इतिहास आशा भोसले: रूढ़ियों को तोड़ती एक बहुआयामी पार्श्व गायिका| # IndianWomenInHistory

आशा भोसले: रूढ़ियों को तोड़ती एक बहुआयामी पार्श्व गायिका| # IndianWomenInHistory

आशा भोसले एक प्रसिद्ध भारतीय पार्श्व गायिका थीं, जिन्होंने अपनी मधुर आवाज़ के माध्यम से करोड़ों दिलों में अपनी जगह बनाई। उन्होंने कई तरह के गाने गाए जैसे साइकेडेलिक गीत ‘दम मारो दम’ की जोशीली धुन और ग़ज़ल ‘दिल चीज़ क्या है’ आदि को भावपूर्ण गहराई के साथ सुना जाता है।

भारतीय संगीत की दुनिया हमेशा से ही विविधता, भावनाओं और परंपराओं से भरी हुई रही है। इस दुनिया में कई ऐसी गायिकाएं उभरी हैं, जिन्होंने अपनी मधुर आवाज़ और संगीत के माध्यम से भारतीय संगीत को ऊंचाइयों तक पहुंचाया। इन कलाकारों और गायिकाओं ने न केवल श्रोताओं के दिलों में जगह बनाई, बल्कि अपनी कला के माध्यम से भारतीय संगीत को भारत के साथ – साथ वैश्विक स्तर पर  भी पहचान दिलाई। ऐसी ही एक प्रसिद्ध भारतीय पार्श्व गायिका थीं आशा भोसले, जिन्होंने अपनी मधुर आवाज़ के माध्यम से करोड़ों दिलों में अपनी जगह बनाई है। इसके साथ ही उनके गाए हुए सदाबहार गाने आज हर एक इंसान की पसंद हैं।उनकी गायन क्षमता उन गीतों में झलकती है, जो मानवीय भावनाओं के विभिन्न पहलुओं को सामने लाते हैं। 

 उन्होंने कई तरह के गाने गाए जैसे साइकेडेलिक गीत ‘दम मारो दम’ की जोशीली धुन और ग़ज़ल  ‘दिल चीज़ क्या है’ आदि को भावपूर्ण गहराई के साथ सुना जाता है। इसके अलावा कैबरे शैली में उनका एक गीत ‘पिया तू अब तो आजा’ में एक महिला की अपनी इच्छा भी झलकती है। हालांकि भारतीय समाज में अक्सर महिलाओं को अपनी भावनाएं और खासकर अपनी यौन इच्छा खुलकर जताने की आज़ादी नहीं दी जाती। ऐसे में यह गाना उस सोच को थोड़ा तोड़ता हुआ दिखाई देता है। उनके समय में बहुत कम गायिकाएं थीं जो अलग-अलग तरह के गाने गा पाती थीं। लेकिन उनके नए प्रयोग करने की कोशिशों ने बॉलीवुड में महिलाओं की अभिव्यक्ति को एक नया रूप दिया।

एक प्रसिद्ध भारतीय पार्श्व गायिका थीं आशा भोसले, जिन्होंने अपनी मधुर आवाज़ के माध्यम से करोड़ों दिलों में अपनी जगह बनाई है। इसके साथ ही उनके गाए हुए सदाबहार गाने आज हर एक इंसान की पसंद हैं।

शुरुआती जीवन, जिम्मेदारियां और सुरों का सफर 

ब्रिटेनिका में छपे एक लेख के मुताबिक, आशा भोसले का जन्म 8 सितम्बर 1933 को महाराष्ट्र के एक पारंपरिक मराठी परिवार में हुआ था। उनके पिता, दीनानाथ मंगेशकर, एक प्रसिद्ध मराठी रंगमंच कलाकार और शास्त्रीय गायक थे, जिन्होंने उन्हें कम उम्र से ही शास्त्रीय संगीत का प्रशिक्षण दिया। आशा जब केवल 9 साल की थीं, तब इनके पिता की मृत्यु हो गई। इसके बाद उनका परिवार पुणे से कोल्हापुर और उसके बाद मुंबई आ गया। आशा के अलावा उनके चार भाई-बहन थे और उनके सभी भाई-बहनों ने संगीत और फिल्म जगत में अपना खास योगदान दिया है। परिवार की सहायता के लिए आशा और इनकी बड़ी बहन लता मंगेशकर ने गाना और फिल्मों में अभिनय शुरू कर दिया। साल 1943 में इन्होंने अपनी पहली मराठी फिल्म माझा बाळ में गीत गाया।

 इसके बाद साल 1948 में उन्होंने हिन्दी फिल्म ‘चुनरिया’ के लिए ‘सावन आया’ गाना भी गाया, जिसे हंसराज बहल ने संगीत दिया था। धीरे-धीरे वह दक्षिण एशिया की एक प्रसिद्ध गायिका बन गईं। फिल्म संगीत, पॉप, गज़ल, भजन, भारतीय शास्त्रीय संगीत, क्षेत्रीय गीत, कव्वाली, रवींद्र संगीत और नजरूल गीत इनके गीतों में सम्मिलित हैं। इन्होंने 14 से ज्यादा भाषाओं में गीत गाए जैसे मराठी, आसामी, हिन्दी, उर्दू, तेलगू, मराठी, बंगाली, गुजराती, पंजाबी, भोजपुरी, तमिल, अंग्रेजी, रशियन, जाइच, नेपाली, मलय और मलयालम आदि। इसके साथ ही 12000 से अधिक गीतों को उन्होंने आवाज दी। इसके साथ ही महान गायक किशोर कुमार आशा के सबसे मनपसंद गायक थे।

आशा ने साल 1949 की एक फिल्म रात की रानी के लिए अपना पहला एकल गीत गाया। यह वक्त उनके निजी जीवन में उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा था, क्योंकि वह एक नाखुश वैवाहिक जीवन और परिवार से अलगाव का सामना कर रही थीं।

संघर्ष से सफलता तक का सफर 

आशा जब 16 साल की थीं, तब उन्होंने गणपतराव भोसले के साथ पारिवारिक इच्छा के विरुद्ध शादी कर ली।इस घटना के बाद मंगेशकर परिवार ने उन्हें घर से निकाल दिया। दंपति के तीन बच्चे थे, लेकिन उनका शादीशुदा जीवन समस्याओं से भरा रहा, उन्हें हिंसा का सामना करना पड़ा और साल 1960 में उनका तलाक हो गया। इसके बाद वह अपनी माँ के घर लौट आई और साल 1980 में उन्होंने भारतीय गायक और संगीत निर्देशक आरडी बर्मन. से शादी कर ली थी। इसके अलावा शुरुआत में गायकी का क्षेत्र उनके लिए थोड़ा संघर्षपूर्ण रहा। आशा ने साल 1949 की एक फिल्म रात की रानी के लिए अपना पहला एकल गीत गाया। यह वक्त उनके निजी जीवन में उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा था, क्योंकि वह एक नाखुश वैवाहिक जीवन और परिवार से अलगाव का सामना कर रही थीं। उस समय गीता दत्त, शमशाद बेगम और लता मंगेशकर जैसी मशहूर गायिकाओं का दौर था और हर जगह उन्हीं का बोलबाला था।

ऐसे में वो भी गाना चाहती थीं, लेकिन उन्हें ज्यादा मौके नहीं मिलते थे। उन्हें अक्सर केवल छोटी या दूसरे दर्जे की फिल्मों में ही गाने का मौका मिलता था। हालांकि साल 1950 के दशक में, जब बाकी बड़ी गायिकाएं बड़े बजट की फिल्मों में गा रही थीं, उनको ज्यादातर कम बजट की फिल्मों में गाने का मौका मिलता था। लेकिन साल 1952 में दिलीप कुमारअभिनीत फिल्म ‘संगदिल’, जिसका संगीत सज्जाद हुसैन ने दिया था। इससे उनको पहचान मिलनी शुरू हुई। इसके बाद साल 1953 में बिमल राय ने उन्हें अपनी फिल्म ‘परिणीता’ में गाने का मौका दिया। फिर साल 1954 में राज कपूर  ने फिल्म बूट पॉलिश में ‘नन्हे मुन्ने बच्चे’ गाने के लिए मोहम्मद रफी के साथ उन्हें चुना। इस गाने से उन्हें को काफी प्रसिद्धि मिली। साल 1956 सीआईडी के गीत ‘लेके पहला पहला प्यार’ से उन्हें और अधिक पहचान मिली , जिसे उन्होंने शमशाद बेगम के साथ गाया था।

हालांकि साल 1950 के दशक में, जब बाकी बड़ी गायिकाएं बड़े बजट की फिल्मों में गा रही थीं, उनको ज्यादातर कम बजट की फिल्मों में गाने का मौका मिलता था। लेकिन साल 1952 में दिलीप कुमार अभिनीत फिल्म ‘संगदिल’, जिसका संगीत सज्जाद हुसैन ने दिया था। इससे उनको पहचान मिलनी शुरू हुई।

1960 से 70 के दशक में संगीत के क्षेत्र में उनका योगदान  

आशा भोसले को बॉलीवुड में पहचान साल 1957 में मोहम्मद रफी के साथ गाए गए युगल गीत ‘उड़े जब जब जुल्फें तेरी’ से मिली। ओपी नैयर के लिए फिल्म ‘नया दौर’ के लिए यह गाना लिखा गया था। इस गाने की सफलता ने नैयर के साथ एक लंबे समय तक चलने वाले सहयोग की शुरुआत की, उन्होंने साल 1957 की फिल्म जॉनी वॉकर, दुनिया रंग रंगीली और कैदी जैसी फिल्मों में भोसले को अपनी मुख्य महिला गायिका के रूप में लिया। साल 1960 के दशक में उन्होंने रफी ​​के साथ एक लोकप्रिय गायन जोड़ी भी बनाई और उन्होंने साल 1961 की फिल्म हम दोनों  में ‘अभी ना जाओ छोड़ कर’ गाना और साल 1964 में फिल्म कश्मीर की कली ‘दीवाना हुआ बादल’ जैसे कई हिट गाने रिकॉर्ड किए। अपने करियर के इस दौर में, उन्होंने ऐसे गीतों के माध्यम से अपनी गायन प्रतिभा का प्रदर्शन करना शुरू किया जो तकनीकी और भावनात्मक दोनों थे, जैसे चंचल गीत ‘आजा आजा मैं हूं प्यार तेरा’ और मोहक गीत ‘रात अकेली है बुझ गए दिए’। 

साल 1970 के दशक में, उनकी गायन शैली पश्चिमी संगीत से प्रभावित थी। इस शैली का मुख्य आधार संगीत निर्देशक आर.डी. बर्मन के साथ उनका सहयोग था, जिसके परिणामस्वरूप कई डिस्कोऔर पॉप हिट गाने बने। जैसे ‘चुरा लिया है तुमने जो दिल को’ और ‘लेकर हम दीवाना दिल’ जैसे गाने और ‘ये लड़का हाय अल्लाह’ उनके कुछ सबसे प्रसिद्ध गाने बन गए।  उनकी कुछ अन्य यादगार हिट्स में साल 1970 की फिल्म हमजोली  में  ‘ढल गया दिन’ और साल 1975 की फ़िल्म दीवार में ‘कहदूं तुम्हें या चुप रहूं’ जैसे चंचल युगल गीत शामिल हैं। साल 1970 की फिल्म डॉन में ‘ये मेरा दिल यार का दीवाना’ ने फिल्म में एक ग्लैमरस योगदान दिया। यह फिल्म एक उल्लेखनीय उदाहरण है, जो बॉलीवुड की उस शैली में उनके काम को दिखाती है, जिसमें कथानक से असंबंधित कामुक गीत शामिल होते हैं। हालांकि इस शैली की आलोचना महिलाओं को वस्तु के रूप में प्रस्तुत करने के लिए की गई है, फिर भी ये गीत बहुत लोकप्रिय हैं। 

उन्होंने फिल्म उमराव जान में संगीतकार खय्याम के साथ शास्त्रीय उर्दू ग़ज़लें गाकर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया। फिल्म में ‘दिल चीज़ क्या है’ और ‘इन आंखों की मस्ती’ के उनके भावपूर्ण गायन ने आलोचकों और दर्शकों दोनों को मंत्रमुग्ध कर दिया। इन ग़ज़लों के लिए उनको सर्वश्रेष्ठ महिला पार्श्व गायिका का पहला राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला।

नए दौर में भी कायम रही उनकी पहचान

1980 के दशक में, भोसले ने लगातार बदलते संगीत जगत में अपनी प्रमुखता बरकरार रखी और खुद को नए रूप में ढालती रहीं। उन्होंने फिल्म उमराव जान में संगीतकार खय्याम के साथ शास्त्रीय उर्दू ग़ज़लें गाकर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया। फिल्म में ‘दिल चीज़ क्या है’ और ‘इन आंखों की मस्ती’ के उनके भावपूर्ण गायन ने आलोचकों और दर्शकों दोनों को मंत्रमुग्ध कर दिया और इस धारणा को गलत साबित कर दिया कि वह केवल कैबरे या डिस्को तक ही सीमित थीं। इन ग़ज़लों के लिए भोसले को सर्वश्रेष्ठ महिला पार्श्व गायिका का पहला राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। साल 1990 और 2000 के दशक में उन्होंने समकालीन संगीत रुझानों के अनुरूप अपनी शैली को अपडेट करके खुद को नई और युवा गायिकाओं से प्रतिस्पर्धा करने के लिए फिर से स्थापित किया। उनकी साल 1995 की फिल्म के गाने ‘तन्हा तन्हा’ और ‘रंगीला रे’ काफी लोकप्रिय हुए। इसके साथ ही रंगीला  गाने ने उनके करियर को नई जान दी।

एआर रहमान ने फिल्म ताल और लगान में उनकी आवाज़ का इस्तेमाल किया। फिल्म लगान में उनका गाना ‘राधा कैसे ना जले’ बहुत लोकप्रिय हुआ, जो शास्त्रीय संगीत और फिल्मी कहानी के सुंदर मेल के लिए जाना जाता है। इसके साथ ही 2000 के दशक में उनके कुछ अन्य हिट गानों में ‘कम्बख्त इश्क’, ‘खल्लास’ और ‘शरारा’ शामिल हैं।भोसले का संगीतमय सफर बॉलीवुड से कहीं आगे तक फैला हुआ था। भोसले उस्ताद अली अकबर खान के संगीत एल्बम लेगेसी में अपने योगदान के लिए ग्रैमी पुरस्कार के लिए नामांकित होने वाली पहली भारतीय गायिका थीं। उन्होंने विभिन्न शैलियों के अंतरराष्ट्रीय कलाकारों के साथ सहयोग किया, माइकल स्टाइप के ‘द वे यू ड्रीम’ में अपनी आवाज़ दी और कई अन्य संगीत समूहों के साथ काम किया।

क्रोनोस क्वार्टेट ने आर.डी. बर्मन के क्लासिक गीतों की पुनर्कल्पना करते हुए ‘यू हैव स्टोलन माय हार्ट’ प्रस्तुत किया, जिसे सर्वश्रेष्ठ समकालीन विश्व संगीत एल्बम श्रेणी में ग्रैमी पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया था।उनकी उपलब्धियों को मान्यता देते हुए, उन्हें साल 2000 में सिनेमा के क्षेत्र में उपलब्धि के लिए सरकार के दिए जाने वाले दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। साल 2008 में उन्हें भारत के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मानपद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। इसके साथ ही, उन्होंने सात बार सर्वश्रेष्ठ महिला पार्श्व गायिका का फिल्मफेयर पुरस्कार जीता। वह अपने जीवन के आखिरी दिनों तक गाती गुनगुनाती रहीं और बीते दिनों 12 अप्रैल को उनकी मृत्यु हो गई। लेकिन अपने संगीत के माध्यम से वह हमेशा याद की जाती रहेंगी।आशा भोसले ने अपनी अलग-अलग तरह की गायकी से भारतीय संगीत में खास पहचान बनाई। उन्होंने यह दिखाया कि एक कलाकार किसी एक शैली तक सीमित नहीं होता।    

About the author(s)

मेरा नाम सविता है और मैं हिमाचल प्रदेश से हूँ । मैंने एक साल का जेंडर फेलोशिप प्रोग्राम हिमाचल क्वीयर फाउंडेशन के साथ पूरा किया है। इसके अलावा, मुझे 'बोबो दियां गल्लां' ग्रामीण पत्रकारिता में एक साल का अनुभव है। मुझे  कहानियाँ और कविताएँ लिखना बहुत अच्छा लगता है और साथ ही तस्वीरें लेने का भी बहुत शौक है।

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