भारत जैसे पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं को लंबे समय तक घर की जिम्मेदारियों तक सीमित रखा गया। घर संभालना ही उनकी मुख्य भूमिका मान ली गई। उन्हें बुनियादी शिक्षा से भी वंचित रखा गया और उच्च शिक्षा तक पहुंच अधिकतर पुरुषों तक ही सीमित रही। हालांकि समय के साथ हालात बदले हैं। अब शिक्षा में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है और महिला सशक्तिकरण में शिक्षा के महत्व को लेकर जागरूकता भी बढ़ी है। आज के भारत में यह बदलाव साफ दिखता है। जेएनयू, दिल्ली विश्वविद्यालय और जामिया मिलिया इस्लामिया जैसे बड़े संस्थानों में देशभर से लड़कियां पढ़ने आती हैं। इनमें बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड जैसे राज्य भी शामिल हैं, जहां आज भी कई जगह लड़कियों की शिक्षा के लिए संघर्ष जारी है। उच्च शिक्षा के ये संस्थान सिर्फ पढ़ाई की जगह नहीं होते, बल्कि ऐसे सामाजिक और राजनीतिक स्थान होते हैं, जहां अलग-अलग पृष्ठभूमि के छात्र-छात्राएं अपनी पहचान बनाते हैं, विचार साझा करते हैं और सीखते हैं। अगर कैंपस को नारीवादी नजरिए से देखें, तो एक अलग तस्वीर सामने आती है।
यहां छात्राओं की सुरक्षा, उनकी भागीदारी और उनके अधिकारों के मुद्दे कई बार पीछे छूट जाते हैं। कागजों पर बराबरी की बात होती है, लेकिन जमीन पर इसकी सच्चाई अलग हो सकती है। दिल्ली विश्वविद्यालय, जिसकी स्थापना 1922 में हुई थी, आज लाखों विद्यार्थियों का सपना है। एनआईआरएफ रैंकिंग 2025 में इसे देश के शीर्ष विश्वविद्यालयों में गिना गया है। यहां नॉर्थ कैंपस, साउथ कैंपस और ऑफ कैंपस मिलाकर कई कॉलेज हैं, जिनमें कुछ महिला कॉलेज भी शामिल हैं। यह विश्वविद्यालय अपनी सक्रिय राजनीति और सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए जाना जाता है। इन गतिविधियों में छात्राओं की भागीदारी भी दिखती है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह भागीदारी सच में बराबरी की है? क्या कैंपस में महिलाओं की सुरक्षा, सुविधाएं और शिक्षा का माहौल सही है? क्या जो समानता की बात की जाती है, वह वास्तव में जमीन पर भी दिखती है?
हमारे कॉलेज में पैड मशीन तो लगी है, लेकिन काम नहीं करती। जरूरत पड़ने पर हमें मेडिकल रूम जाना पड़ता है, और वहां भी हमेशा सही पैड नहीं मिलते।”
शिक्षा का स्तर और बुनियादी सुविधाओं की कमी
दिल्ली विश्वविद्यालय हर साल लाखों विद्यार्थियों को बेहतर शिक्षा और सुविधाओं के वादे के साथ आकर्षित करता है। लेकिन, यहां पहुंचने के बाद कई विद्यार्थियों को निराशा का सामना करना पड़ता है। खासकर छात्राओं के लिए यह स्थिति और चुनौतीपूर्ण हो जाती है। विद्यार्थी इस उम्मीद से दाखिला लेते हैं कि उन्हें अच्छी पढ़ाई, मजबूत बुनियादी ढांचा, सुरक्षा और जरूरी सुविधाएं मिलेंगी, लेकिन धीरे-धीरे उनकी उम्मीदें कम होती जाती हैं। शुद्ध पेयजल, साफ शौचालय और स्वच्छ कैंटीन जैसी बुनियादी सुविधाएं किसी भी कॉलेज के लिए बेहद जरूरी होती हैं। वे पूरे दिन कॉलेज में रहते हैं, इसलिए इन सुविधाओं का ठीक होना अनिवार्य है। लेकिन, दिल्ली विश्वविद्यालय के कई कॉलेजों में पानी की गुणवत्ता इतनी खराब है कि विद्यार्थी कैंपस का पानी पीने के बजाय पैक्ड पानी खरीदने को मजबूर हो जाते हैं।
इससे न केवल उनका खर्च बढ़ता है, बल्कि खराब पानी के कारण कई बार स्वास्थ्य समस्याएं भी सामने आती हैं। कालिंदी कॉलेज की छात्रा वंशिका बताती हैं, “हमारे कॉलेज में पैड मशीन तो लगी है, लेकिन काम नहीं करती। जरूरत पड़ने पर हमें मेडिकल रूम जाना पड़ता है, और वहां भी हमेशा सही पैड नहीं मिलते।” इन अनुभवों से साफ है कि कई महिला कॉलेजों में शौचालय और सैनिटरी सुविधाओं की स्थिति अब भी खराब है, जिससे छात्राओं को रोज़मर्रा में दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। एक दूसरी छात्रा आकांक्षा कहती हैं, “मैं यहां के वॉशरूम का इस्तेमाल नहीं करती। मुझे पास के मॉल जाना पड़ता है। हालात कुछ बेहतर हुए हैं, लेकिन फिर भी मैं इसे इस्तेमाल नहीं करना चाहती।”
“मैं यहां के वॉशरूम का इस्तेमाल नहीं करती। मुझे पास के मॉल जाना पड़ता है। हालात कुछ बेहतर हुए हैं, लेकिन फिर भी मैं इसे इस्तेमाल नहीं करना चाहती।”
कैंटीन की स्थिति भी कई जगहों पर चिंताजनक है। साफ-सफाई की कमी और भोजन की गुणवत्ता को लेकर लगातार शिकायतें आती रही हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, एक कॉलेज की कैंटीन में चूहों के दिखने तक की खबर सामने आई थी, जिसके बाद ठेके को रद्द करना पड़ा। शौचालयों की स्थिति भी कई कॉलेजों में खराब है। नियमित सफाई और पानी की कमी के कारण खासकर छात्राओं को काफी परेशानी होती है। कई जगहों पर सैनिटरी पैड वेंडिंग मशीनें तो लगी हैं, लेकिन वे अक्सर काम नहीं करतीं।
इसके कारण छात्राओं को पीरियड्स के दौरान गंभीर दिक्कतों का सामना करना पड़ता है, जिसका सीधा असर उनकी पढ़ाई और उपस्थिति पर पड़ता है। इन बुनियादी सुविधाओं की कमी यह दिखाती है कि सिर्फ नाम और रैंकिंग के आधार पर किसी संस्थान की वास्तविक स्थिति का आकलन नहीं किया जा सकता। दिल्ली विश्वविद्यालय के तहत आने वाले भारती कॉलेज की पत्रकारिता की एक छात्रा मिशिका (बदला हुआ नाम) बताती हैं, “कॉलेज का वॉशरूम इतना खराब है कि मेरी तबीयत बिगड़ गई और मुझे अस्पताल जाना पड़ा। इसकी वजह से मैं एक महीने तक कॉलेज नहीं आ पाई।”
एक दिन कॉलेज जाते वक्त एक गाड़ी मेरे पास रुकी। उसमें बैठे लोगों ने गंदे इशारे किए और मुझे अंदर आने को कहा। मैं डर गई और जल्दी से कॉलेज के अंदर चली गई। कॉलेज के पास पिंक बूथ है, लेकिन वहां कोई मौजूद नहीं था।
कैंपस और महिलाओं की सुरक्षा
दिल्ली विश्वविद्यालय में महिला सुरक्षा एक बहुत महत्वपूर्ण मुद्दा है। हाल के सालों में हुई कुछ घटनाओं ने इसे और गंभीर बना दिया है। साल 2023 में एक कॉलेज की छात्राओं का कपड़े बदलते समय वीडियो बना लिया गया, जिससे पूरे कैंपस में विरोध हुआ। इसी साल एक महिला कॉलेज के वार्षिक कार्यक्रम में कुछ बाहरी लोग दीवार फांदकर अंदर घुस आए और छात्राओं को परेशान किया। कई छात्राओं का कहना है कि कॉलेज आते-जाते समय भी उन्हें असुरक्षित महसूस होता है। एक छात्रा ने बताया, “एक दिन कॉलेज जाते वक्त एक गाड़ी मेरे पास रुकी। उसमें बैठे लोगों ने गंदे इशारे किए और मुझे अंदर आने को कहा। मैं डर गई और जल्दी से कॉलेज के अंदर चली गई। कॉलेज के पास पिंक बूथ है, लेकिन वहां कोई मौजूद नहीं था।” इस तरह की घटनाएं सिर्फ उस समय तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि छात्राओं के मन पर लंबे समय तक असर छोड़ती हैं। इससे उनके अंदर डर और असुरक्षा की भावना पैदा होती है, जो उनकी पढ़ाई और आत्मविश्वास दोनों को प्रभावित करती है।
छात्रावास और परिवहन
दिल्ली विश्वविद्यालय में हर साल पढ़ने के लिए आने वाले छात्रों की संख्या बहुत ज्यादा है, लेकिन छात्रावासों की संख्या उसके मुकाबले काफी कम है। विश्वविद्यालय के करीब 90 से ज्यादा कॉलेजों में से सिर्फ कुछ ही कॉलेजों में छात्रावास की सुविधा है। इनमें भी गिने-चुने महिला कॉलेज हैं, जहां लड़कियों के लिए हॉस्टल उपलब्ध हैं। इस वजह से दूसरे राज्यों से आने वाली कई छात्राओं को मजबूरी में प्राइवेट पीजी या किराए के कमरों में रहना पड़ता है। ये जगहें अक्सर महंगी होती हैं और सुरक्षा के लिहाज से भी हमेशा भरोसेमंद नहीं होतीं। ऐसे में छात्राओं को रोज़ कई तरह की चिंताओं का सामना करना पड़ता है। सिर्फ रहने की ही नहीं, कॉलेज तक पहुंचने की भी समस्या है।
विश्वविद्यालय के करीब 90 से ज्यादा कॉलेजों में से सिर्फ कुछ ही कॉलेजों में छात्रावास की सुविधा है। इनमें भी गिने-चुने महिला कॉलेज हैं, जहां लड़कियों के लिए हॉस्टल उपलब्ध हैं। इस वजह से दूसरे राज्यों से आने वाली कई छात्राओं को मजबूरी में प्राइवेट पीजी या किराए के कमरों में रहना पड़ता है।
कुछ महिला कॉलेज, जैसे भगिनी निवेदिता और अदिति कॉलेज, ऐसे इलाकों में हैं जहां परिवहन की सुविधा अच्छी नहीं है। रोज़ाना वहां पहुंचने के लिए छात्राओं को लंबा और मुश्किल सफर तय करना पड़ता है, जिससे समय और ऊर्जा दोनों खर्च होते हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय देश के प्रमुख विश्वविद्यालयों में गिना जाता है, लेकिन यहां पढ़ने वाली महिला छात्राओं के अनुभव कई कमियों की ओर इशारा करते हैं। साफ पानी, साफ शौचालय और सैनिटरी पैड जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी सीधे उनकी पढ़ाई और स्वास्थ्य को प्रभावित करती है। महिला सुरक्षा से जुड़ी घटनाएं भी चिंता बढ़ाती हैं। इससे साफ होता है कि बराबरी और सशक्तिकरण की बातें अक्सर सिर्फ कागज़ों तक सीमित रह जाती हैं।
छात्रावास और परिवहन की कमी महिला छात्रों के लिए और मुश्किलें बढ़ा देती है, खासकर उन लड़कियों के लिए जो दूर-दराज़ इलाकों से पढ़ने आती हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय सिर्फ पढ़ाई की जगह नहीं, बल्कि एक ऐसा स्थान है जहां छात्र अपनी पहचान बनाते हैं। लेकिन जब तक छात्राओं की सुरक्षा, सुविधाओं और अधिकारों को प्राथमिकता नहीं दी जाएगी, तब तक असली सशक्तिकरण संभव नहीं है। जरूरी है कि विश्वविद्यालय ऐसा माहौल बनाए जहां हर छात्रा खुद को सुरक्षित, सम्मानित और बराबरी का हकदार महसूस कर सके।

