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शालिनी सिंह 

सेक्शुअलिटी को हिंदी में यौनिकता शब्द से संबोधित करते हैं| ये शब्द भी अपने आप में बहुत कुछ कहता है। कई बार इस शब्द को जोड़कर हम आसानी से मान लेते हैं कि यौनिकता सिर्फ यौनिक मुद्दों की बात है| ये शरीर से जुड़ा मामला है| पर हम इसबात पर सवाल नहीं उठाते कि क्या यौनिक मुद्दे सिर्फ़ शरीर से जुड़े है? किसी भी पल किसी जगह और किसी भी समय, शरीर कैसे खुद को अभिव्यक्त  करता है या खुद को महसूस करता है, इस पहलू पर बहुत कम बात होती है। क्या मन और शरीर बिलकुल अलग होकर अभिव्यक्त किए जा सकते हैं?  यौनिकता पर चर्चा ज़रूर शरीर की बात करना है पर शरीर कई अनुभवों से जुड़ता है, जिसमें नियंत्रण, प्यार, आज़ादी, तकलीफ़ और आनंद सब कुछ शामिल होता है। और फिर हम हिंसा और नियंत्रण की बात तो आसानी कर लेते है पर आनंद की नहीं, आखिर क्यों? क्योंकि शायद ये नैतिक रूप से अस्वीकार्य होता है या फिर शायद शरीर को ख़ुशी से  जोड़ना ही नहीं चाहिए?

हमारा शरीर बचपन से ही सीख रहा होता है कि किस बात को कैसे अभिव्यक्त करना है| किन विषयों पर बड़े किस तरह प्रतिक्रिया देते हैं और किन पर चुप्पी लगा लेते हैं। ये सारे अनुभव मिलकर हमारे शरीर का निर्माण करते हैं और साथ में ये भी तय करते है कि शरीर के किन अनुभवों को हम भाषा दे सकते हैं और किन्हें नहीं। यौनिकता पर कसी गयी चुप्पी के कारण बड़े होते समय हमें अपनी भाषा में ना ही शरीर के बारे में जानकारी मिलती है और ना ही उनसे जुड़े अनुभवों की बात होती है तो ऐसे में हम बात करें कैसे? उदाहरण के लिए माहवारी की बात करें तो इसपर बात करते समय कुछ लोग ‘महीना’ बोलते हैं तो कुछ लोग ‘मासिक धर्म’ बोलते हैं तो कुछ लोग ‘माहवारी’ बोलते हैं। नहीं पता कि किस शब्द के क्या मायने है और किसे कब इस्तेमाल करना है। इन शब्दों से हिन्दी भाषी खुद इतने अनजान हैं कि कैंपेन और आंदोलन में भी मेन्स्रुएशन  और पीरियड्स  जैसे शब्दों का ही उपयोग होता है। सोचने की बात है कि इतने व्यक्तिगत मसले में भी हमें अपनी भाषा के शब्दों का इस्तेमाल करने में हिचक क्यों होती है? और इसके लिए अंग्रेज़ी के ही शब्द इतने प्रचलित क्यों हैं?

यौनिकता की बजाय ‘सेक्सुअलिटी’ क्यों प्यारी है?

मैं ज़्यादातर काम हिन्दी भाषा में करती हूँ  और मेरी पहली भाषा भी हिन्दी है| लेकिन दुर्भाग्यवश हिंदी में यौनिकता पर बात करना बहुत ही मुश्किल होता है। शब्द मिलते ही नहीं, ऐसे में अपनी बात को सही तरीके से पहुँचाने के लिए किन सही और सटीक शब्दों को चुने, ये अपने आप में एक बड़ी चुनौती है। गौरतलब है कि मुख्यधारा में यौनिकता से जुड़े ज़्यादातर शब्द अंग्रेज़ी से आते हैं, जो शायद चर्चा को आसान भी बना देते हैं। पर यहाँ हमें ये भी समझना होगा कि आखिर यौनिकता पर बात करते समय अंग्रेजी के शब्दों को इस्तेमाल करना आसान क्यों लगता है?

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वाकई ये दिलचस्प है कि हमें अंग्रेजी की गालियाँ तक मंजूर हैं| ये ‘कूल’ मानी जाती हैं| पर हिन्दी में उन्हीं गालियों को सोच भी नहीं सकते बोलना तो दूर की बात|

समुदाय में काम करते वक़्त भी कई बार ये सवाल मन में उठा कि क्यों तथाकथित कम पढ़े-लिखे लोग भी इस मुद्दे पर बात करते समय अंग्रेजी के ही शब्द इस्तेमाल करते हैं? इसका शायद एक कारण ये हो सकता है कि अंग्रेजी के शब्दों से या दूसरी भाषा से हमारा वो जुड़ाव नहीं होता जो अपनी पहली भाषा से होता है। अपनी भाषा में बात करते समय लोग उससे कई तरह से जुड़ाव महसूस करते हैं और अगर हिन्दी भाषी लोग हिन्दी में यौनिकता से जुड़े शब्दों का इस्तेमाल करते हैं तो वो बहुत शर्म और नैतिकता से जुड़ा  हुआ महसूस होता है इसलिए उन्हें इस्तेमाल करना मुश्किल लगता है।

जैसे – बचपन में सिखाये गये बॉडी पार्ट्स के नाम, सब अंग्रेज़ी में सिखाये जाते है| उसे बोलना आसान है क्योंकि वो किसी और भाषा में किसी और की बात करता है| एक दूरी होती है जो भाषा से आती है और हमारे लिए बोलना आसान बनाती है और वो भी बिना किसी नकारात्मक या सकारात्मक संवेदना के साथ। बचपन से शरीर के बारे में बात नहीं होती, खासकर हिन्दी में। हम जो सीखते है वो अंग्रेजी में होता है| सूचना और शिक्षा जो हमें हिन्दी में भाषा देता ही नहीं है। और फिर जब हम अंग्रेजी के शब्दों का इस्तेमाल करना शुरू करते हैं तो ये भी बोला जाता है कि हम मॉडर्न है और अंग्रेजी संस्कृति  से प्रभावित है।

हिंदी में यौनिकता मतलब ‘नकारात्मकता’?

यौनिकता और भाषा पर सोचती हूँ  मुझे हिन्दी की वो सारी गालियाँ याद आती हैं, जिन्हें महिलाओं से जोड़कर उन्हें नीचा दिखाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। और ध्यान आते हैं वो अनुभव, जिनको तो शब्द ही नहीं मिले हैं, क्योंकि वो यौनिकता से जुड़े हैं। ज्यादातर यौनिकता से जुड़े हिन्दी शब्दों को सकरात्मक नज़रिए से नहीं देखा जाता और उनके साथ कई गालियाँ और नकारात्मक अनुभव जुड़े होते हैं जो उन शब्दों को इस्तेमाल करना नामुमकिन बनाते हैं। वाकई ये दिलचस्प है कि हमें अंग्रेजी की गालियाँ तक मंजूर हैं| ये ‘कूल’ मानी जाती हैं| पर हिन्दी में उन्हीं गालियों को सोच भी नहीं सकते बोलना तो दूर की बात|

शरीर, गर्भ, अनुभव और आनंद इन सभी की बातें हिन्दी में होती हैं| पर महिलाओं के लिए इस्तेमाल करते समय इनका मतलब ‘कमजोरी या नियंत्रण’ को दिखाता है। यौनिकता से जुड़े ये शब्द महिलाओं पर हिंसा और नियंत्रण को दर्शाते हैं, इसलिए इनका इस्तेमाल भी बहुत सीमित होता है और खासकर महिलाएँ उनका इस्तेमाल करने में हिचकिचाती है। इतना ही नहीं, कई बातें प्रचलित रूप में ऐसी भी कही जाती है जिसमें नैतिकता का भार होता है| जैसे- गर्भ समापन की बजाय ‘बच्चा गिराना’| ‘बच्चा गिराने’ को सीधा ‘पाप’ और ‘पुण्य’ से जोड़कर देखा जाता है जो यह दिखाता है कि ये फैसला तो है लेकिन पूरी तरह से गलत है| अगर कोई महिला ये निर्णय लेती है तो पाप करती है| इसमें उसके शरीर या निर्णय की तो बात ही नहीं है| ये सिर्फ़ और सिर्फ़ बच्चे की बात है और तब हम सभी भूल जाते है कि जन्म से पहले सिर्फ़ भ्रूण होता है,  बच्चा नहीं| और महिला का ये कई का ये फैसला कई वजहों से हो सकता है। अब सवाल ये है कि क्या गर्भ को समाप्त करने के लिए कोई ‘पाप-पुण्य’ रहित भाषा नहीं हो सकती?

और पढ़ें : यौनिकता, जेंडर और अधिकार’ पर एक प्रभावी क्रिया  

वहीं दूसरी तरफ अनुवाद को देखें तो एबॉर्शन को हम हिन्दी में गर्भ समापन ना कहकर ‘गर्भपात’ क्यों कहते है?  क्या ‘पात’ शब्द का अपने आप गर्भ खत्म हो जाने को नहीं दर्शाता है?  अधिकार आधारित और सकारात्मक शब्दों का निर्माण करना ज़रूरी है और ये संभव भी है। लेकिन इसके लिए ज़रूरी है कि हम पहले अपनी धारणाओं  को टटोलें। बहुत जरूरी है कि सकारात्मक अनुभवों को भी अपनी भाषा में बांटा जाए जिससे हम सब खुद को अभिव्यक्त करने में ज़्यादा सहज महसूस करें| भाषा को अनेक अनुभवों से जोड़ने और व्यक्त करने से ही उसमें लगातार बढ़ोत्तरी भी होती है।

अनुवाद से करना होगा ‘यौनिकता’ पर हिंदी भाषा का विकास

दुर्भाग्यवश यौनिकता पर ज़्यादातर सामग्री अंग्रेज़ी में ही मिलती है और हमें अपनी भाषा में उसे जानने समझने के लिए अनुवाद पर निर्भर होना पड़ता है। क्या हमने कभी सोचा है कि अंग्रेज़ी को  जब हम हिन्दी में अनुवाद करते हैं तो उसके अर्थ में बदलाव होता है| साथ ही, वो इतनी कठिन महसूस होती है कि जिनका इस्तेमाल सिर्फ किताबी भाषा में किया जाता है, इसके चलते ऐसे शब्द जो अंग्रेज़ी से हिन्दी में अनुवाद होने के बावजूद उतने ही कठिन और अनजाने लगते है क्योंकि उन्हें ना कभी किसी ने आम बोलचाल में सुना और ना कभी बोला है।

बहुत जरूरी है कि सकारात्मक अनुभवों को भी अपनी भाषा में बांटा जाए जिससे हम सब खुद को अभिव्यक्त करने में ज़्यादा सहज महसूस करें|

अनुवाद बोलचाल की भाषा में क्यों नहीं हो सकता? ऐसे ढ़ेरों शब्द है जिनका इस्तेमाल कानूनी या डाक्टरी भाषा के रूप में होता है और रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में इनका इस्तेमाल न के बराबर है। इस रवैये को भी बदलने की ज़रुरत है। कुछ शब्द तो अंग्रेज़ी के ही इतने प्रचलित हो गए हैं कि हिंदी में उनका अनुवाद करके उपयोग करना भी मुश्किल हो गया है। चूँकि इन शब्दों का इस्तेमाल हिंदी में ज्यादा किया ही नहीं गया इसलिए हम उन अंग्रेजी शब्दों के अनुवाद की जहमत नहीं उठाते है| जैसे-  मैंने शुरू में मेन्स्रुएशन शब्द का उदाहरण दिया था – महीना, मासिक धर्म, माहवारी – बिना इन शब्दों के अर्थ और उसके पीछे की राजनीति को जाने हुए लोग इन में से किसी का भी इस्तेमाल नहीं करते हैं।

अनुवाद के ज़रिए भी कई तरीके से भाषा का लगातार विकास हो सकता है और इस पर ख़ास ध्यान देने की ज़रूरत है। जैसे- जब हम अनुवाद करें तो लगातार सोचें कि कैसे पुराने शब्दों को नए तरीके से पेश कर सकते हैं जिसमें महिलाओं की ताकत के साथ-साथ उनके अधिकार और मर्ज़ी भी झलके। वो सभी लोग जो यौनिकता के मुद्दे पर काम कर रहे है या प्रशिक्षण कर रहे है, क्यों ना आपस में मिले और बातचीत करें कि इन कामों के अनुभव को भाषा में अधिक मज़बूत बनाने में कैसे इस्तेमाल कर सकते है। कैसे यौनिकता और हिन्दी से जुड़ी झिझक को पीछे छोड़कर नये शब्दों का निमार्ण कर सकते हैं, जो लोग अनुवाद से जुड़े हैं  वो जमीनी अनुभव से कैसे उठाएँ फायदा ताकि उनका अनुवाद सरल और बोलचाल की भाषा में हो| हम ये चर्चा करें कि नए शब्दों को कैसे इजाद करें ताकि यौनिकता पर बात करने के लिए हिन्दी में शब्दों की कमी ना हो।


यह लेख शालिनी सिंह ने लिखा है, जो इससे पहले तारशी हिंदी में प्रकाशित किया जा चुका है|

तस्वीर साभार: निरंतर 

This post was originally published in In Plainspeak, TARSHI's online magazine on sexuality in the Global South. TARSHI supports and enables people's control and agency over their sexual and reproductive health and well-being through information dissemination, knowledge and perspective building within a human rights framework.

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