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पर, यार, हम ग्वालियर में एक ढंग की चाय की टपरी के बारे में भी नहीं जानते“, मेरी एक स्कूल की सहेली ने उस दिन फोन पर कहा। हम दोनों ही घर के रोमांटिक ख़याल से लड़ रहे हैं। हम जो घर से बाहर निकले तो हमें लगता था कि शहर बिन मौसम बरसकर हमारे छूटे सावन मनाता है। दो दिन को घर आते और यहाँ की सड़कों और इमारतों के सामने झुक-झुककर सजदे करने को जी चाहता।

हम किसी ओरिएंटलिस्ट की तरह अपने शहर के रास्तों पर फिरते। पर इस शहर में हम कभी आवारा नहीं हुए। स्कूल की एक दूसरी सहेली से वही पुराने कॉफ़ी हाउस में दीवाली पर मिली। उसने कहा कि ग्वालियर के साथी पूछते हैं कि कभी सुबह चार बजे मानमंदिर देखा है क्या?  हमदोनों ने अविश्वास से एक-दूसरे की तरफ देखकर बोला, “यार, हमें चार बजे किले जाने की परमीशन कैसे मिलती?” दूसरे शहरों में हमने रातें देखीं और रातों को सुबह होते हुए भी देखा। हालाँकि मन में हमेशा यही ख़्याल था कि किसी दिन लौट आएँगे अपनी ही गलियों में। पर धीरे-धीरे ये समझ आता रहा कि औरत होने का एक भाग ये है कि अपना कुछ होता है नहीं।

अब जब मैं यूँ दूसरे शहरों को सँवारने का ख़याल रखती हूँ तो अपना शहर छूटता जाता है। इस नए शहर का नक्शा हाथ में लेकर सोचती हूँ कि मध्य प्रदेश की चोटी पर बसे अपने शहर के नक्श से तो मैं पूरी तरह अपरिचित हूँ। इसका ये मतलब नहीं कि मेरे पास यादों का कोई मसौदा नहीं है। मैं किसी ख़ाली काग़ज़ पर अपने पूरे बचपन का नक्शा खींच सकती हूँ। शिंदे की छावनी के पास वाला मेरा घर, फ़ाल्के बाज़ार में खड़ा ,स्कूल, पुराने हाईकोर्ट के सामने मेरा म्यूज़िक स्कूल, विक्टोरिया मार्केट की किताबें, टोपी बाज़ार में हमारे कपड़े और गहने वाले हैं, राम मंदिर पर चूड़ियाँ मिलती हैं, सर्राफ़े के कोने पर एक चाटवाला है, राधाकृष्ण मार्किट में कॉस्मेटिक्स मिलते हैं इत्यादि।

अब इनमें से बहुत कुछ वैसा रहा है नहीं। घर हमने बदल लिया, म्यूज़िक स्कूल टूट गया और उसकी जगह एक नई इमारत खड़ी हो गई है, हाई कोर्ट सिटी सेंटर पर बन गया है, विक्टोरिया मार्किट जल गया और अब फूल बाग़ के पास वहाँ के दुकानदारों को नई जगह देकर लक्ष्मी बाई मार्किट बना दिया है, चूड़ियों की दुकानें टूट गईं। और बाकी जगह हम जाते नहीं, कोई मॉडर्निटी और डेवलपमेंट की कहानी में ये किरदार दरकिनार हो गए। खैर इन बातों का नास्टैल्जिया के अलावा कोई ख़ास अर्थ नहीं है।

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एक दिन मैंने ये जाना कि इस नए शहर में बांस की डलियाँ पुराने शहर की किस गली में मिलेंगी, मैं जानती थी। फिर मैंने सोचा कि मेरे शहर में बाँस की डलिया कहाँ मिलेगी? मैं नहीं जानती थी। जब दूसरे शहरों की हेरिटेज को पत्थर घिस-घिसकर समझती हूँ तो ख़याल आता है कि मेरे शहर में किस गली में कब क्या घटा होगा। और याद बार-बार उस दिन पर पहुँच जाती है जब बारह साल की उमर में पहली बार किसी ने सीने के उभार को ऐसी फूहड़ता से छुआ था नज़रबाग़ मार्केट में। इस शहर में मैंने न रात की ज़मीन देखी, न आसमान। कई बार मन एकदम वहाँ से दूर भाग जाता है। फिर किसी दूसरे दिन लैपटॉप खोलकर मैंने अपने शहर का नक्शा देखा। उस नक़्शे के सामने मेरी यादों का नक्शा कितना-कितना सँकरा लगा। मैं सोचती रही कि इस नक़्शे के इन बिंदुओं पर कौन रहता होगा। किस इलाके में बच्चे सड़कों पर चलते हुए सुरक्षित महसूस करते होंगे। कौन-सी जगह पर औरतें शाम को नहीं निकलती होंगी? कौन-सा वर्ग किस बस्ती से सीमित होगा। वहाँ की सड़कें कैसी होंगी। किन जगहों पर पानी नियमित नहीं आता होगा। सरकार किन जगहों तक पहुँचती ही नहीं होगी। मिल में काम करने वाले सभी लोग अब क्या करते होंगे। क्या मेरा शहर भी घनी बस्तियों और घेट्टो में बटा होगा। किस सरकार का कौन-से समुदाय पर असर होता है। मैं इस शहर के बारे में बहुत कुछ नहीं जानती।

औरत होने के अलावा पहचान का दूसरा छोर घर-शहर से ही जुड़ा है, जिससे बिछड़ना भी एक ट्रेजेडी की तरह लगातार पीछे चलता रहता है।

पर मेरा ये विस्थापन कई तरह से सुलभ भी है। दूसरे शहरों में मेरे कमरे सिर्फ़ कमरे नहीं मेरा स्पेस होते हैं। मैं किसी दिन जल्दी उठती हूँ और कई दिन देर से, मैं कभी खाना बनती हूँ और कभी नहीं बनाती, मैं कभी अकेले रात तो सड़कों पर घूमती हूँ, कभी अकेले फ़िल्में देखने जाती हूँ, रेस्त्रां में अकेले ही खाना खाती हूँ, अकेले बैठकर बहुत किताबें पढ़ती हूँ, अनजान पुरानी इमारतों की सीढ़ियों पर देर तक बैठती हूँ। पर अक्सर मेरे साथ मेरे दोस्त होते हैं, जिनके साथ मैं लंबी बातें करती हूँ, खाना बनाती हूँ, जिनसे मैं अपनी गुज़री दुनिया बाँटती हूँ। उनके सामने मैं औरत होने के लिबास को उतार पाती हूँ। इतना ख़ुशनसीब है मेरा अकेलापन। पर ख़ुशी बँटी रहती है आधी घर में जो उसी शहर में क़ैद है जहाँ लोग यूँ ही गोलियाँ दाग देते हैं एक-दूसरे पर। उस शहर को मैं औरत होकर नहीं जान सकती। पर उस शहर में जो कमियाँ होंगी उसमें मेरी सुविधाओं का हाथ होगा। मैं उसकी अपराधी हूँ। पर वो शहर मेरा भी अपराधी है। वो शहर जो मेरे औरत होने के कारण किलाबंदी बनकर खड़ा हो जाता है।

अब ऐसा भी नहीं है कि ये दूसरे शहर मुझे संविधान वाली आज़ादी देते हैं। यहाँ तो ख़ुद को अपने सामान की तरह सँभालकर चलना पड़ता है। कुछ हो गया तो टाइप की बातें तो औरत होने के व्याकरण में शामिल हैं ही। यह औरत होने के सांसारिक सिद्धांत हैं। औरत होने के अलावा पहचान का दूसरा छोर घर-शहर से ही जुड़ा है, जिससे बिछड़ना भी एक ट्रेजेडी की तरह लगातार पीछे चलता रहता है। वो दुनिया जहाँ मैं बैठक को रसोई से झाँकती हूँ। पर जड़ों में जकड़े हैं मेरे पैर, वो जहाँ भी जाती हूँ वहीँ से आती हूँ। न ये भूल सकती हूँ, न भूलना चाहती हूँ। मैं अपने परिवेश का हिस्सा हूँ, अगर मैं बदलूँ तो मेरा परिवेश भी बदले। पर मेरा शहर फिर भी मुझसे दूर रहेगा और मैं उससे अनजान। जब भी अगली बारिश होगी, तो मैं उसे शहर की माफ़ी समझूँगी।

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तस्वीर साभार : today

Shraddha is a researcher, lawyer and Young India Fellow. She loves talking, writing and reading. Her interests include history, literature, politics, culture and poetry. She writes, speaks and thinks bilingually.

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1 COMMENT

  1. Kaafi umda likh rahi ho Shraddha, Thanks for sharing this view to look at the cities where I had spent my childhood. Keep it up 👍

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