इंटरसेक्शनलLGBTQIA+ आखिर कब भारतीय सिनेमा ट्रांस समुदाय का चित्रण एक ‘ट्रोप’ की तरह करना बंद करेगा?

आखिर कब भारतीय सिनेमा ट्रांस समुदाय का चित्रण एक ‘ट्रोप’ की तरह करना बंद करेगा?

ट्रांस लोगों की कहानियां ज्यादातर वे लोग लिखते और निभाते हैं जो खुद ट्रांस समुदाय से नहीं होते हैं। जब असली अनुभव कहानी में शामिल ही नहीं होते, तो किरदार सतही और बनावटी लगते हैं। नतीजतन सिनेमा ट्रांस पहचान को जटिल मानवीय अनुभव के रूप में नहीं बल्कि पहले से तय किये हुए पैटर्न जैसे कॉमिक, खलनायक, पारंपरिक काम, सड़कों पर भीख मांगते हुए और विक्टिम के रूप में स्क्रीन पर दिखाए जाते हैं।

सिनेमा सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज की सोच और धारणाओं को गढ़ने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। जो हम पर्दे पर देखते हैं, वही धीरे-धीरे हमारी समझ और नजरिए का हिस्सा बन जाता है। खासकर भारत जैसे देश में, जहां सिनेमा का प्रभाव बहुत व्यापक है। फिल्में यह तय करने में भी भूमिका निभाती हैं कि समाज क्या सामान्य और क्या असामान्य मानता है। किसी वर्ग या जेंडर को बार-बार एक ही तरीके से दिखाने से वही छवि लोगों के मन में बैठ जाती है, जबकि संवेदनशील और बराबरी पर आधारित कहानियां सोच बदलने का काम करती हैं। भारतीय सिनेमा में ट्रांस समुदाय को ‘ट्रोप’ बना देने की समस्या सिर्फ फिल्मों तक ही नहीं है, बल्कि उस पूरे सामाजिक ढांचे की है जिसमें कहानियां लिखी और दिखाई जाती हैं। ट्रोप का मतलब है, किसी पहचान को बार-बार एक ही सीमित, स्टीरियोटाइप तरीके से दिखाना। ट्रांस समुदाय को सिनेमा ने अक्सर हंसी का पात्र, खलनायक या फिर सिर्फ दुखभरी ज़िंदगी जीने वाले किरदार के रूप में पेश किया है।

 भारतीय सिनेमा में ट्रांसजेन्डर समुदाय का रिप्रेज़ेंटेशन

भारतीय सिनेमा ट्रांसजेंडर लोगों को दिखाती तो है। लेकिन, इसमें समुदाय के लोगों का कोई नियंत्रण नहीं है। अमूमन मनोरंजन की दुनिया में ट्रांस समुदाय की कहानियों को गढ़ने वाले लोग खुद ट्रांस नहीं होते हैं। लेखक, निर्देशक और कलाकार ट्रांस समुदाय से नहीं होते। इसलिए, उनकी कहानियों में संवेदनशीलता और सच्चाई दोनों गायब होता है। इसी कारण ये किरदार इंसान की तरह नहीं, बल्कि एक तय किये गए ट्रोप बनकर सामने आते हैं। आउटलुक में छपी रिपोर्ट अनुसार ट्रांस लोगों की कहानियां ज्यादातर वे लोग लिखते और निभाते हैं जो खुद ट्रांस समुदाय से नहीं होते हैं। जब असली अनुभव कहानी में शामिल ही नहीं होते, तो किरदार सतही और बनावटी लगते हैं। नतीजतन सिनेमा ट्रांस पहचान को जटिल मानवीय अनुभव के रूप में नहीं बल्कि पहले से तय किये हुए पैटर्न जैसे कॉमिक, खलनायक, पारंपरिक काम, सड़कों पर भीख मांगते हुए और विक्टिम के रूप में स्क्रीन पर दिखाए जाते हैं।

ज़्यादातर फिल्में ऐसे नजरिए से लिखी जाती हैं, जो सिर्फ ‘पुरुष’ और ‘महिला’ को जेंडर के तौर पर सामान्य माना जाता है। इस सोच में ट्रांस किरदार फिट नहीं बैठते। उनकी अपनी इच्छाएं, रिश्ते, काम और रोज़मर्रा की ज़िंदगी बहुत कम दिखाई जाती है। अक्सर उन्हें सिर्फ दर्शकों में सहानुभूति, डर या हंसी पैदा करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

जैसे, चर्चित फिल्म अमर अकबर एंथोनी के गीत ‘तैयब अली प्यार का दुश्मन’ और कुंवारा बाप फिल्म के गाने ‘साज राही गली मेरी माँ’ जैसे ऑल टाइम चार्टबस्टर्स में ट्रांसजेन्डर व्यक्तियों के समूह गाने बजाने का काम करते हैं, जो समाज के हाशियेकरण के कारण वे करने पर मजबूर होते हैं और मुख्यधारा से गायब हो जाते हैं। मस्ती जैसी फिल्मों में ट्रांसजेंडर पात्रों का इस्तेमाल कॉमेडी के लिए किया जाता है, जहां उन्हें ऐसे तरीके से पेश किया जाता है कि वे दर्शकों के लिए हंसी का विषय भर बनकर रह जाते है। अक्सर उनकी लैंगिक पहचान का मज़ाक उड़ाकर और उसे असामान्य दिखाकर, उनके चित्रण में संवेदनशीलता और यथार्थ की बजाय फूहड़ता और स्टीरियोटाइप दिखाया जाता है। वहीं संघर्ष और लक्ष्मी जैसी फिल्मों में ट्रांस किरदार को डर, अलौकिकता या फिर खलनायकी से जोड़ कर दिखाया गया। आम तौर पर जब किसी समुदाय की कहानी पर उसका खुद का नियंत्रण नहीं होता, तो वह सही मायने में प्रतिनिधित्व नहीं रहता, बल्कि दूसरों की बनाई गई प्रस्तुति बन जाती है। सिनेमा समाज का आईना है, लेकिन ट्रांस समुदाय के मामले में यह आईना अभी भी पुरानी और रूढ़िवादी छवि ही दिखाता है।

भारतीय सिनेमा में हेटेरोनॉर्मेटिव नैरेटिव का बोलबाला

दूसरी बड़ी समस्या कहानियों में नैरेटिव की है। ज़्यादातर फिल्में ऐसे नजरिए से लिखी जाती हैं, जो सिर्फ ‘पुरुष’ और ‘महिला’ को जेंडर के तौर पर सामान्य माना जाता है। इस सोच में ट्रांस किरदार फिट नहीं बैठते। उनकी अपनी इच्छाएं, रिश्ते, काम और रोज़मर्रा की ज़िंदगी बहुत कम दिखाई जाती है। अक्सर उन्हें सिर्फ दर्शकों में सहानुभूति, डर या हंसी पैदा करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। जैसे, मेड इन हेवन-2 सीरीज़ में मेहर, एक ट्रांस महिला, के ज़रिए समावेशी समाज दिखाने की कोशिश की गई है, जहां ट्रांस लोगों के लिए सामान्य जीवन और नौकरी पाना चुनौती है। लेकिन कहानी जल्द ही उनकी बॉडी इमेज और डेटिंग समस्याओं तक सीमित रह जाती है। मेहर को दोस्तों के बीच मज़ाक का पात्र बनाया जाता है और उसे रिश्तों में भी अस्वीकार किया जाता है। इसके बीच ट्रांस समुदाय की रोज़मर्रा की विभिन्न समस्याएं जैसे सामाजिक बहिष्कार, अवसरों की कमी और संस्थागत जिम्मेदारी कहीं चर्चा में नहीं आतीं।

आउटलुक में प्रकाशित रिपोर्ट बताती है कि जेंडर परफॉर्मेटिविटी का गलत इस्तेमाल भी एक बड़ी समस्या है। फिल्मों में जेंडर को अक्सर सिर्फ कपड़ों, आवाज़ और हाव-भाव के जरिए एक्ट करने तक सीमित कर दिया जाता है। इससे ट्रांस पहचान एक असली जीवन अनुभव के बजाय एक परफॉर्मेंस बन जाती है, जिसे कोई भी अभिनेता थोड़े समय के लिए निभा सकता है।

हेटेरोनॉर्मेटिव मानसिकता तब भी देखने को मिलती है जब फिल्में ट्रांस समुदाय का मतलब सिर्फ ‘ट्रांस महिला’ समझती है। आउटलुक में छपी एक रिपोर्ट अनुसार भारतीय सिनेमा में ट्रांस कहानियों का बड़ा हिस्सा ट्रांस महिलाओं तक ही सीमित है। ट्रांस पुरुषों की कहानियां बहुत कम दिखाई देती हैं। इसका एक कारण यह हो सकता है कि समाज अभी भी ट्रांसमैन के पहचान और अनुभव को कम स्वीकार करता है, और उनके बारे में कहानियां भी कम सामने आती हैं। हालांकि कुछ नई फिल्में जैसे शुभ मंगल ज़्यादा सावधान और हाल की रिलीज हुई एक्यूज्ड सेम सेक्स प्रेम और रिश्तों को दिखाने की कोशिश करती हैं, फिर भी मुख्यधारा का सिनेमा अब तक ट्रांस जीवन को एक सामान्य मानवीय अनुभव की तरह नहीं दिखा पाया है। इसलिए फिल्में अमूमन समुदाय के समस्याओं के बजाय पूरे समुदाय को ही एक समस्या या मुद्दा बनाकर पेश करती है। हालांकि इसके पीछे बाज़ार और लोकप्रियता की राजनीति भी काम करती है। स्टीरियोटाइप किरदार लोगों को जल्दी समझ में आते हैं और आसानी से बिकते हैं। इसलिए, फिल्म निर्माता नई और सच्ची कहानियां दिखाने के बजाय पुराने ट्रोप को ही बार-बार दोहराते हैं।  

सिनेमा में क्रॉस ड्रेसिंग और जेंडर परफॉर्मेटिविटी का गलत इस्तेमाल

आउटलुक में प्रकाशित रिपोर्ट बताती है कि जेंडर परफॉर्मेटिविटी का गलत इस्तेमाल भी एक बड़ी समस्या है। फिल्मों में जेंडर को अक्सर सिर्फ कपड़ों, आवाज़ और हाव-भाव के जरिए एक्ट करने तक सीमित कर दिया जाता है। इससे ट्रांस पहचान एक असली जीवन अनुभव के बजाय एक परफॉर्मेंस बन जाती है, जिसे कोई भी अभिनेता थोड़े समय के लिए निभा सकता है। इसी वजह से बड़े सितारे ट्रांस किरदार निभाकर प्रशंसा और पुरस्कार तो पा लेते हैं, लेकिन ट्रांस समुदाय की असली ज़िंदगी और संघर्ष पीछे रह जाते हैं। कई फिल्मों और कॉमेडी शो में यह साफ दिखता है। जैसे कॉमेडी विद कपिल में सुनील ग्रोवर या फिल्मों में ऋषि कपूर, अमिताभ बच्चन, आमिर खान और शाहरुख खान का क्रॉस-ड्रेसिंग करना। ऐसे चित्रण में ट्रांस पहचान को अक्सर कॉमेडी के रूप में दिखाया जाता है जहां बात उनके स्त्रीत्व तक खत्म हो जाती है जिसे कमज़ोरी बनाकर पेश किया जाता है।

सिनेमा की पहुंच और प्रभाव अत्यंत व्यापक है। यह लोगों की सोच बदलने और समाज पर असर डालने की अपार क्षमता रखता है। फिर भी, ट्रांसजेंडर समुदाय की वास्तविक चुनौतियों पर सवाल उठाने या सत्ता-संरचनाओं को चुनौती देने के बजाय, सिनेमा ने ऐतिहासिक रूप से इस समुदाय को केवल एक रूढ़िवादी प्रतीक के रूप में ही दिखाया और उन्हें सामाजिक विमर्श में सिर्फ  पात्रों तक सीमित कर दिया।

भारतीय सिनेमा लंबे समय से ट्रांस समुदाय को सही तरीके से समझने में असफल रहा है। अक्सर सिनेमा उनके जटिल और वास्तविक जीवन को सामने नहीं ला पाते। हालांकि हाल के समय में कुछ बदलाव दिखे हैं, जैसे ताली और सुपर डीलक्स जैसी फिल्में हुई, जहां ट्रांस किरदारों को थोड़ी संवेदनशीलता से दिखाया गया है। लेकिन, ये किरदार भी कोई ट्रांस व्यक्ति नहीं बल्कि सिस जेंडर कलाकार ही निभाते हैं। असल में, ट्रांसजेंडर समुदाय की चुनौतियां उनका सिर्फ ट्रैफिक सिग्नल पर भीख मांगने, जबरन सेक्स वर्क करने या जन्म के अवसरों पर बधाई देने तक सीमित नहीं हैं। ये समस्याएं किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरे समुदाय की हैं। इनमें शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार, सुरक्षा, पहचान और यौनिकता से जुड़े कई गंभीर मुद्दे शामिल हैं, जो उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी को गहराई से प्रभावित करते हैं। सिनेमा की पहुंच और प्रभाव अत्यंत व्यापक है। यह लोगों की सोच बदलने और समाज पर असर डालने की अपार क्षमता रखता है। फिर भी, ट्रांसजेंडर समुदाय की वास्तविक चुनौतियों पर सवाल उठाने या सत्ता-संरचनाओं को चुनौती देने के बजाय, सिनेमा ने ऐतिहासिक रूप से इस समुदाय को केवल एक रूढ़िवादी प्रतीक के रूप में ही दिखाया और उन्हें सामाजिक विमर्श में सिर्फ पात्रों तक सीमित कर दिया।

ट्रांस समुदाय की असल समस्याएं

टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2011 की जनगणना में भारत में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की संख्या 4,87,803 दर्ज की गई थी। लेकिन माना जाता है कि वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक है। कुछ कार्यकर्ताओं के अनुसार यह 6–7 गुना तक हो सकती है। इसका एक कारण यह भी है कि कई लोग अपनी लैंगिक पहचान सार्वजनिक नहीं करते या उनके पास ऐसे आधिकारिक दस्तावेज नहीं होते जो उनकी सही पहचान को दिखा सकें। पहचान से जुड़ी समस्याएं, सामाजिक कलंक और शिक्षा तक सीमित पहुंच, ट्रांसजेंडर लोगों को औपचारिक नौकरियों से दूर कर देती हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अनुसार, लगभग 50 फीसद ट्रांसजेंडर व्यक्ति कभी स्कूल नहीं जाते, और केवल 6 फीसद ही औपचारिक क्षेत्र में काम कर पाते हैं। ज्यादातर लोग आजीविका के लिए भीख मांगना या सेक्स वर्क जैसे अनौपचारिक कामों पर निर्भर रहते हैं। उच्च शिक्षा में उनकी भागीदारी बहुत कम है। देश में ट्रांस शिक्षकों की संख्या 0.01 फीसद से भी कम बताई जाती है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, उच्च शिक्षण संस्थानों के स्टाफ में भी उनकी मौजूदगी लगभग न के बराबर है।

आउटलुक में छपी रिपोर्ट अनुसार ट्रांस लोगों की कहानियां ज्यादातर वे लोग लिखते और निभाते हैं जो खुद ट्रांस समुदाय से नहीं होते हैं। जब असली अनुभव कहानी में शामिल ही नहीं होते, तो किरदार सतही और बनावटी लगते हैं।

इन परिस्थितियों का असर उनकी जिंदगी पर गहराई से पड़ता है। बिजनेस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रांसजेंडर समुदाय में आत्महत्या से मौत की कोशिश का प्रतिशत 32 फीसद से 50 फीसद तक है। इसके पीछे सामाजिक अस्वीकृति, भेदभाव, हिंसा, आर्थिक कठिनाइयां और संस्थागत अनदेखी या हिंसा और उपेक्षा जैसे कारण शामिल हैं। यह असमानता सिर्फ शिक्षा और रोजगार तक सीमित नहीं है, बल्कि फिल्म इंडस्ट्री में भी दिखाई देती है, जहां ट्रांस लोगों की मौजूदगी लगभग नहीं है। भारतीय सिनेमा ने लंबे समय तक ट्रांसजेंडर समुदाय को केवल ट्रोप, मजाक या खलनायक के रूप में ही पेश किया है, जिससे उनकी वास्तविक ज़िंदगी, संघर्ष और जटिल अनुभव सामने नहीं आ पाए। मुख्यधारा की फिल्में अभी भी ट्रांस अनुभव को पूर्ण मानव अनुभव की तरह नहीं दिखा पातीं। वहीं, समाज में मौजूद असमानताएं और सामाजिक स्वीकृति की कमी सिनेमा में उनके सही प्रतिनिधित्व को और मुश्किल बना देती हैं। ऐसे में सिनेमा की जिम्मेदारी है कि वह ट्रांस समुदाय की कहानियों को संवेदनशीलता, सच्चाई और विविधता के साथ दिखाए ताकि वास्तविक अनुभव और इंसानियत पर ध्यान दिया जा सके।

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