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आज भारत में युवा वर्ग एक ऐसे दोराहे पर खड़ा है जहाँ उसे समाज में तरह-तरह के मतभेदों से दो-चार होना पड़ता है| अब पहले की अपेक्षा कहीं बड़ी संख्या में बच्चे स्कूलों और कॉलेजों में पढ़ते है, उनके स्वास्थ्य और पोषण की स्थिति बेहतर है, उन्हें कई तरह के मीडिया और नई तकनीक के लाभ मिल रहे हैं और उन्हें अपनी भूमिकाओं व अधिकारों के बारे में नये विचार उपलब्ध होते रहते हैं|

इन सब स्थितियों के होते हुए भी उन्हें उम्र और लिंग के आधार पर बांटने वाले पारंपरिक मानकों का सामना करना पड़ता है, जो जेंडर के दोहरे मानदंडों को प्रतिपादित करते हैं और अविवाहितों के बीच प्रेम संबंधों या दोस्ती बढ़ाने से लेकर अपने लिए जीवन साथी के चयन को रोकते हैं| परिवारों की मर्जी से होने वाली शादी आज भी आम या यों कहें कि कायम हैं| वहीं दूसरी तरफ, शादी से पहले संबंध रखने वालों को न केवल अपने परिवार के सम्मान को ठेस पहुंचाने बल्कि खुद भी किसी अच्छे घर में शादी की संभावनाओं को कम होने के खतरे का सामना करना पड़ता है| ऐसे में अगर परिवार वालों को शादी से पहले लड़कियों के संबंधों की भनक लगती है तो वे ज़ल्दबाजी में उनकी शादी ऐसे आदमी से करवा देते है जो उनकी पसंद का नहीं होता|

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भारत में ऐसी कोई सर्वे रिपोर्ट बेहद सीमित मात्रा में उपलब्ध है, जिससे यह पता चलता है कि कितने युवक-युवतियों के शादी से पहले संबंध रहे है| पर ये सीमित आंकडें कोई पुख्ता तस्वीर सामने लाने के लिए काफी नहीं है| लेकिन इनसे ये ज़रूर पता चलता है कि समाज ने महिलाओं की यौनिकता पर कड़ा नियन्त्रण रखा है, जिसके चलते बेहद कम महिलाएं प्रेम संबंधों की शुरुआत कर पाती है और केवल 15 से 30 फीसद युवक और करीब 10 फीसद औरतें ही यौन संबंधों का अनुभव कर पाते हैं| बेटियों की अपेक्षा बेटों को अधिक आज़ादी मिली हुई है, उन्हें स्कूल जाकर पढ़ने, नौकरी करने और घर के बाहर अपने साथ के लोगों के साथ सामाजिक संबंध बनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है|

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परिवारों की मर्जी से होने वाली शादी आज भी आम या यों कहें कि कायम हैं|

वहीं दूसरी तरफ लड़कियों के लिए कहानी इसके ठीक विपरीत है, उन्हें सामाजिक संबंध बनाने के लिए बढ़ावा नहीं दिया जाता है| परिवारों में शायद ही कभी विपरीत लिंग के व्यक्ति के साथ दोस्ती, सेक्स या प्रजनन के विषयों पर चर्चा की जाती है क्योंकि अधिकाँश अभिभावकों का मानना होता है कि ऐसा करने से यौन संबंधों के बारे में स्वीकार्यता बढ़ जाएगी| अब ये कितना सही है या गलत, ये अपने आप में एक बड़ी चर्चा का विषय है|

इन परिस्थितियों में ये ताज्जुब की बात नहीं है कि विपरीत लिंग के साथ संबंध रखने वाले युवा आमतौर पर लुक-छुपकर ही ऐसा करते हैं और अक्सर अपने परिवार वालों को इसकी भनक नहीं लगने देते| औरतों के लिए माना जाता है कि इस तरह के अनुभवों में उनकी स्वीकृति होना ज़रूरी नहीं है, युवतियों की स्वीकृति आमतौर पर पुरुष मित्र के साथ संबंध स्थापित करने की स्थिति में होती है| इसके विपरीत युवक कई तरह के यौन साथी बनाते हैं, जिनमें उनकी महिला मित्र, यौनकर्मी और बड़ी उम्र की विवाहित स्त्रियाँ और अन्य पुरुष सम्मिलित होते हैं|


ये ताज्जुब की बात नहीं है कि विपरीत लिंग के साथ संबंध रखने वाले युवा आमतौर पर लुक-छुपकर ही ऐसा करते हैं और अक्सर अपने परिवार वालों को इसकी भनक नहीं लगने देते|

भारत में अभिभावकों और समुदायों की तरह ही नीतियों और कार्यक्रमों के अंतर्गत यौन और प्रजनन स्वास्थ्य के बारे में जानकारी, परामर्श या अविवाहित युवाओं के लिए सेवायें उपलब्ध नहीं कराई जाती है| निश्चित तौर पर कार्यक्रमों के स्तर पर युवाओं के यौन अधिकारों या उनकी जानकारी और सेवाएं पाने के अधिकार को कम ही पहचाना जाता है या यों कहें कि उनके अधिकारों को कम तवज्जों दी जाती है|

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सार्वजनिक क्षेत्र में यौनिकता के बारे में शिक्षा देने या युवाओं के बीच जेंडर समानता पर आधारित संबंधों को बढ़ावा देने के कार्य को संस्थागत रूप देने के कुछ प्रयास ज़रूर किये गये हैं| पर अभी भी उन प्रयासों के प्रभाव बेहद सीमित दिखाई पड़ रहे हैं, जिन्हें और उजागर होने की ज़रूरत है| क्योंकि ये एक कड़वा सच है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था और आधुनिकता की रेस, इन दोनों ने ही भले ही हमें तकनीक से जोड़कर आगे बढ़ने का रास्ता दिखाया है, पर लैंगिक समानता और यौनिकता के विषय पर आज भी हम वहीं खड़े दिखाई देते है जिस जगह से हमने सामाजिक बदलाव की बात शुरू की थी|


यह लेख क्रिया संस्था की वार्षिक पत्रिका युवाओं के यौनिक एवं प्रजनन स्वास्थ्य व अधिकार (अंक 2, 2007) से प्रेरित है| इसका मूल लेख पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें|

अधिक जानकारी के लिए – फेसबुक: CREA | Instagram: @think.crea | Twitter: @ThinkCREA

तस्वीर साभार : youtube

Swati lives in Varanasi and has completed her B.A. in Sociology and M.A in Mass Communication and Journalism from Banaras Hindu University. She has completed her Post-Graduate Diploma course in Human Rights from the Indian Institute of Human Rights, New Delhi. She has also written her first Hindi book named 'Control Z'. She likes reading books, writing and blogging.

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