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शाहीन बाग में चल रहे प्रदर्शन को एक महीने से ज़्यादा वक्त बीत चुका है। इस बीच दिल्ली के पारे का रिकॉर्ड कई बार टूटा, सत्ता का दमनचक्र कई बार आक्रामक हुआ, आंदोलन को भटकाने की कई बार कोशिश की गई, मामला हाईकोर्ट तक पहुंचा, दिल्ली के एक वर्ग को एनआरसी और नागरिकता संशोधन कानून से अधिक परेशानी ट्रैफिक से होने लगी लेकिन शाहीन बाग की औरतें आज भी डटी हुई हैं।

इस एक महीने में अगर कुछ बदला है तो वह है शाहीन बाग में अब भारत का एक नक्शा खड़ा है जो कह रहा है- “हम भारत के लोग CAA, NRC, NPR को नहीं मानते।” कुछ बदला है तो वह ये है कि शाहीन बाग की खुशबू अब धीरे-धीरे पूरे देश में फैलने लगी है नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ जारी प्रदर्शनों में औरतों की भागीदारी की शानदार शुरुआत का उदाहरण बन गया है। शाहीन बाग की औरतों ने बस इतना कहा कि जब तक सरकार ये असंवैधानिक कानून वापस नहीं लेती हम नहीं हटेंगे। उन्होंने बस इतना कहा और देश के शहर-शहर में शाहीन बाग उग आए। शाहीन बाग ने लोकतंत्र और संविधान को बचाने की जो मुहिम शुरू की, वह देशभर में फैलती चली जा रही है।

शहर-शहर शाहीन बाग

दिल्ली का खुरेजी, मुस्तफाबाद और सीलमपुर, गया का शांतिबाग, इलाहाबाद का मंसूरअली पार्क, रोशन बाग, पटना का सब्जीबाग, हारून नगर, फुलवारी शरीफ, कलकत्ता का पार्क सर्कस एरिया, कानपुर का मोहम्मद अली पार्क, भोपाल का इकबाल मैदान, इंदौर का बदवाली चौक, मानिक बाग, आसनसोल का काजीनज़रूल बाग, बरेली का इस्लामिया कॉलेज, देवबंद का इदगाह मैदान। ये बस चंद नाम हैं जहां शाहीन बाग की तर्ज पर औरतों ने नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी के खिलाफ प्रदर्शन शुरू किया है।

इन सारे धरनों में एक ही बात दोहराई जा रही है – “हम भारत के लोग CAA, NRC, NPR को नहीं मानते।” जिन महिलाओं ने आज से पहले कभी अपने लिए खुलकर नहीं बोला था वे माइक थामकर आज़ादी और सत्ता विरोधी नारे लगा रही हैं। जो महिलाएं अंधेरे में घर से बाहर निकलने में बार-बार सोचती हो वे रातभर खुले मैदानों में, टेंटों के नीचे धरना दिए हुए हैं। जिनके लिए अपने लिए वक्त निकालना मुश्किल होता है उन्होंने अपना पूरा वक्त देश के हाथों में सौंप दिया है। घरों से छोटी-छोटी लड़ाई करने की शुरुआत कर चुकी महिलाओं ने अब नागरिकता संशोधन कानून, एनआरसी, असंवैधानिक और फासीवादी ताकतों के खिलाफ लड़ाई शुरू कर दी है।

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आंदोलन को भटकाने की कोशिश 

बीते हफ्ते ट्विटर पर एक ट्रेंड कई बार आया- बिकाऊ औरतें शाहीन बाग की। प्रदर्शन कर रही महिलाओं के खिलाफ यह नैरेटिव गढ़ने की कोशिश की गई कि महिलाएं 500 रुपये लेकर शाहीन बाग में प्रदर्शन कर रही हैं। इन आरोपों के जवाब में शाहीन बाग की महिलाओं ने 18 जनवरी की शाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी चाय पर बुलाया। लेकिन हमारे प्रधानमंत्री जनता की सुनते ही तो देश इस हालत में न पहुंचा होता। लेकिन इस ट्रेंड में जो सबसे घिनौनी बात सामने आई वह यह कि कई ट्वीट्स में मर्दों ने शाहीन बाग जाकर अप्रत्यक्ष रूप से महिलाओं से बलात्कार करने को उकसाया। इन प्रदर्शनों के खिलाफ कोई वाजिब तर्क आईटी सेल के पास नहीं है। इसलिए आईटी सेल ने महिलाओं के खिलाफ सबसे ज़्यादा इस्तेमाल किए जाने वाला सबसे कमज़ोर तरीका अपनाया- चरित्र हनन। प्रदर्शन में शामिल होने वाली महिलाओं के खिलाफ रोज़ नए-नए झूठ गढ़े जा रहे हैं। ट्विटर पर उनसे रेप करने के न्योते दिए जा रहे हैं और सोशल मीडिया पर बलात्कार की धमकी देना तो जैसे- New Normal बन चुका है।

जिन महिलाओं ने आज से पहले कभी अपने लिए खुलकर नहीं बोला था वे माइक थामकर आज़ादी और सत्ता विरोधी नारे लगा रही हैं।

एक दूसरा नैरेटिव जो महिलाओं के खिलाफ सत्ता की तरफ से चलाया गया वह ये कि महिलाओं को भड़काकर, मुद्दों को बिना बताए इन प्रदर्शनों में लाया जा रहा है। इस कुतर्क के खिलाफ सिर्फ यही एक तर्क हो सकता है कि ये कहने से पहले आप ज़रा इन प्रदर्शनों के एक चक्कर लगा आइए। इन महिलाओं के मुंह से संविधान, तिरंगा, नागरिकता संशोधन कानून जैसे शब्द सुनकर, उनकी व्याख्या सुनकर आप भौचक्के रह जाएंगे। लेकिन यहां सवाल ये है कि जिनकी रणनीति ही आंदोलन को तोड़ने की हो वे भला आंदोलनों में क्यों शिरकत करेंगे।

शहर-शहर शुरू हुए शाहीन बाग जैसे प्रदर्शनों को खत्म करने के लिए सरकार एक बार फिर पुलिसिया दमन का सहारा ले रही है। इसमें एक बार फिर उत्तर प्रदेश पुलिस और सरकार सबसे आगे है। लखनऊ में घंटाघर के सामने प्रदर्शन कर रही महिलाओं से पुलिस द्वारा कंबल तक छीने जाने की खबरें आई हैं। हालांकि इस खबर पर पुलिस की सफाई भी आई लेकिन सोशल मीडिया पर प्रत्यक्षदर्शी कुछ और कहानी बयां कर रहे हैं। अलीगढ़ में पुलिस ने 70 महिलाओं के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज की है।

हमारा यह कहना कि सत्ता डर गई है जल्दबाजी होगी क्योंकि वह नागरिकता संशोधन कानून पर पीछे नहीं हटती नज़र आ रही लेकिन हम इतना ज़रूर कह सकते हैं कि शहर-शहर बनते शाहीन बागों ने सत्ता को परेशान कर दिया है। इसलिए वह रोज़ नए नए हथकंडे अपनाकर इन प्रदर्शनों को खत्म करने की कोशिश कर रही है। बीजेपी ने जिस चुनावी बहुमत को देश को बांटने का बहुमत मान लिया था अब उसके बहुमत के किले में छोटा ही सही पर सुराख हो गया है।

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प्रदर्शनों ने तोड़े कई भ्रम

महिलाओं की प्रदर्शन में भागीदारी एक महिलाओं की आज़ादी की किताब में एक नए चैप्टर की तरह जोड़ी जाएगी। इन प्रदर्शनों में महिलाओं की भागीदारी ने एक-एक कर कई भ्रम तोड़े। पहला- आम घरेलू महिलाओं को राजनीति, देश-दुनिया से कोई मतलब नहीं रहता। दूसरा- महिलाओं को कोई पुरुष ही आगे कर सकता है तभी वह इन आंदोलनों का हिस्सा बन रही हैं। 

तिरंगा थामे, माइक थामकर प्रदर्शनों में भाषण देती, मीडिया के सामने आत्मविश्वास से जवाब देती औरतें, उनका ऐसा मिज़ाज बहुत दिनों बाद नज़र आ रहा है। 90 साल की औरतें भी उंगलियां नचा-नचाकर कह रही हैं, “आप हमें 500 में खरीदने आए हैं, हम आपको 1 लाख रुपये देते हैं, हमारे साथ आंदोलन में बैठकर देखो।”

जिन मैदानों में, जिन पब्लिक स्पेसेज़ में महिलाओं की मौजूदगी कभी-कभार ही नज़र आती थी, अब वो मैदान 24 घंटे महिलाओं से पटे पड़े हैं। जिन सड़कों पर रात के अंधेरे में महिलाएं खुद को सबसे ज़्यादा असुरक्षित महसूस करती थी, आज उन्हीं सड़कों पर वे डटकर बैठी हैं। इन प्रदर्शनों में “रिक्लेम पब्लिक स्पेस” का नारा भी अपने आप हकीकत में बदलता जा रहा है। पुलिस आकर उन्हें धमकाती है तो वे भी पुलिस से सवाल-जवाब करती नज़र आ रही हैं। जबकि इनमें से आधे से अधिक वे महिलाएं हैं जो आज से पहले कभी प्रदर्शनों का हिस्सा रही ही नहीं।

जिन सड़कों पर रात के अंधेरे में महिलाएं खुद को सबसे ज़्यादा असुरक्षित महसूस करती थी, आज उन्हीं सड़कों पर वे डटकर बैठी हैं।

दो महिलाओं को दिल्ली के लाजपतनगर में ही अमित शाह और नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ महज एक पोस्टर दिखाने के लिए सूर्या राजप्पन और उनकी दोस्त को अपना किराये का मकान छोड़ना पड़ा। भीड़ घर के बाहर उनका दरवाज़ा तोड़ने के लिए आमादा हो गई। लेकिन इन्होंने हिम्मत दिखाई और डटी रही। ऐसी न जाने कितनी कहानियां हैं इन प्रदर्शनों की जहां महिलाएं अपने दायरे से निकलकर आ रही हैं। शहर-शहर शाहीन बाग में हज़ारों औरतों दिखती हैं जो अपने बच्चों को छाटी से चिपटाए टेंटों में रात गुजार रही हैं। सबसे खास बात यह है कि ये सब उस देश में हो रहा है जहां महिलाओं को आज भी लोग सुनना नहीं पसंद करते। महिलाएं चीखती हैं तब जाकर ये पितृसत्तात्मक समाज उनकी ओर दया की नज़रों से देखकर कहता है- अच्छा बोलो! अब इस देश में औरतें इतना शोर मचा रही हैं कि शाहीन बाग की आवाज़ गूंजते हुए न जाने कहां-कहां पहुंच रही है। जो औरतों शायद प्रदर्शन से पहले एक दूसरे को जानती नहीं थी वे एक ही थाली में बिरयानी खा रही हैं।

इन प्रदर्शनों का मकसद अब सिर्फ नागरिकता संशोधन कानून या एनआरसी का विरोध तक सीमित नहीं रह गया है। जिन मुद्दों पर देश को बांटने की कोशिश की जा रही है उन्हीं मुद्दों ने देश के अलग-अलग धर्मों को मजबूती से एकसाथ खड़ा कर दिया है। मिसाल के तौर पर अगर हम शाहीन बाग को लें तो वहां अलग-अलग मज़हब, समुदाय के लोग महिलाओं के समर्थन में जुट रहे हैं। इस एकजुटता ने इस भ्रम को भी तोड़ा कि यह प्रदर्शन सिर्फ मुस्लिम समुदाय का है। हमारे देश की बुनियाद क्या है, वह किन मूल्यों पर खड़ा हुआ है इसे जानना-समझना हो तो कभी अपने शहर में हो रहे प्रदर्शनों का चक्कर काट आइए। इन प्रदर्शनों में न सिर्फ आपको आइडिया ऑफ इंडिया नज़र आएगा बल्कि आपका स्वागत गर्मा-गरम चाय और बिरयानी से भी किया जाएगा। और जब देश की औरतें बोलती हैं तो शहर-शहर शाहीन हो जाते हैं और वहां बाग खिल जाते हैं। 

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तस्वीर साभार : hindustantimes

Ritika is a reporter at the core. She knows what it means to be a woman reporter, within the organization and outside. This young enthusiast has been awarded the prestigious Laadli Media Awards and Breakthrough Reframe Media Awards for her gender-sensitive writing. Ritika is biased.

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  1. […] भारतीय संसद द्वारा 11 दिसंबर, 2019 को नागरिकता (संशोधन) कानून पारित किया गया। इस कानून के तहत 1955 के नागरिकता कानून को संशोधित करते हुए उन लोगों को नागरिकता प्रदान करने की बात कही गई जो अफ़गानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से 31 दिसंबर 2014 के पहले भारत आ चुके हैं और हिंदू, सिख, बौध, जैन, पारसी अथवा ईसाई हैं। सरकार के इस कदम का देशभर में विरोध हुआ। यह पहली बार था, जब भारतीय कानून में नागरिकता के लिए धर्म प्रमुख आधार बनाया गया था। देशभर में विश्वविद्यालयों से लेकर सड़कों पर इस कानून के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन हुए, लेकिन जो आंदोलन राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विमर्श का विषय बना, वह था- शाहीन बाग का महिला आंदोलन। […]

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