समाजपरिवार परिवार का लोकतांत्रिक ना होना समानता और न्याय प्राप्ति में एक बड़ी बाधा है

परिवार का लोकतांत्रिक ना होना समानता और न्याय प्राप्ति में एक बड़ी बाधा है

हमें विचार करना होगा की परिवार की परिभाषा ही क्या है या परिवार को लेकर हमारी क्या समझ है? क्या हमारे परिवार का ढांचा लोकतांत्रिक है?

किसी भी समाज और राज्य की सबसे छोटी इकाई परिवार है। परिवार का प्रतिबिंब ही हमें समाज में देखने को अक्सर मिल जाता है कि हमारा समाज समानता पर आधारित न्यायप्रधान है या नहीं। परिवार को सबसे ज्यादा सुरक्षित जगह समझा जाता है लेकिन कई बार परिवार ही वह जगह बन जाता है जहां से भेदभाव, अन्याय और असमानता की शुरुआत होती है। समाज में और राज्य में महिलाएं कितनी सुरक्षित हैं, महिलाओं के साथ होने वाले अत्याचार, हत्या, हिंसा और बलात्कार की खबरें आए दिन अखबारों की सुर्खियां बनती रहती हैं। जो यही दिखाती हैं कि हमारा समाज अब भी समानता और न्याय से काफी दूर है क्योंकि हमारा परिवार भी अभी तक लोकतांत्रिक मूल्यों को अपना नहीं पाया है। यहां हमें इस सवाल पर विचार करना होगा की परिवार की परिभाषा क्या है या परिवार को लेकर हमारी क्या समझ है? क्या हमारे परिवार का ढांचा लोकतांत्रिक है? क्या वहां महिला और पुरुष दोनों को समान अधिकार दिए गए हैं या नहीं और महिला और पुरुषों की संसाधनों पर बराबर पहुंच है या नहीं।

परंपरागत भारतीय परिवार की संकीर्ण परिभाषा

जब भी हम परिवार के बारे में सोचते हैं तो उस परिवार में एक पति (पुरुष) होता है एक पत्नी (महिला) होती है और उनके बच्चे होते हैं। इसके अलावा दादा-दादी (यानी पिता के माता पिता) चाचा ताऊ (पिता के भाई) शामिल हो सकते हैं। हम देख सकते हैं कि परिवार की परिभाषा जैविक और विषमलैंगिक तक सीमित है। यानी परंपरागत भारतीय परिवार की दो विशेषताएं हम देख सकते हैं पहला कि परिवार जैविक होते हैं (यानी रक्त के संबंधों से जुड़े होते हैं) और दूसरा परिवार हमेशा विषमलैंगिक होते हैं (यानी परिवार में एक स्त्री, पुरुष और उनके बच्चें शामिल होते हैं) परिवार की यह परिभाषा है संकीर्णता को दर्शाती है।

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बच्चों को भी इन परिवारों में इसी संकीर्ण सोच के साथ बड़ा किया जाता है और बच्चों को भी पितृसत्तात्मक ढांचे के तहत  ढाला जा सके ताकि वे भी अपने व्यवहार में, भाषा में, लैंगिक भेदभाव की पहचान न कर सके ना ही उसे चुनौती दे सके ताकी इस तरह वह बच्चा आगे चलकर परंपरागत भारतीय परिवारों का दोबारा उत्पादन या सामाजिक संबंधों को दोबारा पुष्ट कर सके। इसलिए ऐसे परिवार में लैंगिक भेदभाव को ध्यान में रखते हुए स्त्री और पुरुष दोनों की सामाजिक भूमिकाएं तय कर दी जाती हैं। स्त्री की प्रमुख भूमिका पत्नी, बहन, बेटी के रूप में सामने आती है जबकि पुरुष की प्रमुख भूमिका घर को चलाने वाले सदस्य यानी कमाने वाली की होती है। अगर कोई भी व्यक्ति इन सामाजिक भूमिकाओं को चुनौती देता है या देने का दुस्साहस करता है तो उन्हें सज़ा भी दी जाती है।

परिवार एक संस्था के रूप में हमेशा लैंगिक भेदभाव को बनाए रखना चाहता है। इसीलिए ज़रूरत इस बात की है कि परिवार के ढांचे और संरचना को लोकतांत्रिक बनाया जाए ताकि परिवार के बच्चे में पैदा होने वाले बच्चों की सोच बचपन से ही लोकतांत्रिक मूल्यों के महत्व को समझाया जा सके।

घर के कामों का लैंगिक विभाजन

परिवार में हमें स्त्री और पुरुष दोनों के लिए स्पष्टता से कामों का बंटवारा देखने को मिलता है कि कौन से काम लड़कियां या महिलाएं करेंगी और कौन से काम लड़के या पुरुष करेंगे। इसी विभाजन को काम का लैंगिक विभाजन कहा जाता है। लिंग या जेंडर के आधार पर घर और घर के बाहर के कामों को बांटा जाता है जिसके अनुसार घर के भीतर के सारे काम जैसे रसोई का काम साफ-सफाई, बड़े-बूढ़े और बच्चों की देखभाल को ‘घरेलू काम’ या ‘औरतों के काम’ कहा जाता है। जबकि घर के बाहर के काम विशेषकर पैसा कमाना पुरुषों की जिम्मेदारी के तौर पर देखी जाती है। श्रम का लैंगिक विभाजन अब हमें सार्वजनिक क्षेत्रों में  (घर के बाहर) भी देखने को मिलता है जैसे नरसिंग और रिसेप्शनिस्ट जैसे काम महिलाओं और लड़कियों के लिए सुरक्षित रख दिए जाते हैं जिन्हें घरेलू कामों के ही विस्तार के रूप में देखा जाता है। साथ ही यह भी कहा जाता है कि लड़कियां या महिलाएं केवल हल्के कामों के लिए ही बनी हैं, उनसे मेहनती काम नहीं होंगे।

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हालांकि, ग्रामीण परिवेश में हम देख सकते हैं कि आज भी महिलाएं कई किलोमीटर चलकर पानी भरकर लाती हैं, खेतों में खूब मेहनत करती हैं, घरों में जानवरों की देखभाल करती हैं, जो किसी भी नज़र से हल्के काम नहीं हैं। लेकिन हमने अपने ज़हन में बहुत से पूर्वाग्रहों को जगह दे रखी है जिसके कारण हम इस लैंगिक भेदभाव को समझ ही नहीं पाते हैं। दूसरी चीज़ यह है कि आज भी भारतीय परंपरागत परिवार में लड़कियों की स्थिति पुरुषों की तुलना में कमतर ही समझी जाती है क्योंकि आज भी महिलाओं के खिलाफ घरेलू हिंसा, बलात्कार अत्याचार जैसी घटनाएं हर दिन होती रहती हैं। आज भी लड़कियों की शिक्षा पर लड़कों की तुलना में कम निवेश किया जाता है। आज भी बेटे की चाह में ना जाने कितनी भ्रूण हत्या की जाती है। आज भी महिलाओं और बेटियों के जीवन में विवाह ही केंद्र बना हुआ है।

परंपरागत परिवार को मिलती चुनौतियां

परिवार एक संस्था के रूप में हमेशा लैंगिक भेदभाव को बनाए रखना चाहता है। इसीलिए ज़रूरत इस बात की है कि परिवार के ढांचे और संरचना को लोकतांत्रिक बनाया जाए ताकि परिवार के बच्चे में पैदा होने वाले बच्चों की सोच बचपन से ही लोकतांत्रिक मूल्यों के महत्व को समझाया जा सके। परिवार के खुले माहौल में उन्हें खून के रिश्तो के अलावा दोस्ती के रिश्ते का महत्व भी समझाया जा सके उन्हें समलैंगिक संबंधों के प्रति उदार बनाया जा सके और इसी दिशा में हमें पहल होती नजर आ रही है जैसे बच्चों को गोद लेना, सरोगेसी संतान, विवाह ना करना, बच्चे पैदा ना करना, समलैंगिक संबंध इस जैविक लैंगिक परिवार की परिभाषा को चुनौती देते दिख रहे हैं।

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तस्वीर : सुश्रीता भट्टाचार्जी 

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