भारतीय समाज का एक बड़ा हिस्सा बनाने वाले दलित समुदाय को हमेशा से ही देश में जाति-आधारित भेदभाव का सामना करना पड़ा है। उन्हें समाज के छोटे से छोटे समारोहों में भी भाग लेने की अनुमति नहीं दी जाती थी और वे ज्यादातर अवांछनीय काम करने तक ही सीमित थे। कुछ कथित दलित नायकों के माध्यम से ही संभव हो पाया, जिन्होंने यह सुनिश्चित करने के लिए संघर्ष किया कि दलित समुदाय के व्यक्तियों को भी उनका अधिकार मिल सकें। इसके लिए कई आंदोलन हुए, हालांकि भारतीय समाज में जब भी जाति के आधार पर भेदभाव के खिलाफ संघर्ष और आंदोलनों की बात आती है, तो अक्सर डॉ. भीमराव आंबेडकर, ज्योतिराव फुले और पेरियार जैसे महान व्यक्तियों के नाम ही सामने आते हैं।
लेकिन दलित आंदोलन केवल इन बड़े नामों तक ही सीमित नहीं रहा है। इस आंदोलन को आगे बढ़ाने में कई ऐसे नायक और नायिकाओं का योगदान रहा है, जिनके नाम और पहचान को मुख्यधारा के इतिहास में बहुत कम जगह मिल पाई। यह नायक निरंतर दलितों के सम्मान, शिक्षा, आजादी की लड़ाई और सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष करते रहे। इतिहास के हाशिए पर छूट गई इन आवाज़ों को सामने लाना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि इनके बिना दलित आंदोलन की पूरी तस्वीर और आजादी की लड़ाई के लिए किया गया संघर्ष बिल्कुल अधूरा है। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान समाज के हर वर्ग ने सामाजिक और राजनीतिक मुक्ति को एक साथ लाने का प्रयास किया।
झलकारी बाई
कोरी (दलित) समुदाय से ताल्लुक रखने वाली झलकारी बाई का जन्म 22 नवंबर 1830 को झांसी के पास भोजला गाँव में किसान सडोवा सिंह और उनकी पत्नी जमुनादेवी के घर हुआ था। वह लक्ष्मीबाई से काफी मिलती-जुलती थीं और इसी वजह से उन्हें झांसी सेना की महिला रेजिमेंट में भर्ती किया गया था।वह रानी लक्ष्मीबाई की सलाहकार थी और इसके साथ ही वह एक प्रसिद्ध महिला सैनिक थीं, उन्होंने साल 1857 के भारतीय विद्रोह में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। रानी की सेना में, वह जल्दी ही पदोन्नति पाकर अपनी सेना की कमान संभालने लगीं। साल 1857 के विद्रोह के दौरान, जनरल ह्यू रोज़ ने एक विशाल सेना के साथ झांसी पर हमला किया। लेकिन रानी ने अपने 14,000 सैनिकों के साथ सेना का सामना किया और उन्होंने कालपी में डेरा डाले पेशवा नाना साहब की सेना से मदद की प्रतीक्षा की , लेकिन उन्हें कोई मदद नहीं मिली।
क्योंकि जनरल रोज़ ने तांतिया टोपे को पहले ही हरा दिया था। इस बीच, ठाकुर समुदाय के दुल्हाजी, जो किले के एक द्वार के प्रभारी थे, उन्होंने हमलावरों के साथ समझौता कर लिया और ब्रिटिश सेना के लिए झांसी के द्वार खोल दिए। जब अंग्रेजों ने किले पर हमला किया, तो लक्ष्मीबाई ने अपने दरबारी की सलाह पर अपने बेटे और सेवकों के साथ कालपी चली गई। लक्ष्मीबाई के भागने की खबर सुनकर, झलकारी बाई भेष बदलकर जनरल रोज़ के शिविर की ओर चल पड़ीं और खुद को रानी घोषित कर दिया और रानी की जगह ब्रिटिश सेना के सामने लड़ाई लड़ी। हालांकि उनकी वीरता को इतिहास में वह स्थान नहीं मिला, जिसकी वह हकदार थीं।
भारतीय समाज में जब भी जाति के आधार पर भेदभाव के खिलाफ संघर्ष और आंदोलनों की बात आती है, तो अक्सर डॉ. भीमराव आंबेडकर, ज्योतिराव फुले और पेरियार जैसे महान व्यक्तियों के नाम ही सामने आते हैं। इस आंदोलन को आगे बढ़ाने में कई ऐसे नायक और नायिकाओं का योगदान रहा है, जिनके नाम और पहचान को मुख्यधारा के इतिहास में बहुत कम जगह मिल पाई।
नंगेली
नंगेली 19वीं सदी की भारतीय इतिहास की उन साहसी महिलाओं में से एक मानी जाती हैं, जिनकी कहानी लंबे समय तक मुख्यधारा के इतिहास में जगह नहीं पा सकी, लेकिन लोकस्मृतियों और कथाओं में आज भी उन्हें याद किया जाता है। वह केरल के त्रावणकोर राज्य में एझावा दलित समुदाय से संबंधित थीं। उनके समुदाय के व्यक्तियों खासकर महिलाओं को उस समय कठोर जातिगत नियमों और अपमानजनक प्रथाओं का सामना करना पड़ता था। उस दौर में त्रावणकोर में ब्रेस्ट टेक्स की प्रथा बहुत प्रचलित और दलित समुदाय की महिलाएं ब्लाउज़ नहीं पहन सकती थीं। अपनी ब्रेस्ट को ढकने के लिए दलित समुदाय की महिलाओं को कर देना पड़ता था। यह एक जातिगत और आर्थिक शोषण ही नहीं था, बल्कि रूढ़िवादी मानसिकता वाले समाज मे दलित महिलाओं के शरीर पर नियंत्रण का एक उदाहरण था।
नंगेली और उनके पति चिरुकंदन ताड़ी निकालने का काम करते थे। एक दिन त्रावणकोर के एक अधिकारी उनके घर आए, ताकि उन पर लगाया गया ब्रेस्ट टैक्स वसूला जा सके। लेकिन नंगेली ने इस अन्याय और हिंसा के खिलाफ विरोध किया।लेकिन फिर भी जब वो अधिकारी नहीं माने तो उन्होंने अपनी ब्रेस्ट काटकर और केले के पत्ते में रखकर उन्हें भेंट कर दी। इसके बाद अधिक रक्तस्राव के कारण उनकी मृत्यु हो गई। यह दृश्य देखकर उनके पति चिरुकंदन गहरे दुख में डूब गए और उन्होंने उनकी चिता में कूदकर अपनी जान दे दी। इसके बाद वहां के लोगों ने विद्रोह किया और कहा जाता है कि इसके बाद त्रावणकोर में ब्रेस्ट टैक्स की प्रथा जल्द ही खत्म कर दी गई। जिस स्थान पर नंगेली रहती थीं, उसे बाद में “मुलाचीपरंबु” कहा जाने लगा यानी ‘स्तनों वाली महिला की भूमि’। यह स्थान आज केरल के चेरथला क्षेत्र में स्थित माना जाता है।
महिलाओं को उस समय कठोर जातिगत नियमों और अपमानजनक प्रथाओं का सामना करना पड़ता था। उस दौर में त्रावणकोर में ब्रेस्ट टेक्स की प्रथा बहुत प्रचलित और दलित समुदाय की महिलाएं ब्लाउज़ नहीं पहन सकती थीं। अपनी ब्रेस्ट को ढकने के लिए दलित समुदाय की महिलाओं को कर देना पड़ता था।
अय्यंकाली
अय्यंकाली का जन्म साल 1863 में त्रिवेंद्रम के वेंगुर में हुआ था। वे पुलैया (दलित) समुदाय से थे। उस समय के अन्य दलित व्यक्तियों की तरह अय्यंकाली भी पढ़-लिख नहीं पाए थे। उस दौर में दलितों को सार्वजनिक सड़कों पर चलने तक की अनुमति नहीं थी। ऐसे में अय्यंकाली ने वेंगुर की सड़कों पर बैलगाड़ी में सफर किया। ये बैलगाड़ियां, जिन्हें ‘विल्लुवंडी’ कहा जाता था, आमतौर पर शहर के अमीर युवाओं को ले जाती थीं, जिनमें ज़्यादातर कथित स्वर्ण नायर ज़मींदार होते थे। सफेद कमीज़, सफेद मुंडू और सफेद पगड़ी पहनकर विल्लुवंडी पर बैठे ये लोग खुद को बहुत श्रेष्ठ समझते थे। वे अपने से कथित नीचे माने जाने वाले लोगों पर नज़र रखते और अपने अधिकार व रौब को दिखाने की कोशिश करते थे। अय्यंकाली ने कई लोगों को संगठित किया और पुथेम बाजार तक ‘स्वतंत्रता मार्च’ निकाला। इस कृत्य से उच्च जाति के लोग क्रोधित हो गए और दंगा भड़क गया जिसमें कई लोग घायल हो गए। लेकिन इस पूरी घटना ने उच्च जातियों को स्पष्ट रूप से झकझोर दिया था।
साल 1904 में , अय्यंकाली के नेतृत्व में एक विद्यालय का निर्माण किया गया, क्योंकि उस समय दलित समुदाय के लोगों को शिक्षा से वंचित रखा जाता था। लेकिन जल्द ही उच्च जाति के लोगों ने इसे नष्ट कर दिया। इसी के चलते केरल में पहली बार मजदूरों की हड़ताल हुई। कथित स्वर्ण समुदाय के लोगों ने मजदूरों को हड़ताल से रोकने के लिए बल प्रयोग और विभिन्न तरीकों का इस्तेमाल करने की कोशिश की और उनका मानना था कि हड़ताल ज्यादा देर तक नहीं चलेगी क्योंकि प्रदर्शनकारियों का भोजन खत्म हो जाएगा। उन्होंने मछुआरा समुदाय की मदद से यह सुनिश्चित किया कि मजदूर भूखे न मरें । आखिरकार जमींदारों को झुकना पड़ा और उन्होंने मजदूरी बढ़ाने, शिक्षा और यात्रा की अनुमति देने की मांगों को स्वीकार कर लिया।
अय्यंकाली ने वेंगुर की सड़कों पर बैलगाड़ी में सफर किया। ये बैलगाड़ियां, जिन्हें ‘विल्लुवंडी’ कहा जाता था, आमतौर पर शहर के अमीर युवाओं को ले जाती थीं, जिनमें ज़्यादातर कथित स्वर्ण नायर ज़मींदार होते थे। वे अपने से कथित नीचे माने जाने वाले लोगों पर नज़र रखते और अपने अधिकार व रौब को दिखाने की कोशिश करते थे।
दक्षायनी वेलायुधन
दक्षायनी वेलायुधन का जन्म 15 जुलाई 1912 को वर्तमान एर्नाकुलम जिले के एक छोटे से द्वीप मुलावुकाड में हुआ था। वे पुलैया समुदाय से थी, इस समुदाय के अधिकांश लोग कृषि श्रमिकों के रूप में कम वेतन पर काम करते थे और उन्हें कई प्रकार के अपमानों का सामना करना पड़ता था, जिसमें सार्वजनिक रूप से समाज के लोगों के उपयोग पर प्रतिबंध, कथित उच्च जाति के लोगों से एक निश्चित दूरी बनाए रखना और महिलाओं को उनके शरीर के ऊपरी हिस्सों से किसी भी तरह के कपड़े पहनने पर रोक शामिल थी।
वह केरल की पहली दलित महिला थीं, जिन्होंने स्कूल की अंतिम परीक्षा उत्तीर्ण की और अनुसूचित जाति की पहली महिला स्नातक थीं।वेलायुधन को अपने परिवार के सदस्यों से उच्च जाति के विरोधियों के विरुद्ध सविनय अवज्ञा बूथों में सक्रिय भागीदारी से प्रेरित सक्रिय राजनीति में प्रवेश करने की प्रेरणा मिली।कांग्रेस और इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी दोनों की ओर से प्रशिक्षण, बार-बार लैंगिक भेदभाव हुआ। इसके साथ ही संविधान सभा में उनके नामांकन का विरोध करते हुए कांग्रेस के उच्च कमान ने डाक-पत्र भेजे। इन सबके बावजूद,साल 1945 में उन्हें कोचीन विधान परिषद में भी मनोनीत किया गया।इसके अलावा 34 वर्ष की आयु में, वह संविधान सभा की सबसे कम उम्र की और दलित महिला सदस्य थीं।
वह केरल की पहली दलित महिला थीं, जिन्होंने स्कूल की अंतिम परीक्षा उत्तीर्ण की और अनुसूचित जाति की पहली महिला स्नातक थीं।वेलायुधन को अपने परिवार के सदस्यों से उच्च जाति के विरोधियों के विरुद्ध सविनय अवज्ञा बूथों में सक्रिय भागीदारी से प्रेरित सक्रिय राजनीति में प्रवेश करने की प्रेरणा मिली।कांग्रेस और इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी दोनों की ओर से प्रशिक्षण, बार-बार लैंगिक भेदभाव हुआ।
मंगू राम
मंगू राम जिन्हें लोकप्रिय रूप से बाबू मंगू राम चौधरी के नाम से जाना जाता है। शुरुआत में उनको को सात साल की उम्र तक एक ग्राम संत (साधु) ने पढ़ाया। उन्होंने मुगोवाल क्षेत्र और देहरादून के विद्यालयों में शिक्षा प्राप्त की । अधिकांश विद्यालयों में मंगु राम एकमात्र दलित छात्र थे। उन्हें कक्षा के पीछे या अलग कमरे में बैठने के लिए मजबूर किया जाता था और उन्हें खुले दरवाजे से सुनना पड़ता था। जब उन्होंने बाजवारा के उच्च विद्यालय में दाखिला लिया, तो उन्हें भवन के बाहर रहने के लिए मजबूर किया गया और उन्हें खिड़कियों से कक्षाएं सुननी पड़ती थीं। एक बार जब वे भारी ओलावृष्टि के दौरान अंदर आए, तो ब्राह्मण शिक्षक ने उन्हें पीटा और कक्षा के सभी फर्नीचर, जिन्हें उन्होंने अपनी उपस्थिति से ‘अपवित्र’ कर दिया था, उनको बारिश में बाहर रख दिया ताकि उन्हें शाब्दिक और विधिपूर्वक धोया जा सके।जबकि अन्य विद्यार्थियों को पटवारी बनने या उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता था और उन्हें स्कूल छोड़ने और अपने पिता को अधिक उचित “चमड़े का काम करने” में मदद करने के लिए प्रोत्साहित किया गया।
उनके पिता ने बेहतर संभावनाओं के लिए अपने उन्हें कैलिफोर्निया भेज दिया। हालांकि,उन्होंने ने अमेरिका से लौटने का फैसला किया और जातिगत भेदभाव और अस्पृश्यता के खिलाफ एक आंदोलन शुरू किया।इस आंदोलन की स्थापना ब्राह्मणवादी समाज के विरुद्ध एक आवाज थी जिसने दलितों को सामाजिक संरचना में सबसे निचले पायदान पर रखा था। दलित आंदोलन की कहानी केवल कुछ प्रसिद्ध नामों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन असंख्य अनदेखे और अनसुने नायकों और नायिकाओं के संघर्षों से बनी है, जिन्होंने अपने साहस, प्रतिरोध और त्याग से सामाजिक बदलाव की नींव रखी। झलकारी बाई की वीरता, नंगेली का आत्मबलिदान, अय्यंकाली का संगठित संघर्ष, दक्षायनी वेलायुधन की राजनीतिक भागीदारी और मंगू राम का सामाजिक आंदोलन ये सभी उदाहरण इस बात को स्पष्ट करते हैं कि न्याय और समानता की लड़ाई कई स्तरों पर, कई आवाज़ों के माध्यम से लड़ी गई है।इसलिए, दलित आंदोलन के बारे में समझने के लिए जरूरी है कि हम इन आवाज़ों को पहचानें, उन्हें याद रखें और उनके संघर्षों से प्रेरणा लेते हुए एक अधिक न्यायपूर्ण और समान समाज के निर्माण की दिशा में आगे बढ़ें।

