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“अगर मैं पुरुष होती तो मैं बच्चा पैदा नहीं करती – बचपन से ही ये समझाया जाता है कि एक लड़की पूरी महिला तभी बनती है, जब उसकी शादी हो और वो बच्चे को जन्म दे। इसके बाद बच्चे की पूरी परवरिश, देखभाल, पढ़ाई आदि की जिम्मेदारी और चिंता मां पर आ जाती है तो अगर मैं लड़का होती तो मुझपर ऐसी किसी जिम्मेदारी का दवाब नहीं होता”- महिला प्रतिभागी, नागेपुर गांव (वाराणसी)

जिस समाज में हम रहते हैं, वहां जेंडर ने अपनी पकड़ इतनी मज़बूती से बना रखी हैं कि हर पहलू में हमें अपनी जेंडर पहचान की वजह से असमानता का सामना करना और जूझना पड़ता है| ऐसे में सामाजिक मुद्दों पर काम कर रहे लोग भी इस ढांचे की गिरफ्त में नजर आते हैं। गौर करने वाली बात ये भी है कि बड़े और छोटे शहरों में तो जेंडर और जेंडर आधारित हिंसा पर जागरुकता, चिंतन और चर्चा जोरो-शोरों से होती आ रही हैं, लेकिन गांवों में रहने वाली देश की अधिकतम जनता इन मुद्दों पर अभी भी घोर अंधेरे में है। इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए दिल्ली की संस्था ‘साहस’ और वाराणसी के गांवों में काम करने वाली संस्था ‘मुहीम’ ने हाथ मिलकर ‘जेंडर ग्राम’ मूवमेंट की शुरुआत की है। इस प्रोजेक्ट का मुख्य उद्देश्य वाराणसी के गांवों को जेंडर समावेशी और संवेदनशील बनाना है ताकि जेंडर असमानता को बढ़ावा देने वाली मानसिकता को जड़ से हटाया जा सके।

जेंडर ग्राम के तहत वाराणसी में अलग-अलग गांवों में सामाजिक मुद्दों पर काम करने वाले समाजसेवियों के साथ ‘जेंडर, यौनिकता और सरोकार’ पर केंद्रित प्रशिक्षण का आयोजन किया गया। जेंडर पर बातचीत क्यों जरुरी है? और क्या सामाजिक सरोकार के मुद्दों को जेंडर के साथ जोड़कर देखा जाना चाहिए?, जैसे सवालों का आसान जवाब तब मिलता है जब हम अपने जीवन में इस भेदभाव को देख पाते हैं। इसलिए जब प्रतिभागियों को अपने जीवन में झांककर तीन ऐसी बातें सांझा करने के लिए कही गई जो उन्हें उनके मर्द या औरत होने की वजह से कही गई है तो अनेक कही-अनकही कहानियां सामने आई-

अगर लड़की हो तो तुम्हारे साथ छेड़खानी होगी ही, कितने बार हमारी संगी-साथी गांव में आने जाने के दौरान लड़के लोग खींच लेते हैं, बदतमीज़ी करते हैं|

 “अगर लड़का रो दे तो उसका बुरी तरह मज़ाक उड़ाया जाता है, क्रीम-पाउडर लगा ले तो उसे औरत कहकर ताना मारा जाता है, लड़कियों से बातचीत पर भी रोक-टोक रहती है|

“घर से बाहर जाने पर सवाल किए जाते हैं, हमेशा अनुमति लेकर बाहर जाना पड़ता है, दोपहर बाद जल्दी घर लौटने को कहा जाता है, ज्यादा टीवी देखने के लिए मनाही है क्योंकि लड़कियां बिगड़ जाती है, जोर –जोर से हंसने पर मनाही- बोलते हैं कि क्या बेशर्म हो, लड़कों की तरह हो-हो करके क्यों हंसती हो”

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जब भी हिंसा की बात होती है तो दिमाग में हत्या, मारपीट, बलात्कार, देहज हत्या की तस्वीरें उभरती है, लेकिन जेंडर आधारित हिंसा महज शारीरिक नहीं बल्कि मानसिक, सांस्कृतिक, मौखिक और यौनिक भी होती है| इसपर समझ बनाने के लिए पहले जेंडर के ढांचे से लबरेज मानसिकता पर चोट करने की जरुरत महसूस हुई। ऐसा इसलिए क्योंकि हम हिंसा रुपी बीमारी का तोड़ कानून, पुलिस और कई बार आंदोलन के जरिए ढूंढ तो लेते हैं पर उसकी असली जड़ यानी जेंडर के ढांचे में बंधी हुई मानसिकता पर चोट करना भूल जाते हैं जिसकी वजह से जेंडर आधारित हिंसा अपना प्रकोप बनाए रखे हैं।

मेरे ससुरालवाले मुझपर काम छोड़ने का दवाब डालते हैं, तकरीबन हर रोज कुछ न कुछ करते हैं, ताने मारते हैं लेकिन मेरे लिए ये नौकरी बहुत जरुरी है- मुझे आर्थिक सुरक्षा मिलती है और साथ ही घर से बाहर निकल पाती हूं|

मैंने अपने समुदाय में देखा है कि बेटे की चाहत में महिलाओं को बार-बार गर्भवती होने के लिए विवश किया जाता है, लड़की पैदा होने पर महिलाओं की बेइज्जती करना, ताने मारे जाते है। लड़के की पसंद से शादी होने पर भी वो लड़की पर अत्याचार करता है।

जेंडर की बात यौनिकता पर चर्चा किए बिना एकदम अधूरी है क्योंकि जेंडर का ढांचा चीख-चीखकर जेंडर बाइनरी की ओर ढकेलता है यानी कि आप या तो औरत हो सकते हैं या फिर मर्द इसके अलावा और कई पहचान तो समाज में हो ही नहीं सकती। इसलिए गांव में काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ताओं में इस बात की समझ बनाना कि यौनिकता का संबंध केवल सेक्स से नहीं बल्कि यौनिकता आपके व्यक्तित्व का केंद्र-बिंदु है। महिला-पुरुष के परे भी पहचानें है जिनके बारे में बात करना, समझना और इस बातचीत को नार्मलाइज़ करना जरुरी है| तभी जेंडर समावेशी समाज का निर्माण हो सकता है और हम विकासशील और गैर-बराबरी रहित भविष्य की ओर बढ़ पाएंगे। ये चर्चा गांव के परिपेक्ष्य में शायद पहली बार हो रही थी इसलिए प्रतिभागी कौतूहल से भरे नज़र आए और उन्होंने सवालों की छड़ी लगा दी।

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“शुरुआत में तो दीदी बहुत शर्म आ रही थी, क्योंकि ग्रुप में बात हो रही थी इसलिए अपनी बात रखना आसान हो गया। अकेली होती तो शायद बोल नहीं पाती। पर अब मुझे कोई शर्म नहीं लग रही बल्कि आत्मविश्वास बढ़ गया है क्योंकि कई नई बातें जानने को मिली हैं।”

“कुछ समय पहले हमारे यहां सुनने में आया था कि एक आईएएस अफसर जिनकी बीबी और बच्चे हैं अब वो अपने आप को महिला के तौर पर अभिव्यक्त करते हैं। क्या ऐसा हो सकता है और आपका उनके बारे में क्या विचार है?”

“मैंने पहली बार यौनिकता शब्द के बारे में सुना है, यौनिक पहचानों के बारे में तो कोई जानकारी नहीं थी। लेकिन आपकी बातें सुनने के बाद गांव में काम के दौरान हुई कई बातें और अनुभव याद आ रहे है। मुझे लगता है कि इन मुद्दों पर समझ बनाने की बहुत जरुरत है।”

ये सभी प्रतिभागी वाराणसी से जुड़े गांवों में महिलाओं, किशोरियों और युवाओं के साथ शिक्षा, माहवारी, रोजगार – सिलाई सेंटर, समेत अलग अलग मुद्दों पर काफी समय से काम कर रहे हैं, जाहिर सी बात है कि कार्यशाला में निकलकर आई कहानियां और चर्चा इनके निजी जीवन और कार्यस्थल से जुड़ी हुई है इसलिए जेंडर और जीवन का जुड़ाव रुपी पहली सीढी इन्होंने पार कर ली है। दूसरी बात ये कि वो समझ पा रहे थे कि उनका काम और जेंडर दो अलग-अलग बातें नहीं है, एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। ऐसे में प्रशिक्षण के दौरान बनाई समझ को अपने काम से जोड़कर प्रतिभागियों ने अपने-अपने समूह में एक्शन प्रोजेक्ट तैयार किए-

गांवों में कई दीवारों पर, सड़कों पर अकेली खड़ी दीवारों पर कई बार लिखा होता है कि गुप्त रोगी यहां आकर मिलें, यहां उन्हें सहायता मिलेगी – ये सब देखकर युवाओं के मन में कई सवाल उठते हैं, यौनिकता और निजी अंगों के बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं होती – ऐसे में स्कूली शिक्षा के साथ साथ मैं उनके साथ जेंडर, सेक्स और यौनिकता पर भी बातचीत करुंगा। मैंने एक नाटक मंडली तैयार की, हम कोशिश करेंगे कि इन मुद्दों पर नाटक के जरिए लोगों को जागरुक किया जा सके।

“सिलाई सेंटर में किशोरियां और महिलाओं के साथ हम माहवारी के मुद्दे पर बातचीत करते हैं। अब हम माहवारी को जेंडर से जोड़कर बात कर पाएंगे। हम उनके साथ रोजमर्रा के जीवन में दिखने वाले जेंडर आधारित भेदभाव, हिंसा के प्रति जागरुक करेंगे ताकि वो समझ पाएं कि उनका लड़की होना उनकी क्षमताओं को नहीं बांध सकता। वो अपनी इच्छाओं और आकाँक्षाओं को पूरा कर सकती है। अगर किसी के साथ हिंसा होगी तो हम उसकी सहायता करने की कोशिश भी करेंगे|”


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