संस्कृतिसिनेमा ‘कल्पतरु’: जलवायु परिवर्तन और महिलाओं के संघर्ष की कहानी

‘कल्पतरु’: जलवायु परिवर्तन और महिलाओं के संघर्ष की कहानी

फिल्म में मुख्य किरदार किसुन देव और उसकी पत्नी कमली हैं, जिनका बेटा शहर में पढ़ाई करता है और शहर में प्रदूषण के कारण उसकी मृत्यु हो जाती है।यह घटना केवल एक पारिवारिक त्रासदी नहीं, बल्कि पर्यावरणीय संकट का मानवीय चेहरा है।

प्रकृति हमारे जीवन का आधार ही नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान का भी अभिन्न हिस्सा रही है। सदियों से पेड़, नदियां, पहाड़ और जंगल हमारे जीवन को संतुलित बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते आए हैं। वहीं भारतीय परंपराओं में प्रकृति को पूजनीय माना गया है । इस आधार पर पर्यावरण संरक्षण से जुड़े हुए कई अभियान, हमें आए दिन देखने को मिलते रहते हैं। वहीं सिनेमा और सोशल मीडिया में भी पर्यावरण संरक्षण से जुड़े कई विज्ञापन और फिल्में भी बनाई गई हैं। इसी विचारधारा पर एक फिल्म कल्पतरु भी दैनिक जीवन में पर्यावरण के महत्व के प्रति जागरूकता पर आधारित है। इसका निर्देशन प्रमोद कुमार और रवि शंकर प्रसाद ने किया है, लगभग 1 घंटे 41 मिनट की इस हिंदी फिल्म में कुछ जगहों पर स्थानीय बोली का भी उपयोग किया गया है । 

यह फिल्म दिखाती है कि प्रदूषण किस तरह से हमारे जलवायु और स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है। इसके साथ ही यह पर्यावरण संरक्षण के महत्व को भी रेखांकित करती है और बताती है कि पेड़ों के बिना जीवन संभव नहीं है। इस फिल्म के माध्यम से यह समझा जा सकता है कि जलवायु परिवर्तन का प्रभाव समाज पर और खासतौर पर महिलाओं को किस तरह से प्रभावित करता है। फिल्म में मुख्य किरदार किसुन देव (प्रमोद कुमार) और उसकी पत्नी कमली (सोनमणि जयंत गाडेकर) हैं, जिनका बेटा शहर में पढ़ाई करता है और शहर में प्रदूषण के कारण उसकी मृत्यु हो जाती है।यह घटना केवल एक पारिवारिक त्रासदी नहीं, बल्कि पर्यावरणीय संकट का मानवीय चेहरा है।

यह फिल्म दिखाती है कि प्रदूषण किस तरह से हमारे जलवायु और स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है। इसके साथ ही यह पर्यावरण संरक्षण के महत्व को भी रेखांकित करती है और बताती है कि पेड़ों के बिना जीवन संभव नहीं है। इस फिल्म के माध्यम से यह समझा जा सकता है कि जलवायु परिवर्तन का प्रभाव समाज पर और खासतौर पर महिलाओं को किस तरह से प्रभावित करता है।

संघर्ष, परिवार और पितृसत्ता की परतें

यह फिल्म एक ऐसे ग्रामीण परिवार और समुदाय के संघर्ष की कहानी है, जो जंगल की कटाई और पर्यावरण संकट का सामना कर रहा है। परिवार में किसुन देव का किरदार एक जागरूक और संघर्षशील व्यक्ति का है। वह अपने बेटे की मृत्यु के बाद पर्यावरण और न्याय के लिए खड़ा होता है। वह केवल विरोध नहीं करता, बल्कि समाधान भी खोजता है। हालांकि, उसका चरित्र पूरी तरह पितृसत्तात्मक सोच से मुक्त नहीं है। वह कई महत्वपूर्ण फैसले, जैसे घर बेचना बिना पत्नी की सहमति के लेता है। वह प्रकृति के विनाश के खिलाफ आवाज उठाता है और पेड़ लगाने का अभियान शुरू करता है। इस संघर्ष में उसे प्रशासनिक दमन और सामाजिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। 

हालांकि उसकी पत्नी एक शांत लेकिन मजबूत किरदार है। उसे त्याग और धैर्य की प्रतीक के रूप में दिखाया गया है। वह हर परिस्थिति में परिवार और संघर्ष दोनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। एक दृश्य में, जब पुलिस किसुन को ले जाती है, तो वह गांव के लोगों को संगठित करती है और उसके समर्थन में खड़ी होती है। यह उसके नेतृत्व की क्षमता को साफ तौर पर दिखाता है। फिल्म में प्रकृति को बहुत सादगी और यथार्थवादी तरीके से दिखाया गया है। इसमें सूखा, पेड़ों की कटाई और बदलते पर्यावरण को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया गया है। फिल्म का संगीत सरल और भावनात्मक है, जिसमें लोक धुनों का प्रयोग इसे और भी ज़्यादा वास्तविक बनाता है। फिल्म की गति धीमी है, लेकिन यह दर्शकों को किरदारों के जीवन और संघर्ष को गहराई से समझने का मौका देती है।

यह फिल्म एक ऐसे ग्रामीण परिवार और समुदाय के संघर्ष की कहानी है, जो जंगल की कटाई और पर्यावरण संकट का सामना कर रहा है। परिवार में किसुन देव का किरदार एक जागरूक और संघर्षशील व्यक्ति का है। वह अपने बेटे की मृत्यु के बाद पर्यावरण और न्याय के लिए खड़ा होता है। वह केवल विरोध नहीं करता, बल्कि समाधान भी खोजता है।

 महिलाओं की असुरक्षा और अदृश्य मेहनत 

जब किसुन देव अपना घर बेचकर कमली को एक बंजर जमीन पर ले आता है, तो दोनों के नजरिए में अंतर साफ दिखता है। वह उसे अपना सपना मानता है और कहता है कि मैं इस जमीन को हरा-भरा कर दूंगा। जबकि कमली घबरा जाती है और कहती हैं न घर, न लोग मेरा गांव और समाज सब छूट गया। उसका गुस्सा और डर एक महिला की उस असुरक्षा को दिखाता है, जो अपने सामाजिक सहारे से कट जाने पर महसूस होती है। फिर भी रोने और विरोध करने के बाद भी वह खुद को संभालकर पति का साथ देती है। यहीं उनकी जोड़ी का असली संघर्ष और साथ नजर आता है। दूसरे दृश्य में, जब किसुन को खाने में चावल दिया जाता है और वह दाल-रोटी की इच्छा जताता है, तो उसकी पत्नी उदास होकर कहती है, आटा नहीं है जी। इससे घर की आर्थिक तंगी साफ झलकती है। वहीं, बुखार होने के बावजूद किसुन सुबह उठकर पेड़ लगाने चला जाता है, क्योंकि उसके पास दवा खरीदने के लिए भी पैसे नहीं होते। 

बाद में, जब नर्सरी के मालिक को उसके उद्देश्य का पता चलता है, तो वह उसे मुफ्त में पौधे दे देता है। पूरी फिल्म में यह दिखाया गया है कि बेटे की मृत्यु के बाद किसुन अपने दुख को संघर्ष में बदल देता है, जबकि कमली उसी दर्द को भीतर ही भीतर सहती रहती है। साथ ही, पर्यावरणीय संकट का असर उसके रोज़मर्रा के जीवन पर अधिक पड़ता है, क्योंकि घर और संसाधनों की जिम्मेदारी उसी पर होती है। इस तरह उनकी जोड़ी यह दिखाती है कि संघर्ष एक ही है, लेकिन उसे जीने के तरीके अलग-अलग हो सकते हैं।इस तरह कल्पतरु फिल्म यह दिखाती है कि पर्यावरण संकट केवल प्रकृति का नहीं, बल्कि महिलाओं की आजीविका, श्रम, स्वास्थ्य और अस्तित्व का संकट भी है। खासकर हाशिए पर जी रहे लोगों के संघर्ष को जिस संवेदनशीलता से दिखाया गया है। वह इसे प्रभावशाली बनाता है। यह फिल्म दर्शकों पर गहरा असर छोड़ती है, क्योंकि यह हमें सोचने पर मजबूर करती है कि अपराध केवल व्यक्ति की गलती नहीं, बल्कि समाज और व्यवस्था की भी देन होता है। 

जब किसुन देव अपना घर बेचकर कमली को एक बंजर जमीन पर ले आता है, तो दोनों के नजरिए में अंतर साफ दिखता है। वह उसे अपना सपना मानता है और कहता है कि मैं इस जमीन को हरा-भरा कर दूंगा। जबकि कमली घबरा जाती है और कहती हैं न घर, न लोग मेरा गांव और समाज सब छूट गया। उसका गुस्सा और डर एक महिला की उस असुरक्षा को दिखाता है, जो अपने सामाजिक सहारे से कट जाने पर महसूस होती है।

पर्यावरण संघर्ष में महिलाओं की निर्णायक भूमिका

फिल्म के अंत में, जब प्रशासन जबरन जंगल के पेड़ों को काटने आता है, तब गांव के महिला और पुरुष एकजुट होकर उसका विरोध करते हैं। यह दृश्य केवल पर्यावरण संरक्षण का नहीं, बल्कि पितृसत्तात्मक व्यवस्था को भी चुनौती देता है, जहां आमतौर पर महिलाओं की भूमिका सीमित मानी जाती है। यहां महिलाएं न सिर्फ भागीदारी करती हैं, बल्कि आगे बढ़कर नेतृत्व भी करती हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि उनकी भूमिका घरेलू दायरे से कहीं अधिक व्यापक है।यह दृश्य इको-फेमिनिज्म की अवधारणा को भी सशक्त रूप से सामने लाता है, जिसमें प्रकृति और महिलाओं- दोनों के शोषण के खिलाफ सामूहिक प्रतिरोध को अहम माना जाता है।

कुल मिलाकर, यह फिल्म दर्शकों पर गहरा असर छोड़ती है। यह हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि पर्यावरण संरक्षण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हर व्यक्ति की सक्रिय भागीदारी जरूरी है और इस संघर्ष में महिलाओं की भूमिका केंद्रीय और निर्णायक हो सकती है। आज के संदर्भ में देखें तो यह कहानी और भी प्रासंगिक हो जाती है। ‘कल्पतरु’ फिल्म हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि अगर विकास की प्रक्रिया में प्रकृति और महिलाओं दोनों को नजरअंदाज किया जाएगा, तो उसका परिणाम विनाशकारी ही होगा। हालांकि, फिल्म में महिला किरदारों को काफी सीमित और कई बार अनदेखा किया गया है। उन्हें और अधिक गहराई और मजबूती के साथ दिखाया जा सकता था, जिससे कहानी का सामाजिक पक्ष और प्रभावी बनता।लेकिन फिर भी यह कहानी पर्यावरण से जुड़े महत्व को समझाने में सफल रही और विकास कर नाम पर हो रहे विनाश को भी सही मायनों में दर्शकों के सामने रखती है।  

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