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मेरी दोस्त की शादी पिछले साल हुई। बचपन से ही उसे एक ‘अच्छी बहु’ बनने की सीख उसके परिवार वाले उसे सोते-जागते देते रहते थे। प्रिया (बदला हुआ नाम) भी उसी के अनुसार ढलती गई, बिना किसी सपने या मांग के। वह घर का सारा काम करने वाली। वह संकोची और समर्पित थी। शादी तय होने तक उसके घरवाले उसे ससुराल में एक अच्छी बहु बनने की सीख देते रहे। लेकिन ससुराल में प्रिया अपनी सास के अच्छी बहु वाले खांचे में फिट नहीं बैठती और उसे दिनभर ताने सुनने पड़ते। प्रिया की सास हमेशा अपनी बेटी से प्रिया की तुलना करती और उसे नीचा दिखाती रहती है।

प्रिया अकेली नहीं जिसे ससुराल में अन्य महिला सदस्यों की तुलना और उसके आधार पर तिरस्कार झेलना पड़ता है। “बहु कभी बेटी नहीं बन सकती है।” समाज ने ऐसी बातों और सास और ससुराल को हमेशा नकारात्मक रूप से प्रस्तुत किया है। इसलिए कई बार हम ससुराल में होने वाली समस्या के समाधान की बजाय उसे नकारात्मक नज़रिए से देखने लगते हैं। हो सकता आपको मेरी बातों से लगे कि मैं ससुराल की वकालत कर रही हूं तो आपको बताऊं ऐसा नहीं है बल्कि मैं ये समझाने की कोशिश कर रही हूं कि हर घर किसी लड़की के लिए ससुराल तो किसी के लिए मायका है। इसलिए ज़रूरी है महिलाओं के बीच पनपने वाली समस्याओं को समझकर और उसका विश्लेषण करके दूर किया जाए।

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ग़ौर करने वाली बात है कि बहु को बेटी की तरह मानना और बहु को बेटी की तरह बनाना, ये दो अलग-अलग बातें है। इसमें एक स्वाभाविक और सकारात्मक है, वहीं दूसरा नकारात्मक। आमतौर पर हर सास यह उम्मीद करती है कि उसकी बहु उसकी बेटी की तरह हो, लेकिन वह अक्सर यह भूल जाती है कि बेटी अपनी आधी ज़िंदगी अपनी मां से साथ गुज़ारती है। उसकी पसंद-नापसंद, सोच और मन-मिज़ाज के बारे में मां को अच्छी तरह पता होता है, वहीं बहु के लिए परिवार उतना ही नया होता है जितनी परिवार के लिए वह। इसलिए बजाय अपनी बेटी या परिवार की अन्य महिला सदस्य के साथ तुलना करने के अगर बहुओं को समझने और बिना किसी शिकायत के उसे स्वीकारने की कोशिश करनी चाहिए, तो यह एक अच्छे स्वस्थ रिश्ते की बुनियाद हो सकती है। समय के साथ परिवार और नया सदस्य दोनों ही ढल जाते हैं।

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पितृसत्ता नकारात्मक सत्ता के ज़रिये महिला और पुरुषों की समझने की क्षमता को सीधेतौर पर प्रभावित करती है और इसी वजह से ‘अच्छी बहु’ और ‘अच्छी सास’ बनने की होड़ में महिलाओं के बीच द्वेष जैसी भावनाएं पनपने लगती हैं।

इसके साथ ही, हमें बदलाव की प्रकृति को भी समझने और स्वीकारने की ज़रूरत है। बदलाव हर क्षेत्र में, हमारे रिश्तों में भी। हमारा समाज हमें हमेशा खांचों में रहना सिखाता है, फिर वह जेंडर का खांचा हो या फिर रिश्तों का खांचा। इन खांचों में ही हम अपनी ज़िंदगी बिताना चाहते हैं। कई बार ये खांचे हमारी कई कठिनाइयों की वजह भी बन जाते हैं, क्योंकि हम कई बार अपने इस आरामदायक खांचे से बाहर नहीं निकलना चाहते हैं। हमें याद रखना चाहिए कि जिस तरह हर इंसान के अपने मायने हैं उसी तरह उससे बने रिश्तों के भी अलग-अलग मायने हैं, इसलिए हमें एक रिश्ते पर दूसरी रिश्ते की परत चढ़ाने से बचना चाहिए। हम बेटी को बेटी के रूप में और बहु को बहु के रूप में स्वीकार करना सीखें।

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वास्तव में सास और बहु की लड़ाई या वैचारिक मतभेद की मूल जड़ पितृसत्ता से जुड़ी हुई है, जो महिलाओं को अपनी-अपनी सत्ता क़ायम रखने के लिए मजबूर करती है। पितृसत्ता महिलाओं को अपनी क़ायम सत्ता में ही उनका अस्तित्व दिखाती है। वह सत्ता जिसे पितृसत्ता ने परिभाषित किया है, इसके तहत अक्सर सास शादी के बाद बेटे पर पहले जैसा आधिपत्य क़ायम रखने के लिए बहु को अपने बेटे की पसंद-नापसंद जैसे कई नियम क़ायदे-क़ानून सिखाती है और उसे उन्हीं नियमों के अनुसार ढलने के लिए मजबूर करती है पर ऐसे में वह यह भूल जाती है कि हर रिश्ते के साथ इंसान नई शुरुआत करता है, इसलिए ज़रूरी है कि दो इंसान ख़ुद एक-दूसरे को समझे, एकसाथ बड़े हो और एक-दूसरे की ज़रूरतों व पसंद को जाने और स्वीकारें। लेकिन जब भी इन मामलों में कोई और रिश्ता दख़ल देना शुरू करता है अपने आप मतभेद की शुरुआत हो जाती है।

पितृसत्ता का मूल महिला एकता के ख़िलाफ़ है, जिसके चलते वह ‘औरत को औरत की दुश्मन’ बनाने की कोई कसर नहीं छोड़ता। फिर चाहे वह उसका अपना घर हो या समाज। पितृसत्ता नकारात्मक सत्ता के ज़रिये महिला और पुरुषों की समझने की क्षमता को सीधेतौर पर प्रभावित करती है और इसी वजह से ‘अच्छी बहु’ और ‘अच्छी सास’ बनने की होड़ में महिलाओं के बीच द्वेष जैसी भावनाएं पनपने लगती हैं। इस द्वेष की भावनाओं से बचने के लिए ज़रूरी है कि हम रिश्तों की बजाय इंसान को अहमियत देना सीखें और उन्हें वक्त देना सीखें। हमें नहीं भूलना चाहिए कि किसी भी रिश्ते के सामंजस्य और संतुलन बेहद ज़रूरी है, सामंजस्य समझ में और संतुलन भावनाओं में। जब हम किसी भी इंसान से जुड़े रिश्ते को लेकर अति आशावादी होते है तो ये न केवल उस इंसान के लिए बल्कि कई बार हमारे अपने लिए भी बुरा साबित है। इसलिए बहु को बेटी जैसा बनाने की जद्दोजहद की बजाय बहु को एक इंसान की तरह स्वीकार करें। उसे समझें, वक्त दें और पितृसत्ता के बिछाए द्वेषपूर्ण जाल को भी समझे।

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तस्वीर साभार : Development News

बनारस से दूर करधना गाँव की रहने वाली वंदना ने सामाजिक और आर्थिक संघर्ष के बीच अपनी पढ़ाई पूरी की और एक स्वयंसेवी संस्था में क्षेत्र समन्विका के पद पर कार्यरत है। वंदना अपनी लेखनी के ज़रिए गाँव में नारीवाद, जेंडर और महिला मुद्दों को उजागर करने की दिशा में आगे बढ़ रही है।

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