हिंदी में होगी अब जेंडर और नारीवाद की बात फेमिनिज़म इन इंडिया के साथ

इंटरसेक्शनल

क्या वाक़ई जातिगत भेदभाव अब ख़त्म हो गया है?

आप कहते हैं अब कहाँ जात-पात है? आपने भी कई बार यह सुना होगा कि अब जात-पात ख़त्म हो गया है और सब जगह समानता आ गई है। अगर आपको भी इस बात पर विश्वास है तो इसका मतलब है कि आपके पास कई विशेषाधिकार हैं।

स्वास्थ्य

बात मेंस्ट्रुअल कप की पहुंच और इससे जुड़े मिथ्यों की

ग्रामीण क्षेत्र तक मेंस्ट्रुअल कप की पहुंच बहुत ज़रूरी है क्योंकि यह पर्यावरण हितैषी तो है ही साथ ही लोगों के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक भी नहीं है। मेंस्ट्रुअल कप शहरों के साथ-साथ गांव में भी अपनी पहुंच बनाने लगे तो इससे स्वास्थ्य वह पर्यावरण के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव माना जाने लगेगा

क्या मीडिया में अबॉर्शन पर आधारित जानकारी में भी नैतिकता का पाठ पठाया जाएगा?

वैसे तो भारतीय मीडिया में गर्भसमापन जैसे विषय पर रिपोर्ट्स बहुत ही कम देखने को मिलती हैं। प्रमुख मीडिया प्लैटफॉर्म में गर्भसमापन से संबधित कवरेज सामाजिक विचारों पर ज्यादा निर्भर रहते हैं।

समाज

पश्चिम बंगाल में बढ़ती महिलाओं और बच्चों के खिलाफ हिंसा चिंताजनक

राष्ट्रीय महिला आयोग के साल 2018-19 की रिपोर्ट के अनुसार सबसे अधिक शिकायतों वाले दस राज्यों में से पश्चिम बंगाल आठवें पायदान पर था। साल 2018-19 के दौरान आयोग द्वारा विचार किए गए विशेष मामलों में बंगाल के कई मामले शामिल थे। पिछले दिनों मालदा और बर्धमान जिले में आदिवासी महिलाओं की बलात्कार की घटनाएं राज्य के सुरक्षा और कानून व्यवस्था पर दोहरा सवाल खड़ा करती हैं। द हिंदुस्तान टाइम्स में छपी रिपोर्ट अनुसार पिछले साल राष्ट्रीय महिला आयोग ने पश्चिम बंगाल में महिलाओं के खिलाफ अपराध और मानव तस्करी के मामलों में वृद्धि और बलात्कार पीड़ितों को पुलिस से मदद मिलने में कमी जैसे कई मुद्दों का संज्ञान लेते हुए चिंता व्यक्त की थी। इस रिपोर्ट के मुताबिक राष्ट्रीय महिला आयोग ने राज्य से सुओ मोटो मामले सहित 267 से अधिक शिकायतें पाई जिन पर राज्य पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की थी।

संस्कृति

क्लिकबेट्स के बाज़ार में महिला-विरोधी कॉन्टेंट परोसता मीडिया

बाज़ारवादी मीडिया में खबरों को जनसरोकार से परे ज्यादा से ज्यादा हिट्स के लिहाज़ से लिखा जाता है। किस तरह से ज्यादा हिट क्लिक मिलेंगें उसे सोचकर जो लिखा जा रहा है

जेंडर पर आधारित पांच किताबें जो हमें पढ़नी चाहिए

नारीवादी किताबें पढ़नी चाहिए ताकि जान सकें अतीत की लैंगिक नाइंसाफियों को, वर्तमान के बदलावों को और भविष्य के संभावित विद्रोहों को। एक ऐसी विचारधारा जो आज समाज के लिए आवश्यक हो चुकी है, उससे जुड़ी किताब आपको बदलते समाज के साथ तालमेल बैठाने में मदद कर सकती हैं।

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इन 15 महिलाओं ने भारतीय संविधान बनाने में दिया था अपना योगदान

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संविधान सभा में हम उन प्रमुख पंद्रह महिला सदस्यों का योगदान आसानी से भुला चुके है या यों कहें कि हमने कभी इसे याद करने या तलाशने की जहमत नहीं की| तो आइये जानते है उन पन्द्रह भारतीय महिलाओं के बारे में जिन्होंने संविधान निर्माण में अपना अमूल्य योगदान दिया है|  
सत्यशोधक समाज: कैसे ज्योतिबा फुले ने दी थी ब्राह्मणवादी व्यवस्था को चुनौती

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यह लेख सत्यशोधक समाज पर केंद्रित है जिससे हम यह पहचान पाएंगे कि ज्योतिबा फुले किस तरह के समाज की परिकल्पना कर रहे थे, वे कैसा समाज देखना चाहते थे जिसको साकार करने के लिए उन्होंने कदम बढ़ाए
आइए, जानते हैं मास्टरबेशन से जुड़े पांच मिथ्यों के बारे में

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पिछले कुछ दशकों में मास्टरबेशन यानि हस्तमैथुन के बारे में समाज की सोच में बहुत कुछ बदला तो है लेकिन जब भी बात महिलाओं के आत्मसुख की आती है तो पितृसत्तात्मक समाज की आंखें और कान दोनों खड़े हो जाते हैं। अभी भी महिलाओं के लिए एक लंबा सफर तय करना बाकी है। आज भी समाज में सेक्स और महिलाओं की यौनिकता को लेकर कई पूर्वाग्रह हैं और उससे संबंधित कई मिथ्य मौजूद हैं। जैसे महिलाएं मास्टरबेशन यानि हस्तमैथुन नहीं करती हैं जबकि मास्टरबेशन एक सामान्य शारीरिक क्रिया है, जिससे व्यक्ति को आत्मसुख मिलता है। लोगों को मास्टरबेशन नहीं करना चाहिए, इसका कोई ठोस चिकित्सीय कारण मौजूद नहीं है। हालांकि इसको लेकर पितृसत्ता की पुरानी सांस्कृतिक धारणाएं और मिथ्य अभी भी मौजूद हैं। आइए जानते हैं मास्टरबेशन यानि हस्तमैथुन से जुड़े ऐसे ही मिथ्यों के बारे में।

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