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“वो हर रोज शराब पीकर आता है, घर की चीजों को तोड़ता है, मुझे जानवरों की तरह पीटता है। शुरुआत में जब शादी हुई थी तो लगता था कि जरुर मेरी किसी गलती की वजह से उन्हें गुस्सा आता है। मैंने सबकुछ करके देख लिया, पर वो मानता ही नहीं है। मैंने अपने पति और ससुरालवालों से पूछा कि मेरा कुसूर क्या है? मुझमें क्या कमी है? अगर मुझसे इतनी ही दिक्कत है तो छोड़ दो मुझे। लेकिन उसकी मारपीट नहीं बंद होती। जो भी कमाता है वो शराब में बहा देता है औऱ मैं कहीं काम पर जाऊं तो वहां भी मारपीट करता है।”

दिल्ली से तकरीबन 60 किलोमीटर दूरी पर स्थित बागपत गन्ने की खेती के लिए मशहूर, खाप पंचायत के खौफनाक फैसलों के लिए कुख्यात और महिला आधारित हिंसा के डरावने सच की तामीर है। वर्तमान में, जहां महिला और पुरुषों की बराबरी के कसीदे पढ़े जाते हैं, हर क्षेत्र में महिला को आगे बढ़ाने और उनके पुरुषों से कंधा मिलाकर चलने के दावे पेश किए जाते हैं वहीं उत्तर प्रदेश का ये जिला पित्तृसत्तामक ढांचे का क्रूर उदाहरण है, जहां महिलाएं आज भी घर की चारहदीवारी में कैद होकर रहने के लिए मजबूर हैं।

राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के अंतर्गत पिछले कुछ सालों में बागपत के 113 गांवों में 1000 से ज्यादा महिला स्वंय सहायता समूहों का गठन किया गया है। इसका मकसद महिलाओं को बचत के लिए प्रोत्साहित करना, सामुदायिक स्तर पर रोजगार के साधन मुहैया कराना है ताकि वो स्वावलंबी बनें। ऊपरी स्तर से देखा जाए तो ये स्कीम और उसके पीछे की विचारधारा सराहनीय है लेकिन क्या ये आकंडे ज़मीनी हकीकत का आईना है? क्या इससे जिले की महिलाओं की आर्थिक या सामाजिक स्थिति में परिवर्तन आया है? ये सोचने और चर्चा करने का विषय जरुर है। उदाहरण के तौर पर स्वंय सहायता समूहों का निर्माण तो हो जाता है पर वो ज्यादा दिन तक संगठित नहीं रह पाते, बिखर जाते हैं, पैसों को लेकर विवाद होता है, समूह की बैठक में महिलाओं के पति उन्हें भाग नहीं लेने देते और सबसे अहम ये कि वो बचत के पैसों का इस्तेमाल अपने लिए या खुद को स्वावलंबी बनाने के लिए इस्तेमाल न करके पति या परिवार के खर्च में उपयोग कर देती है।

जेंडर की धारणाएं हमारे जीवन में यूं रच बस जाती है कि उसे चुनौती देना तो दूर हम उसे अपने जीवन से अलग देख ही नहीं पाते।

बागपत में महिला आधारित हिंसा को चुनौती देने, आर्थिक स्वावलंबता को प्रोत्साहित करने और जेंडर समावेशी समुदाय बनाने के उद्देश्य से दिल्ली स्थित संस्था साहस ने महिलाओं के साथ जेंडर और जेंडर आधारित हिंसा पर चर्चा की शुरुआत की। पितृसत्तात्मक ढांचे की कठोर, अमानवीय और क्रूर बेड़ियों में कसी हुई बागपत की महिलाओं में समझ बनाना कि वो खुलकर सांस ले सकती है, घर से बाहर निकलने के लिए उन्हें अनुमति लेने की जरुरत नहीं है, वो पढ़ सकती है, अपने उपर 10 रुपए बिना डरें और झिझके खर्च कर सकती है, अपनी बेटियों को बेटों के बराबर खाना दे सकती है, पढ़ा सकती है, बिना अपराध बोध के समूह की बैठक में आकर एक दूसरे से अपने दुख, दर्द और खुशियां बांट सकती है किसी चुनौती से कम नहीं था।

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बचपन से ही मां ने सिखाया था कि अच्छी लड़की, अच्छी बेटी और अच्छी बहू कैसे बनना है। लड़कों से कोई बात नहीं करनी है, सिर झुकाकर चलना है, खाना बनना आना चाहिए। पति और उसके परिवारवालों को हर कीमत पर खुश रखना है। हमारा हर कदम परिवार की इज्जत से जुड़ा हुआ है, एक गलत कदम और सब मां की परवरिश पर ऊंगली उठाएंगे, परिवार का नाम खराब होगा। अपनी खुशी परिवार में ही ढूंढनी है।

जेंडर का जो ये ढांचा है उसने बचपन में ही अपनी पकड़ इतनी मजबूत बना ली होती है कि ये हमारे व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाता है, जेंडर की धारणाएं हमारे जीवन में यूं रच बस जाती है कि उसे चुनौती देना तो दूर हम उसे अपने जीवन से अलग देख ही नहीं पाते। जेंडर पर समझ बनाने के लिए जब बिनौली गांव की महिलाओं से पूछा गया कि उन्हें रोजमर्रा के जीवन में महिला और पुरुष में क्या फर्क दिखता है तो कई महिलाएं हंसने लगी, कुछ मुझे घूरकर देखने लगी मानो जैसे मैंने उनके खिलाफ़ सज़ा का ऐलान कर दिया है तो कुछ के चेहरे पर दर्द की लकीरे पट गई। बड़ी हिम्मत के साथ कुछ महिलाओं ने आपबीती सुनाई-

आपस में अनुभव साझा करती बागपत की महिलाएं| (तस्वीर साभार – साहस)

लड़का लड़की में फर्क तो हर बात में दिखता है। घर में खाना लड़कियां बनाती है, पर खाता पहले मर्द है। बचा हुआ खाना हमारी किस्मत में आता है। बिना कलेश के दो रोटी जिस दिन मिल जाए लगता है कि भगवान ने कृपा कर दी है। दूध, घी खाने का मन होता है पर पति और बेटे को ही दे पाते हैं। कभी छिप-छिपाकर खा लिया तो भी शामत आ जाती है

खुद तो पूरा-पूरा दिन आदमी घर से बाहर घूमते रहते हैं, लेकिन अगर हम घर से पड़ोस में भी जाएं तो उन्हें बताना पड़ता है क्योंकि वो हम पर विश्वास नहीं करते? लोग तरह-तरह की बातें बनाते हैं, हमारा मर्द हमारी बात पर नहीं बल्कि पड़ोस के लोगों की बातों पर विश्वास करता है। इसलिए काम खत्म होने के बाद भी हमें घर में ही रहना सही लगता है। अगर हमने पूछ लिया तो फिर हमारी खैर नहीं

अक्सर सुनने में आता है कि जमाना बदल रहा है, लड़कियों को लड़के के बदले तवज्जो दी जा रही है, महिला सुरक्षा के लिए इतने सारे कानून बन रहे हैं कि अब लड़कों को डर लगने लगा है पर तकलीफ देने वाला सच ये हैं कि आज भी गांवों की महिलाओं को इस बात की जानकारी नहीं है कि अगर उनका पति उनपर हाथ उठाता है, मारपीट करता है तो वो एक कानूनन जुर्म हैं और वो पुलिस के पास मदद के लिए जा सकती है ऐसे में अलग- अलग कानूनों की फेहरिस्त ज़मीनी हकीकत के सामने घुटने टेक देती है। जेंडर आधारित हिंसा भयानक बीमारी है, जिसका वीभत्स रुप हमारे सामने एक चुनौती बनकर खड़ा हैं, जरुरत है उसकी जड़ों यानि जेंडर की धारणाएं, रुढ़िवादी विचारधाराओं पर चोट करने की ताकि इस बीमारी से निज़ात पाई जा सके।

जेंडर आधारित हिंसा भयानक बीमारी है, जिसका वीभत्स रुप हमारे सामने एक चुनौती बनकर खड़ा हैं |

बागपत के गांवों की महिलाओं के लिए आयोजित साहस के जेंडर कार्यक्रम के जरिए महिलाओं में जेंडर की समझ तो बनी ही, साथ ही उन्होंने अपने ऊपर हो रही हिंसा को चुनौती देने और एकजुट होकर एक दूसरे का सहयोग करने का प्रण लिया।

एक औरत का जीवन तो हिंसा से शुरु होकर हिंसा पर खत्म हो जाता है। पैदा होने से लेकर मरने तक औरत तो बस पीटती रहती है, ताने सुनती है, हर बात पर रोक-टोक, हर बात पर छीटांकसी, कभी मायकेवालों की तरफ से कभी ससुराल वालों की तरफ से, कभी अनजाने लोगों से। पर मैंने तय कर लिया है कि बस अब और नहीं, ये सही नहीं है और मैं इसे बर्दाश्त नहीं करुंगी।

अगर कोई लड़का किसी लड़की को छेड़ रहा है तो दूसरी महिलाएं देखती क्यों रहे, अगर सारी महिलाएं एकजुट हो जाए तो किसी भी मुश्किल का सामना आसानी सेकर सकती हैं। हम सड़क पर बैठ जाएंगे, तो हमारी मांगे माननी ही पड़ेगी। हमें अपनी सोच बदलनी होगी तभी कोई और चीज बदलेगी।” 

इन बातों से बदलाव की ब्यार का अंदेशा होता है। इन महिलाओं को पता है कि ये रास्ता काफी मुश्किल है, पर जब चेहरे पर दृढ़ निश्चय की भंगिमा हो, डर को चुनौती देने का जज़्बा जाग जाए, आवाज़ बुलंद हो और साथ आगे बढ़ने का संकल्प हो तो इन्हें रोकने का सवाल ही नहीं उठता|

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तस्वीर साभार : साहस

Purvi Yadav, is Journalism and Mass Communication graduate. She is Feminist, activist, writer and co-founder of Sahas. She is a trained gender and sexuality facilitator. Apart from her experience in gender work, she had worked in the Media industry as Journalist for 5 years. She strongly advocates for sensitive reporting of cases of Gender based violence.

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