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उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव लालगंज की रहने वाली नेहा (बदला हुआ नाम) बीते पाँच सालों से दिल्ली में रह रही है। नेहा ने दिल्ली में लगातार ज़ारी नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ होने वाले विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा लिया। पहचान की गोपनीयता की शर्त पर उन्होंने इस पूरे आंदोलन में अपने अनुभवों को मेरे साथ साझा किया। आइए जानते है कि दिल्ली में अपना करियर बनाने आयी एक हिंदू-ब्राह्मण परिवार की लड़की आख़िर क्यों नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ है और इस पूरे आंदोलन को लेकर उसके क्या अनुभव और विचार है?  

स्वाती : आप दिल्ली में कब से रह रही हैं और आपकी पढ़ाई कहाँ से हुई?

नेहा : मुझे दिल्ली में रहते हुए क़रीब साढ़े पांच साल हो गए हैं। मैंने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपना ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन किया और वर्तमान में ह्यूमन राइट्स वॉयलेशनस को लेकर रिसर्च कर रही हूं।

स्वाती : नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ हो रहे प्रदर्शन से आप कब से हिस्सा ले रही है?

नेहा : जब से नागरिकता संशोधन क़ानून के खिलाफ प्रदर्शन शुरू हुए तब से मैं सोशल मीडिया पर और व्यक्तिगत स्तर पर इसमें हिस्सा लेकर सक्रिय हूं। और यह जरूरी नहीं है कि विरोध सिर्फ प्रदर्शनों में हिस्सा लेकर ही किया जाये लेकिन विरोध दर्ज कराना जरूरी है। इस दौर में तटस्थ होना विकल्प नहीं है हमें अपने-अपने हिस्से की जिम्मेदारी लेनी होगी।

स्वाती : आपके लिए नागरिकता संशोधन क़ानून के विरोध की क्या वजहें हैं?

नेहा : नागरिकता संशोधन क़ानून का विरोध किए जाने की कई वजहें हैं। पहली यह है कि भारत में नागरिकता का आधार धर्म नहीं हो सकता। भारत एक धर्म निरपेक्ष राज्य है और यह हमारे संविधान की मूल भावना के खिलाफ है।

दूसरी बात नागरिकता संशोधन क़ानून को सिर्फ एक एक्ट तक सीमित करके देखना भी गलत होगा, क्योंकि देश के गृहमंत्री बार-बार इसकी क्रोनोलॉजी समझा चुके हैं कि पहले नागरिकता संशोधन क़ानून आयेगा फिर नेशन वाइड एनआरसी। ऐसे में यह कह देना कि इससे देश के किसी नागरिक को कोई फर्क नहीं पड़ेगा लोगों को सिर्फ गुमराह करने का एक तरीका है। जो भी लोग NRC se बाहर होंगे अगर वो मुस्लिम धर्म के अलावा किसी और धर्म से हैं तो नागरिकता संशोधन क़ानून के जरिए नागरिकता पा सकते हैं पर मुस्लिम नहीं। नागरिकता संशोधन क़ानून सीधेतौर पर मौलिक अधिकारों का उल्लघंन हैं।

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तीसरी समस्या नागरिकता दिए जाने के सवाल पर है। उदाहरण के तौर पर एक हिन्दू और एक मुस्लिम बांग्लादेशी परिवार भारत में रोजगार के लिए आए और दोनों लिस्ट से बाहर हैं अब नागरिकता संशोधन क़ानून के जरिए हिन्दू परिवार के कागज सरकार बनवाकर उन्हें नागरिकता दे देगी पर मुस्लिम परिवार को डिटेंशन कैंप का रास्ता दिखाएगी। आईबी की रिपोर्ट को आधार माने तो रिलिजियस प्रसिक्यूट ड माइनॉरिटी की संख्या मात्र बत्तीस हजार के करीब है और इस संख्या को नागरिकता देने के लिए सरकार पूरे देश को अपनी नागरिकता सिद्ध करवाके और ना कर पाने वाले अपने ही नागरिकों को डिटेंशन कैंप भेजने को तैयार है।

इन सबके अलावा इसपर होने वाले खर्चे का क्या? असम को अगर आधार माने तो पूरे देश में कराने का खर्चा क़रीब 57 हजार करोड़ आयेगा। इसके बाद डिटेंशन कैंप, डॉक्यूमेंट बनवाने की समस्या आदि आदि। जिस वक़्त सरकार को देश के रोजगार, शिक्षा स्वास्थ्य पर ध्यान देना चाहिए उस वक़्त सरकार हिन्दू मुस्लिम करके अपनी राजनीतिक रोटियां सेंक रही है। इसलिए ये विरोध भारत के संविधान और लोकतंत्र को बचाने का है।

आने वाले समय में यह आंदोलन महिला आंदोलनों की फ़ेहरिस्त में शामिल होगा,जिसकी शुरुआत में जामिया और शाहीनबाग की औरतों का ज़िक्र रहेगा।  

स्वाती : आमतौर पर इसे सिर्फ मुस्लिम विरोधी माना जा रहा है, ऐसे में हिन्दू समाज के ब्राह्मण परिवार से ताल्लुक रखते हुए भी आप विरोध कर रही हैं। इसपर आपके क्या विचार हैं?

नेहा : बात मुस्लिम हिन्दू विरोधी होने की नहीं है, बात संविधान विरोधी होने की है और इसलिए मैं इसका विरोध कर रही हूं। मेरा मानना है कि अगर ख़ुद को शिक्षित बताकर मैं ब्राह्मण होने की पैरवी करूँ तो ये मेरी शिक्षा पर सवाल होगा। बीजेपी जैसी पार्टी सत्ता में आसीन ही इसलिए है कि इन्होंने हिन्दू-मुस्लिम की खाई को गहरा करने में कोई कसर ना छोडी है, ना कभी छोड़ेगी इसलिए अगर किसी को लगता है कि वो इससे सीधे प्रभावित नहीं हो रहा है तो वो सिर्फ उसका एक भ्रम है। क्योंकि

“लगेगी आग तो आएँगे घर कई ज़द में

यहाँ पे सिर्फ़ हमारा मकान थोड़ी है।”

तो आज ये हिन्दू-मुस्लिम है। कल ये दलित-सवर्ण हो जाएगा। फिर ये महिला-पुरुष हो जाएगा और हम सिर्फ अपनी बारी का इंतजार करते रहेंगे। इसलिए गलत की मुखालफत करना जरूरी है, इससे पहले कि ये आग आपके घर पहुंचे।

स्वाती :  इस देशव्यापी प्रदर्शन में युवा और आमजन हिस्सा ले रहे हैं लेकिन बीजेपी के लोगों का कहना है कि विपक्ष लोगों को गुमराह कर रहा है, आप इसपर क्या सोचती हैं?

नेहा : जो विपक्ष खुद राह पर नहीं आ पा रहा है वो लोगों को गुमराह करेगा?  इस देश के युवाओं को नागरिकों को किसी विपक्ष से राह पता करने की जरूरत नहीं है। ये सिर्फ़ ब्लेम-गेम का पुराना राजनीतिक पैतरा है।

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स्वाती : ये आंदोलन जामिया में हुई हिंसा के बाद ज़्यादा व्यापक होता गया और इसमें लड़कियों का नेतृत्व,  उनकी सशक्त छवि उभर कर आयी। ऐसे में एक लड़की के रूप आप इन आंदोलनों में महिलाओं की भागीदारी को कैसे देखती हैं?

नेहा : सरकार को अगर ये लगता है कि अगर दमन करने से यह आंदोलन थम जाएगा तो सरकार बिल्कुल गलत है, जामिया के बाद जिस तरह देशभर के कॉलेजों में जामिया के समर्थन में आवाज उठी वह इस बात का प्रमाण है।

जामिया के बाद यह आंदोलन और सशक्त रूप से उभरा क्यूंकि फिर यह मुद्दा केवल नागरिकता संशोधन क़ानून के विरोध तक ही सीमित नहीं रह गया बल्कि यह देश में लोकतांत्रिक तरीके से हो रहे विरोध के दमन का भी मुद्दा बन गया, यह पुलिस की बर्बरता के खिलाफ आवाज उठाने का भी मुद्दा बन गया, यह संवैधानिक अधिकारों के उल्लघंन का भी मुद्दा बन गया, जिसमें महिलाओं की एक बेहद सक्रिय भूमिका देखने को मिली जो कि बेहद सकारात्मक है और यही कारण है ये विरोध प्रदर्शन किसी पार्टी के, किसी लीडर के बैनर तले नहीं देखने को मिल रहे। ये ऐसे प्रदर्शन हैं जिन्हें आम जनता लीड कर रही है, कॉलेज में पड़ने वाले लड़के लड़कियां लीड कर रहे हैं।

आने वाले समय में यह आंदोलन महिला आंदोलनों की फ़ेहरिस्त में शामिल होगा,जिसकी शुरुआत में जामिया और शाहीनबाग की औरतों का ज़िक्र रहेगा।  

स्वाती : अब तक प्रदर्शन में आपके अनुभवों के आधार पर आप जनभावना के संदर्भ में बताएं कि लोगों में मौजूदा सरकार को लेकर क्या भावनाएं है? क्या न्यू इंडिया जाति- धर्म के वर्गों के हटकर भाईचारे की भावना के साथ खड़े होने और बढ़ने के लिए तैयार है?

नेहा : यह कहना थोड़ा मुश्किल है कि जनभावना पूरी तरह नागरिकता संशोधन क़ानून विरोधी है, सरकार का विरोध कर रही है। एक बड़ा तबका है जो अब भी सरकार के समर्थन में खड़ा है और इस साम्प्रदायिकता को जायज करार रहा है। दिल्ली के प्रोटेस्ट की बात करें तो अभी भी भीड़ स्टूडेंट्स, लेफ्ट और अन्य एलीट लोगों तक सीमित है एक बड़ा तबका अब भी है जिसे इन सबसे कोई फर्क नहीं पड़ रहा है जो कि भयावह है। इसलिए ज़रूरत है लोगों को समझाने की, बताने की, हम कितना भी सड़कों पर आंदोलन कर लें, लेकिन सिर्फ ये समझें कि हमारे घर परिवार वाले समर्थक हैं, भक्त हैं। उससे बात करके कोई फायदा नहीं है तो हम कहीं ना कहीं इस आंदोलन को कमजोर कर रहे हैं, जो नहीं समझ रहे हैं उनको समझने, इस नफरत से बाहर निकालने, सर्व धर्म समभाव समझाने की बेहद आवश्यकता है। वरना सरकार के लिए कोई मुश्किल काम नहीं है इन विरोध प्रदर्शनों को दंगों का रंग देना, एक धर्म के प्रति नफरत भरना। इसलिए यह सब सिर्फ आंदोलनों से नहीं बल्कि संवेदनशीलता की भावना के साथ ही होगा।

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तस्वीर साभार : huffingtonpost

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