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‘हम गुनेहगार औरतें’ वाणी से प्रकाशित एक ऐसी किताब है, जो कि औरतों के एहसासों के इर्द-गिर्द घुमती है। जो औरतों की आवाज़ को गरिमा और हिम्मत देती है। जिसका मरकज़ उनकी ज़िन्दगी से जुड़े हर पहलु हैं। ये किताब बेबाक़ है। बेख़ौफ़ है। शायरी में लिखी ये वो बातें हैं जो पाकिस्तान की शायरा औरतों ने लिखी है। पितृसत्ता की बनाई हुई दीवारों को लांघती, ये लिखे हुए ऐसे जज़्बात है जो बेसाख्ता बहते चले जाते हैं।

ये किताब औरतों के संघर्ष उनके जीवन की बारीकियां बयां करती है। वो बारीकियां जो किसी तरह से पितृसत्ता के आसपास से गुज़रती हैं कि कैसे इसका असर गहराई से उनकी ज़िंदगियों से जुड़ा हुआ है। हर एक शायरी पितृसत्ता की दी हुई ऐसी चोट को उजागर करती है, जैसे पीढ़ियों से दबाई गई आवाज़ आज बुलंद होकर अपने होने का परचम लहरा रही हो। हर आवाज़ हर शायरा की लिखी हुई शायरी की एक कहानी बयां करती है। फिर चाहे वो किश्वर नाहीद की लिखी कविता ‘हम गुनेहगार औरतें’ ही क्यों न हो वो कविता जो बेख़ौफ़ है, वो ये बयां करती है की धर्म की बेड़ियों के आगे वो नहीं झुकेगी न ही किसी के गुरूर के आगे सर झुकाएगी। या फिर फ़हमीदा रियाज़ की लिखी कविता जो की एक औरत की हंसी को व्यक्त करती हैं। और फिर इशरत आफ़री के चाहे ये चंद अलफ़ाज़ ही क्यों न हो। ‘ये अना के कबीले की सफ़्फाक लड़की तेरी दस्तरस से बहुत दूर है।’

ये शब्द जो उजागर करते हैं इस भावना को कि चाहे औरत को कितना भी महकूम और महरूम बनाने के प्रयास किये गए हो लेकिन औरत के भीतर वही शक्ति है जो हर इंसान में होती है वो नाक़ाबिल या कमतर नहीं है बस माशरे ने उसे ऐसा बयां किया है, ऐसी सोच में ढालने की कोशिश की गई है लेकिन वो है तो एक अनापरस्त।

मां बेटी का साझा दुःख

ये किताब मां और बेटी के साझा दुःख को किश्वर नाहीद की मात्र एक कविता से अभिव्यत कर देती है की कैसे हमे भूलना नहीं चाहिए की मां बेटी एक-सा दुःख लेकर जन्मी हैं। कैसे मां की चिंता है उसकी बेटी और उस चिंता में है ये समाज जो गुस्ताख सा खड़ा है उसके रास्ते पर। इस किताब में मां के एहसासों को उसके डर को और साथ ही ख़ुशी को लिखा गया है की, बेटी के जन्म से क्या कुछ महसूस करवाया जा सकता है एक मां को और कैसे उसे खुश होने की इजाज़त नहीं है क्योंकि जन्म बेटी का हुआ है। लेकिन ये किताब बतलाती है की कितनी खुश हो सकती है एक मां।

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विद्रोह है ये किताब

शायरी में कहानियां बुन देना अपने दर्द को लिख देना। उस दर्द को जो समाज ने सभी औरतों के सिर पर आजतक हावी रखा है। चाहे वो कहानी एक लड़की के जन्म की हो या उसके जन्म से जुड़ी प्रतिक्रियाओं पर हो। पितृसत्ता के हर रिवाज़ पर सवाल उठाती ये किताब अपने आप में एक विद्रोह है। ये विद्रोह है सामाजिक और राजनैतिक ढांचों के ख़िलाफ़ जो आज भी महिलाओं का दमन करती है और उनके हकों को कुचलती है। ये विद्रोह इस किताब में एक लम्बे प्रतिरोध का रूप लेकर सा सामने आता है जो आज लगभग हर औरत का जीवन है। हर वो औरत वो हाशिये पर है।

पितृसत्ता को चुनौती देते शब्द

महिलाओं की लिखी हुई ये कवितायें न ही सिर्फ़ पितृसत्ता पर धावा बोलती हैं बल्कि हर उस व्यवस्था को ललकारती हैं जो दमनकारी है। महिलाओं का लिखना तो वैसे अपने आप में ही एक क्रान्ति है उनके कलम से लिखा हर शब्द एक चीख है जिसे अरसों से दबाया गया है। ये कवितायें हमे सोचने पर मजबूर करती हैं कि बदलाव आख़िर कब आएगा? कि कब एक औरत को इंसान समझा जाएगा। या फिर औरत को इंसान समझना इतना मुश्किल क्यों है? ये किताब नारी की सामाजिक व्यथा को उजागर करती है। जिसे हम बिलकुल अनदेखा नहीं कर सकते। एक ऐसी सामाजिक व्यथा जो सदियों से कुचलती आई है उनके ख्वाबों को। जिसके हक अधिकार कभी समाज के लोगों ने छीन लिए तो कभी रिश्तों के नाम पर भी ले लिए गए वहीँ मज़हब ने भी इन हकों को नहीं छोड़ा। हर रूप से हर तरह से इंसानी हुकूक छीन लेने के प्रयास में क्रान्ति की जलती भावना को हवा देती है ये किताब।

बेखौफ़ आरज़ूमंद औरतों की तहरीरे

महिलाओं का लिखना-पढ़ना तो इस पितृसत्तात्मक समाज में बर्दाश्त नहीं किया जाता उनका सोचना-समझना सवाल करना किस्मत को नहीं रस्मों को कोसना ये सबकी आँखों की किरकिरी बन खटकता है। ऐसे में ये किताब जो सोचती है बोलती है और आरज़ूमंद औरतों के एहसासों से पिरोई गई है वो वाकई हिम्मती है।

ये किताब हम सभी को ज़रूर पढ़नी चाहिए, जिससे हम पढ़ पायें औरत के मन को, उसकी पीड़ाओं को उसकी हिम्मत और उसके संघर्ष को। इसीलिए अगर आप उर्दू/हिंदी की कुछ सशक्त नारीवादी कवितायेँ पढ़ने में दिलचस्पी रखते हैं तो ‘हम गुनेहगार औरतें’ आपको ज़रूर पढ़नी चाहिए क्यूंकि ये सियासी निजी और सामाजिक दोनों पहलुओं का एक अटूट मेल है।

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तस्वीर साभार – pustak

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