आजकल हर जगह यह कहा जाता है कि लड़कियां आगे बढ़ रही हैं, पढ़ रही हैं और अपने सपने पूरे कर रही हैं। स्कूलों और कॉलेजों में लड़कियों की संख्या भी पहले से बढ़ी है। एक बार ऊपरी तौर पर देखने पर लगता है कि सब कुछ बदल रहा है और लड़कियों के लिए रास्ते आसान हो गए हैं। लेकिन, अगर हम सच में सरकारी कॉलेजों की हालत देखें, खासकर गाँवों के, तो सच्चाई कुछ अलग नजर आती है। यहां लड़कियों के लिए पढ़ाई सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं होती, बल्कि उन्हें हर दिन डर, सामाजिक दबाव और चुप्पी के बीच भी जीना पड़ता है। यह समस्या सिर्फ एक लड़की की नहीं है, बल्कि कई लड़कियों की रोज़मर्रा की हकीकत है। अगर हम गाँव को ध्यान से समझें, तो वहां हर चीज़ एक तरह के ‘नक्शे’ यानी सामाजिक संरचना में बंटी होती है। कौन कहां रहता है, किस परिवार से है, किसकी कितनी इज़्ज़त है, और कौन कहां आता-जाता है। इस पूरे माहौल में लड़कियों की जगह अक्सर सीमित कर दी जाती है। उन्हें बताया जाता है कि कहां जाना है, कब जाना है और कैसे रहना है।
गाँव में अगर कोई लड़की रोज़ कॉलेज जाती है, तो सिर्फ वही नहीं जाती। उसके साथ उसकी पहचान, उसका परिवार और उसकी इज़्ज़त भी हर दिन रास्ते पर चलती है। यही वजह है कि छोटी-सी बात भी पूरे गाँव में चर्चा का विषय बन जाती है। गाँवों में अक्सर एक ही सरकारी कॉलेज होता है, और वह भी काफी दूर। वहां जाने के लिए लड़कियों को रोज़ बस, ऑटो या पैदल लंबा सफर करना पड़ता है। सुबह जल्दी निकलना और शाम को देर से लौटना उनके रोज़मर्रा का हिस्सा है। लेकिन, यह सफर सिर्फ थकाने वाला नहीं होता, कई बार असुरक्षित भी होता है। रास्ते में लड़कों का घूरना, फब्तियां कसना और पीछा करना, ये सब बहुत आम है। कुछ लड़कियां यह सब रोज़ सामना करती हैं, फिर भी चुप रहती हैं, क्योंकि उनके पास कोई दूसरा रास्ता नहीं होता। धीरे-धीरे वे खुद को बदलने लगती हैं। रास्ता बदलना, सिर झुकाकर चलना, फोन का कम इस्तेमाल करने जैसी कई आदतें उसके रोजमर्रा के जीवन में शामिल होता है ताकि उसपर किसी की नजर न पड़े और वो सुरक्षित रहे।
अगर हम गाँव को ध्यान से समझें, तो वहां हर चीज़ एक तरह के ‘नक्शे’ यानी सामाजिक संरचना में बंटी होती है। कौन कहां रहता है, किस परिवार से है, किसकी कितनी इज़्ज़त है, और कौन कहां आता-जाता है। इस पूरे माहौल में लड़कियों की जगह अक्सर सीमित कर दी जाती है।
क्यों नहीं मिलती कॉलेज के अंदर आज़ादी
उच्च शिक्षा पर अखिल भारतीय सर्वेक्षण (AISHE) 2018-19 के अनुसार, भारत में 39,931 कॉलेज हैं, जिनमें से 60.53 फीसद ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित हैं। इसके अलावा, अधिकांश कॉलेज पुरुषों और महिलाओं दोनों को उच्च शिक्षा प्रदान करते हैं, और 11.04 फीसद कॉलेज विशेष रूप से महिलाओं के लिए हैं।लोग सोचते हैं कि कॉलेज पहुंचने के बाद लड़कियां सुरक्षित होंगी, लेकिन कई बार कॉलेज के अंदर का माहौल भी पूरी तरह ठीक नहीं होता। कभी क्लास के बाहर लड़कों का मज़ाक बनाना, कभी घूरना, तो कभी बिना वजह बात करने की कोशिश, ये सब मिलकर एक ऐसा माहौल बना देते हैं, जहां लड़कियां खुद को सहज महसूस नहीं करतीं। ये बातें छोटी लग सकती हैं, लेकिन जब ये रोज़ होती हैं, तो लड़कियों का आत्मविश्वास धीरे-धीरे कम होने लगता है। वे पढ़ाई से ज़्यादा अपने बचाव के बारे में सोचने लगती हैं। आजकल हर जगह यह कहा जाता है कि लड़कियां आगे बढ़ रही हैं, पढ़ रही हैं और अपने सपने पूरे कर रही हैं।
स्कूलों और कॉलेजों में लड़कियों की संख्या भी पहले से बढ़ी है। बाहर से देखने पर लगता है कि सब कुछ बदल रहा है और लड़कियों के लिए रास्ते आसान हो गए हैं। ऊपरी तौर पर देखने पर लगता है कि वजह सिर्फ डर है, लेकिन असल में यह डर कई परतों में होता है। ये डर कि लोग क्या कहेंगे। गाँव में बातें बहुत जल्दी फैलती हैं। अगर किसी लड़की का नाम किसी मामले में आ जाए, तो लोग सच्चाई जाने बिना ही बातें बनाना शुरू कर देते हैं। घरवालों का डर भी एक बड़ी वजह होता है। कई लड़कियों को लगता है कि अगर उन्होंने घर पर बता दिया, तो उनकी पढ़ाई बंद कर दी जाएगी। परिवार ‘इज़्ज़त’ के नाम पर उन्हें रोक सकता है। भरोसे की कमी भी उन्हें चुप रहने पर मजबूर करती है। उन्हें लगता है कि अगर वे शिकायत भी करें, तो कोई उनकी बात को गंभीरता से नहीं लेगा। जानकारी की कमी एक और कारण है।
परिवार ‘इज़्ज़त’ के नाम पर उन्हें रोक सकता है। भरोसे की कमी भी उन्हें चुप रहने पर मजबूर करती है। उन्हें लगता है कि अगर वे शिकायत भी करें, तो कोई उनकी बात को गंभीरता से नहीं लेगा। जानकारी की कमी एक और कारण है।
बहुत-सी लड़कियों को यह पता ही नहीं होता कि शिकायत कहां और कैसे करनी है। इन सभी वजहों से चुप रहना उनकी पसंद नहीं, बल्कि मजबूरी बन जाता है। हमारे समाज में इज़्ज़त का बोझ सबसे ज्यादा लड़कियों पर डाला जाता है। किसी घटना में सवाल लड़के से नहीं, लड़की से किए जाते हैं—वह कहां गई, क्यों गई, क्या पहना था। लड़कों की गलतियों को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है, जबकि लड़कियों को हर बात के लिए जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है। यही जेंडर का फर्क है, जहां नियम अलग-अलग हैं। साथ ही, हर लड़की की स्थिति एक जैसी नहीं होती। खासकर गरीब परिवारों की लड़कियों के पास कम साधन और विकल्प होते हैं, इसलिए उन पर दबाव और ज्यादा होता है।
लड़कियों के अनुभव क्या कहते हैं?
लाजिकल इंडियन में नामांकन दरों में प्रगति के बावजूद, भारत में लगभग 40 फीसद लड़कियां घरेलू ज़िम्मेदारियों, सांस्कृतिक मान्यताओं, आर्थिक तंगी और अपर्याप्त बुनियादी ढांचे जैसी व्यवस्थागत चुनौतियों के कारण 10वीं कक्षा के बाद अपनी पढ़ाई जारी नहीं रख पाती हैं। जब लड़कियों से सीधे बात की जाती है, तो सच्चाई साफ सामने आती है। वे बताती हैं कि कॉलेज दूर होने के कारण रास्ते में होने वाली घटनाओं की तुरंत शिकायत करना मुश्किल होता है। यौन हिंसा आम है, लेकिन बदनामी के डर से वे चुप रहती हैं। कई बार उन्हें यह भी नहीं पता होता कि शिकायत कहां और कैसे करनी है।
वे बताती हैं कि कॉलेज दूर होने के कारण रास्ते में होने वाली घटनाओं की तुरंत शिकायत करना मुश्किल होता है। यौन हिंसा आम है, लेकिन बदनामी के डर से वे चुप रहती हैं। कई बार उन्हें यह भी नहीं पता होता कि शिकायत कहां और कैसे करनी है।
कॉलेजों में आंतरिक शिकायत समिति (आईसीसी) होती है, जिसका काम शिकायतों को सुनना और कार्रवाई करना है। लेकिन, कई लड़कियों को इसके बारे में जानकारी नहीं होती या उन्हें भरोसा नहीं होता कि उनकी बात सुनी जाएगी। प्रक्रिया जटिल होती है, कार्रवाई में देरी होती है और गोपनीयता को लेकर भी डर बना रहता है। चुप रहना उस समय आसान लगता है, लेकिन इसके गहरे असर होते हैं। इससे लड़कियों का आत्मविश्वास कम होता है, गलत करने वालों का हौसला बढ़ता है और धीरे-धीरे पूरा माहौल असुरक्षित हो जाता है। लड़कियां खुद को सीमित करने लगती हैं।
क्या हो सकता है आगे का रास्ता
बदलाव के लिए ज़मीनी स्तर पर काम जरूरी है। कॉलेजों में आईसीसी को सक्रिय बनाना होगा और हर विद्यार्थियों को इसकी जानकारी देनी होगी। शिकायत प्रक्रिया सरल और सुलभ होनी चाहिए। साथ ही, सुरक्षित आने-जाने की व्यवस्था और कैंपस में बेहतर सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी। सपोर्ट सिस्टम भी मजबूत होना चाहिए। ऐसे शिक्षक या काउंसलर होने चाहिए, जिनसे लड़कियां खुलकर बात कर सकें। परिवार और समाज को भी लड़कियों को रोकने के बजाय उनका साथ देना होगा। सबसे जरूरी है सोच में बदलाव जरूरी है। जब तक सोच नहीं बदलेगी, तब तक हालात नहीं बदलेंगे। हमें समझना होगा कि इज़्ज़त किसी लड़की की चुप्पी में नहीं होती; गलत करने वाले को शर्म आनी चाहिए, न कि आवाज़ उठाने वाली लड़की को। ये तीनों मिलकर लड़कियों को पीछे रोकते हैं। लेकिन, चुप रहना समाधान नहीं है। जरूरत है ऐसे माहौल की, जहां लड़कियां बिना डर अपनी बात कह सकें और उनकी बात सुनी भी जाए क्योंकि असली बदलाव तब शुरू होता है, जब चुप्पी टूटती है।

