समाजपरिवार बराबरी के दावों के बीच महिलाओं पर काम का अदृश्य बोझ और मानसिक थकान

बराबरी के दावों के बीच महिलाओं पर काम का अदृश्य बोझ और मानसिक थकान

आज भी ज्यादातर घरों में घरेलू जिम्मेदारियों का बोझ महिलाओं पर ही होता है, उनसे यह उम्मीद की जाती है कि वे घर का हर काम बिना थके और बिना शिकायत के करती रहें। यह सब इतना आम हो चुका है कि लोग इसे समस्या मानते ही नहीं हैं। लेकिन असल में यही जिम्मेदारियां धीरे-धीरे महिलाओं के ऊपर एक ऐसा अदृश्य बोझ बना देती हैं, जो उनके मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करता है।

आज के समय में हम हर जगह बराबरी की बात करते हैं। यह भी कहा जाता है कि लड़कियां अब पढ़ाई लिखाई कर रही हैं और अपने सपनों को पूरा कर रही हैं। लेकिन अगर हम अपने आस-पास के समाज को ध्यान से देखें, तो असलियत कुछ और ही दिखाई देती है। आज भी ज्यादातर घरों में घरेलू जिम्मेदारियों का बोझ महिलाओं के ऊपर ही होता है। उनसे यह उम्मीद की जाती है कि वे घर का हर काम बिना थके और बिना शिकायत के करती रहें। यह सब इतना आम हो चुका है कि लोग इसे समस्या मानते ही नहीं हैं।

लेकिन असल में यही जिम्मेदारियां धीरे-धीरे महिलाओं के ऊपर एक ऐसा अदृश्य बोझ बना देती हैं, जो उनके मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करता है, जब हम घरेलू काम की बात करते हैं, तो अक्सर हमें वही काम याद आते हैं जो बाहर से दिखाई देते हैं, जैसे खाना बनाना, सफाई करना, कपड़े धोना। लेकिन असल में जिम्मेदारियां इससे कहीं ज्यादा होती हैं। घर की हर छोटी-बड़ी चीज़ का ध्यान रखना, कौन क्या खाएगा, किसे क्या चाहिए, बच्चों की पढ़ाई, बुजुर्गों की देखभाल। ये सब बातें लगातार महिलाओं के दिमाग में चलती रहती हैं। यही वजह है कि महिलाएं सिर्फ शारीरिक रूप से ही नहीं, बल्कि मानसिक रूप से भी थक जाती हैं। 

आज भी ज्यादातर घरों में घरेलू जिम्मेदारियों का बोझ महिलाओं के ऊपर ही होता है। उनसे यह उम्मीद की जाती है कि वे घर का हर काम बिना थके और बिना शिकायत के करती रहें। यह सब इतना आम हो चुका है कि लोग इसे समस्या मानते ही नहीं हैं।

महिलाओं पर बढ़ता अदृश्य बोझ

बीबीसी में छपी टाइम यूज़ सर्वे की साल 2024 की रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय महिलाएं प्रतिदिन सात घंटे से ज्यादा वक्त अवैतनिक घरेलू और देखभाल से जुड़े कामों में व्यतीत करती हैं, जो पुरुषों के किए जाने वाले काम के समय से दोगुने से भी अधिक है। महिलाएं अवैतनिक घरेलू कामों में 289 मिनट और अवैतनिक देखभाल के कामों में 137 मिनट व्यतीत करती हैं, जबकि पुरुष घरेलू कामों में 88 मिनट और देखभाल से जुड़े कामों में केवल 75 मिनट व्यतीत करते हैं। दुख की बात यह है कि छह साल पहले हुए पिछले सर्वेक्षण में भी ऐसे ही नतीजे सामने आए थे। हालांकि सरकार ने महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए अभियान चलाने के बावजूद स्थिति में कोई खास बदलाव नहीं आया है।इस विषय पर मुज़फ्फरनगर के पास के एक गांव में रहने वाली 40 वर्षीय सुनीता देवी अपना अनुभव साझा करते हुए  कहती हैं,  “काम तो मैं रोज करती हूँ, लेकिन असली थकान इस बात की होती है कि मुझे हर समय सबका ध्यान रखना पड़ता है। अगर मैं एक दिन भी न सोचूं, तो घर का काम रुक जाता है। यह सिर्फ काम का बोझ नहीं है, बल्कि जिम्मेदारियों का लगातार दबाव है, जो मुझे मानसिक रूप से थका देता है।”

यह समस्या सिर्फ गृहिणियों तक सीमित नहीं है, बल्कि पढ़ने वाली लड़कियों को भी इसका सामना करना पड़ता है। मुज़फ्फरनगर के एक सरकारी कॉलेज में पढ़ने वाली 19 वर्षीय छात्रा रीना बताती हैं, “मुझे कॉलेज से आने के बाद घर का काम भी करना पड़ता है, जबकि मेरे भाई से ऐसा कुछ नहीं कहा जाता। कई बार मुझे लगता है कि मेरे साथ बराबरी नहीं हो रही है।इस तरह की स्थिति लड़कियों के आत्मविश्वास पर असर डालती है और उन्हें मानसिक रूप से परेशान करती है।” हमारे समाज में बचपन से ही लड़कियों और लड़कों के लिए अलग-अलग भूमिकाएं  तय कर दी जाती हैं।लड़कियों को सिखाया जाता है कि उन्हें घर का काम करना चाहिए, क्योंकि यही उनकी जिम्मेदारी है। वहीं लड़कों को इन कामों से दूर रखा जाता है।धीरे-धीरे यह सोच इतनी गहरी हो जाती है कि महिलाएं  खुद भी इसे सामान्य मानने लगती हैं। यही जेंडर रोल्स महिलाओं पर अतिरिक्त दबाव डालते हैं। भारतीय बच्चों पर किए गए अध्ययन भी यही दिखाते हैं कि लड़कियां घर के काम और देखभाल में ज्यादा समय लगाती हैं। वहीं, लड़के अपना ज्यादा समय खेलने-कूदने (अवकाश) और पढ़ाई में बिताते हैं।

काम तो मैं रोज करती हूँ, लेकिन असली थकान इस बात की होती है कि मुझे हर समय सबका ध्यान रखना पड़ता है। अगर मैं एक दिन भी न सोचूं, तो घर का काम रुक जाता है। यह सिर्फ काम का बोझ नहीं है, बल्कि जिम्मेदारियों का लगातार दबाव है, जो मुझे मानसिक रूप से थका देता है।

असमान जिम्मेदारियां और बढ़ता मानसिक दबाव

घर के कामों का बंटवारा भी महिलाओं और पुरुषों के बीच असमानता का एक बड़ा कारण है, लेकिन इस पर अक्सर ध्यान नहीं दिया जाता। ज्यादातर घरों में काम का ज्यादा बोझ महिलाओं पर होता है, जिससे उनके स्वास्थ्य और जीवन पर असर पड़ता है। इस विषय पर दिल्ली में काम करने वाली 30 वर्षीय नेहा वर्मा बताती हैं, “ऑफिस और घर दोनों संभालते-संभालते मैं खुद के लिए समय ही नहीं निकाल पाती। कई बार बहुत ज्यादा थकान और चिड़चिड़ापन महसूस होता है।” अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो यह डिप्रेशन और भावनात्मक थकान का कारण बन सकती है।घरेलू और देखभाल संबंधी कामों का असमान भार उठाने वाली भारतीय महिलाएं अकेली नहीं हैं, यह एक वैश्विक वास्तविकता है। हालांकि, घरेलू कामों में व्यतीत समय का अंतर भारत में कहीं अधिक व्यापक है।जहां वैश्विक स्तर पर महिलाएं घरेलू और देखभाल के कामों में पुरुषों की तुलना में लगभग 2.8 घंटे अधिक समय व्यतीत करती हैं। वहीं भारतीय महिलाओं के लिए यह अंतर लगभग चार घंटे के करीब है।

बीडब्ल्यू हेल्थकेयर वर्ल्ड में छपे एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक,  मानसिक स्वास्थ्य का अंतर ‘दूसरी शिफ्ट’ की अवधारणा से उत्पन्न होता है, जिसमें महिलाएं आठ घंटे के कार्य दिवस के बाद घर लौटती हैं और अतिरिक्त कई घंटे बिना वेतन के घर पर काम करती हैं। हालांकि पुरुषों और महिलाओं में काफ़ी अंतर है, और भारत में साल 2024-25 में किए गए एक अध्ययन के अनुसार, लगभग 28.6 फीसदी महिलाएं चिंता का अनुभव करती हैं, जबकि 22 फीसदी  से अधिक महिलाएं अवसाद के लक्षण दिखाती हैं।पुरुषों के मुकाबले महिलाओं को अक्सर दोहरी जिम्मेदारियां निभानी पड़ती हैं। घर का तनाव उनके काम को प्रभावित करता है और काम का तनाव घर को। ऐसे में उन्हें आराम करने या दिमाग को शांत करने का समय भी नहीं मिल पाता।भारत में महिलाओं के स्वास्थ्य को अक्सर परिवार के बाकी लोगों बच्चों, पति और बुजुर्गों के बाद ही महत्व दिया जाता है। इस वजह से कई महिलाएं समय पर इलाज नहीं ले पातीं। जब तक उन्हें मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी मदद मिलती है, तब तक वे काफी थक चुकी होती हैं। यह थकान लंबे समय तक दर्द, नींद न आना और पेट की समस्याओं जैसी दिक्कतों से जुड़ी होती है। 

ऑफिस और घर दोनों संभालते-संभालते मैं खुद के लिए समय ही नहीं निकाल पाती। कई बार बहुत ज्यादा थकान और चिड़चिड़ापन महसूस होता है।

समाधान के लिए क्या किया जा सकता है ?

इस समस्या का समाधान बहुत मुश्किल नहीं है, लेकिन इसके लिए सोच बदलनी जरूरी है।सबसे पहले यह समझना होगा कि घर के काम सिर्फ महिलाओं की जिम्मेदारी नहीं हैं। अगर परिवार के सभी सदस्य मिलकर काम करें, तो महिलाओं का बोझ काफी कम हो सकता है। इस विषय पर सुनीता देवी भी कहती हैं, “जब घर के लोग थोड़ा-थोड़ा काम बांट लेते हैं, तो मुझे बहुत राहत मिलती है। इसलिए महिलाओं को अपने लिए समय निकालना चाहिए और अपनी जरूरतों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।” इसके साथ ही मानसिक स्वास्थ्य को कुछ लोगों की सुविधा नहीं, बल्कि हर व्यक्ति के लिए ज़रूरी समझना चाहिए, चाहे वह महिला हो या पुरुष। 

अगर हम मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देंगे, तो परिवार से लेकर ऑफिस तक सब कुछ बेहतर और संतुलित रहेगा। मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखना सिर्फ व्यक्तिगत जरूरत नहीं, बल्कि समाज और स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए भी बेहद जरूरी है। अंत में यही कहा जा सकता है कि घरेलू जिम्मेदारियां जरूरी हैं, लेकिन उनका पूरा बोझ सिर्फ महिलाओं पर डालना सही नहीं है।यह एक ऐसा अदृश्य बोझ है, जिसे हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन इसका असर बहुत गहरा होता है।अगर हम सच में बराबरी चाहते हैं, तो हमें जिम्मेदारियों को जेंडर के आधार पर बांटने के बजाय केवल एक काम के तौर पर देखना होगा, जब घर के काम को महिला और पुरुष का न मानकर केवल काम समझा जाएगा और एक साथ किया जाएगा, तभी महिलाएं मानसिक रूप से स्वस्थ और खुश रह पाएंगी और समाज भी समावेशिता के साथ सही दिशा में आगे बढ़ पाएगा।

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