हिंदी में होगी अब जेंडर और नारीवाद की बात फेमिनिज़म इन इंडिया के साथ

इंटरसेक्शनल

‘अपना खून’ कितनी जातिवादी और पितृसत्तात्मक है यह सोच!

अगर बच्चे की रंगत उसकी शक्ल-सूरत पिता की तरह हो तो इससे किसी को भी कोई दिक़्क़त नहीं होती। यह बात किसी को भी परेशान नहीं करती कि बच्चे में माँ की रंगत या शक्ल-सूरत से मिलता-जुलता कुछ नहीं है।

स्वास्थ्य

अतरंगी रे: मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दे पर गढ़ी गई एक असंवेदनशील कहानी

फिल्म में मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दे का प्रयोग इसे ड्रामैटिक और मनोरंजक बनाने के लिए किया गया है। एक गंभीर विषय को मात्र मनोरंजन का विषय बना दिया गया है।

क्या आप सैनेटरी पैड्स का इतिहास जानते हैं?

यह सही बात है कि अधिकांश पुरुष पीरियड्स शब्द तक बोलने से कतराते हैं, लेकिन शुरुआत में सैनिटरी पैड्स उनके लिए ही बनाए गए थे। फ्रांस में काम करनेवाली अमेरिकी नर्सों द्वारा प्रथम विश्व युद्ध में घायल हुए सैनिकों के बहते खून को नियंत्रित करने के लिए डिस्पोज़बल पैड विकसित किए गए थे।

समाज

उत्तर प्रदेश चुनाव 2022: पार्टियों के वादों में महिलाओं के लिए क्या नया है इस बार

महिलाओं के संदर्भ में हर दल अपनी रणनीति बनाता दिख रहा है। राजनीतिक दल अपने-अपने घोषणापत्रों में महिला कल्याण की नीतिों और वादों का ऐलान कर रहे हैं। आइए, एक नज़र डालते हैं महिलाओं को लेकर राजनीतिक दलों के चुनावी घोषणापत्र पर।

संस्कृति

समीक्षा फिल्म ‘सात ख़ून माफ़’ की ‘सुज़ैन’ के नज़रिये से

फिल्म में सुज़ैन की तलाश अपने सच्चे प्यार की होती है, जिस प्रेम को पाने के लिए सुज़ैन एक के बाद एक सात शादियां करती है। सात शादियों के बावजूद उसे वह प्रेम किसी मर्द से नहीं मिलता जो जिसकी उसे तलाश होती है। फिल्म में दिलचस्प बात यह है कि सुजै़न पति अलग-अलग धर्म जाति और उम्र से ताल्लुक रखते हैं। समुदाय मर्दों के क्यों न अलग हो पर सोच सबकी वही पितृसत्ता से लबरेज़ दिखाई पड़ती है। पुरुष बिना स्वार्थ के किसी महिला के जीवन में नहीं आता, फिल्म में यह बखूबी दिखाया गया है।

दुर्गा खोटे : सिनेमा जगत के शुरुआती दौर की एक बेहतरीन अदाकारा| #IndiaWomenInHistory

यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि दुर्गा खोटे जैसी महिलाओं ने ही हिंदी सिनेमा में भारतीय महिलाओं के काम करने का मार्ग प्रशस्त किया। इंडस्ट्री में इनका सफर काफी लंबा रहा। इन्होंने नायिका से लेकर नायक की माँ तक की भूमिका निभाकर अपनी एक अलग पहचान बनाई।

ट्रेंडिंग

दया पवार: अपने लेखन से जाति विरोधी आंदोलन में को आवाज़ देने वाले लेखक

दया पवार : अपने लेखन से जाति विरोधी आंदोलन को आवाज़ देने वाले लेखक

1978 में दया पवार की आत्मकथा 'बलुत' प्रकाशित होती है। पवार की आत्मकथा दलित साहित्य में पहली आत्मकथा मानी जाती है।
इन 15 महिलाओं ने भारतीय संविधान बनाने में दिया था अपना योगदान

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संविधान सभा में हम उन प्रमुख पंद्रह महिला सदस्यों का योगदान आसानी से भुला चुके है या यों कहें कि हमने कभी इसे याद करने या तलाशने की जहमत नहीं की| तो आइये जानते है उन पन्द्रह भारतीय महिलाओं के बारे में जिन्होंने संविधान निर्माण में अपना अमूल्य योगदान दिया है|  
पितृसत्ता क्या है? – आइये जाने  

पितृसत्ता क्या है? – आइये जाने  

पितृसत्ता एक ऐसी व्यवस्था के रूप में परिभाषित किया जाता है जिसमें पुरुषों का महिलाओं पर वर्चस्व रहता है और वे उनका शोषण और उत्पीड़न करते हैं|

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पैड खरीदने में माँ को आज भी शर्म आती है

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मासिकधर्म और सैनिटरी पैड पर हमारे घरों में चर्चा करने की बेहद ज़रूरत है और जिसकी शुरुआत हम महिलाओं को ही करनी होगी।
लैंगिक समानता : क्यों हमारे समाज के लिए बड़ी चुनौती है?

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गाँव हो या शहर व्यवहार से लेकर काम तक लैंगिक समानता हमारे समाज में मौजूद है, जो हमारे देश के लिए एजेंडा 2030 को पूरा करने में बड़ी चुनौती है|
उफ्फ! क्या है ये नारीवादी सिद्धांत? आओ जाने!

उफ्फ! क्या है ये ‘नारीवादी सिद्धांत?’ आओ जाने!

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नारीवाद के बारे में सभी ने सुना होगा। मगर यह है क्या? इसके दर्शन और सिद्धांत के बारे में ज्यादातर लोगों को नहीं मालूम। इसे पूरी तरह जाने और समझे बिना नारीवाद पर कोई भी बहस या विमर्श बेमानी है। नव उदारवाद के बाद भारतीय समाज में महिलाओं के प्रति आए बदलाव के बाद इन सिद्धांतों को जानना अब और भी जरूरी हो गया है।

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इतिहास

नारीवाद

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बिहार : रोहतास ज़िले के नक्सल प्रभावित क्षेत्र की ‘राजमिस्त्री महिलाओं’ ने लिखी बदलाव की नयी कहानी

आज जिन महिलाओं की कहानी आपके सामने हैं उनके हौसले ने पितृसत्ता की बंदिशें तोड़ी हैं। ये महिलाएं अपनी क्षमता से बदलाव की राह दिखाने वाली नायिकाएं हैं। इन्होंने राजमिस्त्री के पुरुषों वाले पांरपरिक पेशे को अपनाकर न केवल खुद के लिए रोज़गार के नये विकल्प चुने बल्कि अपने परिवार और बच्चों के जीवन को भी बेहतर किया है।
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