FII is now on Telegram
3 mins read

कृष्ण आनंद चौधरी

पिजरे में कैद चिड़िया कितनी भी रंगीन हो, सुन्दर नहीं लगतीं… चाहे कोई कितनी भी कविताएं लिख लें उन पर।

क्या होता है चरित्र? चरित्र गुलामी है, एक बंधन। वो शर्तों से तय होता है। चरित्र गैर कुदरती है। प्रकृति विरोधी। अप्राकृतिक। चरित्र है, किसी तथ्य पर थोपीं गई शर्तें। हवा का चरित्र क्या है? शांत, धीमे, तेज कि आंधी? गर्म, ठंडा या बर्फ? पानी का चरित्र क्या है? और मिट्टी का चरित्र? मूरत या ईंट?

जो चरित्रहीन होते हैं, सुंदर वही होते हैं। आजाद लोग ही खूबसूरत होते हैं। कोने में, अपनी ही कुठाओं में दबी खामोश चरित्रशील औरत? या किसी खुले में अपने मन से ठहाके लगाकर हंसती चरित्रहीन औरत?… कौन सुंदर है? कौन है सुंदर? वो जो चाहे तो आगे बढ़कर चूम ले। बोल दे कि प्यार करती हूं? या वो, जो बस सोचती रहे असमंजस में और अपने मन का दमन किए रहे। दमित औरतें निसंदेह सुंदर नहीं होती, पर स्वतंत्र चरित्रहीन औरतें होती हैं खूबसूरत।

और पढ़ें : गर्व है मुझे कैरेक्टरलेस होने पर – मेरी कहानी

सोचना, जब अपनी टांगे फैलाई तुमने अपने पुरुष के सामने। अगर वो केवल पुरुष के लिए था तो ही वो चरित्र है। लेकिन वो तुम्हारे अपने लिए था तो चरित्रहीनता। अपने लिए, अपने तन और मन के लिए खुल कर जीती औरते सुन्दर लगती है। तुम उसे चरित्रहीन ही पुकारोगे।

बच्चे चरित्रहीन होते हैं… उनका सबकुछ बेबाक… आजाद होता है। वो हंसते हैं खुलकर, रोते हैं खुलकर, दुख सुख, खुशी गम… सब साफ सामने रख देते हैं। वो दमन नहीं करते अपना। चरित्र दमन है। पहले अपना, फिर अपनों का, फिर अपने समाज का। गौर करना, जो जितना चरित्रवान होता है, वो उतना ही दमित होता है, और फिर उतना ही बड़ा दमनकारी होता है।

जो चरित्रहीन होते हैं, सुंदर वही होते हैं। आजाद लोग ही खूबसूरत होते हैं।

हां, चरित्रहीन औरते सुंदर होती हैं। वो, जिसका मन हो तो अपने पुरुष की हथेली अपने स्तनों तक खींच ले। वो, जिसका मन हो तो वो अपने पुरुष को अपनी बांहों में जोर से भींच ले। वो, जिसका मन करे तो रोटियां बेलते, नाच उठे। वो जिसका मन करे तो जोर से गा उठे। वो, जो चाहे तो खिलखिलाकर हंस सके। वो जो चाहे तो अपने प्रिये की गोद में धंस सके। वो, जो चाहे तो अपने सारे आवरण उतार फेंके। वो, जो चाहे तो सारे कपड़े लपेट ले। वो, जो चाहे तो अपने बच्चे को स्वतंत्रता से अपना स्तन खोल दूध पिला सके, उसे दुलरा सके।

बच्चे को जन्म देते जब वो दर्द में चीखती है तो वो चरित्रहीनता है। आसपास की औरतें उसे चुप करातीं हैं। आवाज नहीं निकलाने की सलाह देती हैं। सारा दर्द खामोशी से सहने को कहती है। चरित्र का ये बंधन कबूल नहीं होना चाहिए। प्रसव पीड़ा… तकलीफ है, सृजन की तकलीफ… तो उससे धरती गूंजनी चाहिए।

और पढ़ें : मेरे सशक्त रूप को तुम ये गाली देते हो तो ‘मुझे कबूल है’- टू बी अ बिच!

अपने पुरुष के साथ उसके मदमस्त खेल का दमन भी गैरकुरदती है। इसे भी मुक्त होना चाहिए, उसे भी चरित्रहीनता होना चाहिए। सुना है कभी किसी औरत को अपने परमानंद के क्षणों में एकदम खुलकर गाते? क्यों नहीं बोल पाती वो, अपने भावों को स्वरों में? क्योंकि ये उसे चरित्रहीना साबित करेगा।

पर ऐसी औरतें ही भी बेहद सुन्दर लगती हैं। धरती की हर चीज का सुख लेते, अपने भीतर और बाहर हर चीज से खुलकर खुश होते…. प्यार में डूब सबकुछ से प्यार करती आजाद औरत। मुझे कुदरत पसंद हैं क्योंकि उसका कोई चरित्र नहीं।


यह लेख इससे पहले मेरा रंग में प्रकाशित किया जा चुका है जिसे कृष्ण आनंद चौधरी ने लिखा है। वे वरिष्ट पत्रकार हैं।

तस्वीर साभार : thoughtcatalog

Support us

2 COMMENTS

  1. Jis kudarat ki BAAT Kar rahe ho usaka charity thumhari sonch SE pare Hain .ye samaj usake samne Kuch bhi Nahi .ye samaj jiska naash Karne me nhi hichakta usaki duhayi de rahe ho.isi ajAdi ke karna kudarat ki band Baja Di hai. Jo log aaj ajAdi ki BAAT karte inako ajAdi ki ABCD bhi Nahi pata hain.what is freedom.

Leave a Reply