविता का लिखा पाठकों के तौर पर हमें जानबूझकर इस बात पर फिर से सोचने के लिए प्रेरित करता है कि हम न केवल डॉ. अंबेडकर को कैसे याद करते हैं, बल्कि उन लोगों की भी कैसी छवि बनाते हैं जो उनके साथ खड़े थे। वे लोग जो दुर्भाग्य से लोकप्रिय कहानियों से नदारद हैं, लेकिन उस महान व्यक्तित्व के निर्माण में किसी भी अन्य व्यक्ति उतने ही ज़रूरी थे। यह संस्मरण उनकी विरासत को कमज़ोर करने की कोशिश नहीं करता; बल्कि, यह धीरे से हमारा ध्यान उस भूली-बिसरी दुनिया की ओर खींचता है, जिसने उस महान व्यक्ति के काम को आधार दिया, जिसके योगदान पर किसी चर्चा की ज़रूरत नहीं है। अपने लेखन के जरिए यह किताब हमें सविता और डॉ. अंबेडकर के रिश्ते के पर्दे के पीछे ले जाती है, और हमें उस लगातार देखभाल और समर्पण की झलक दिखाती है, जो एक ऐसे जीवन को गढ़ने में लगता है जिसका सार्वजनिक महत्व बहुत अधिक हो।

निष्कर्ष के तौर पर, यह किताब हमारे सामने एक ऐसा सवाल छोड़ जाती है, जो देखने में तो सीधा-सादा लगता है, लेकिन असल में बेहद राजनीतिक है। हम किसकी मेहनत को याद करना चुनते हैं, और इतिहास के पन्ने किसकी मेहनत को हवा में गायब हो जाने देते हैं? इसी उद्देश्य से, उन लोगों की आवाज़ों को केंद्र में लाकर, जिन्हें अक्सर महत्वहीन और हाशिए पर पड़ा हुआ माना जाता है, हम ‘देखभाल के श्रम’ की एक व्यापक समझ तक पहुंच सकते हैं, और इसके लैंगिक और अक्सर जाति-केंद्रित आयामों को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं। मेरा मानना ​​है कि सिर्फ तभी हम रोज़मर्रा के आर्थिक और राजनीतिक जीवन में इसके केंद्रीय महत्व को सही मायने में सराह पाएंगे।

संदर्भ:

  • अंबेडकर, बी. आर. (1956). “अप्रकाशित प्रस्तावना”. 24 मार्च 2026 को देखा गया. https://franpritchett.com/00ambedkar/ambedkar_buddha/00_pref_unpub.html
  • अंबेडकर, सविता. (2022). बाबासाहेब: डॉ. अंबेडकर के साथ मेरा जीवन. पेंगुइन बुक्स. 2022.

नोट: यह लेख मूल रूप से अभिजय रामबाबू ने लिखा था। इस लेख का अनुवाद मालविका धर ने किया है।

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