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हमारा समाज एक पितृसत्तात्मक ढाँचे के अनुसार चलता है जिसके तहत महिलाओं पर ढेरों पाबंदियां लगाई जाती हैं। उनके लिए घर के अलग संघर्ष और बाहरी जीवन के अलग संघर्ष होते है। इन संघर्षों का महिलाओं की मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव पड़ता है। हम यहाँ पर खासतौर पर महिलाओं की बात इसीलिए कर रहे हैं क्योंकि कही न कही, लड़का होना एक तरह का विशेषाधिकार है, जो की महिलाओं को समाज नहीं देता। ये एक ऐसा तथ्य और ऐसा सत्य है जो पितृसत्ता के साथ हमें मिलता है।

हमारे समाज में आज भी कहीं न कहीं एक लड़की पढ़-लिख जाए तो वही उसका सबसे बड़ा संघर्ष होता है और अगर माध्यम-वर्गीय लड़की पढ़ने के बाद अपने सपनों को उड़ान देना चाहे और आगे बढ़ने की उमंग और उम्मीद सजाती है तो उसे बहुत सारी चुनौतियों का उसे सामना करना पड़ता है। सबसे पहला संघर्ष होता है माँ-बाप को समझाना-बताना कि वो वाकई में जीवन में कुछ करना चाहती है, न की सिर्फ़ घर बैठना चाहती है और उसकी ढेर सारी आशाएं हैं, जिन्हें वो सच करना चाहती हैं। ऐसे में माँ-बाप का साथ और अनुमति ये सबकुछ उसके उस सपने की हद पर निर्भर करता है जो की उसने देखा है। सपने की हद से हमारा मतलब है कि क्या वो सपने देखने की उसे इजाज़त है? क्या समाज उसे ऐसा सपना पूरा करने की अनुमति देता है? या खुद उसके घरवाले क्या उसे वो करने देंगे? अगर ऐसे में लड़की ने किसी ऐसे करियर के लिए इच्छा ज़ाहिर कर दी जिसका भेद जेंडर की तर्ज पर किया जाता है जैसे की विज्ञान पढ़ना या फिर पत्रकारिता करना, बिज़नेस की पढ़ाई करना। इस तरह के करियर आपका ढेर सारा समय और मेहनत मांगते हैं।

ऐसे में पितृसत्तात्मक ढाँचे पर चलने वाला परिवार ये नहीं चाहता की उनकी बेटी इस प्रकार का कोई भी चुनौतीपूर्ण करियर का चुनाव करे। ज़्यादा से ज़्यादा वो टीचर बने जिससे उसके पास समय रहे परिवार के लिए। ऐसी सोच कई घरवालों की होती है और फिर इस सोच के चलते जब लड़की जिन सपनों को देखती है और वो उसे पूरा नहीं कर पाती ऐसे में जो मानसिक चोट उनके मन पर लगती है वो बेहद गहरी होती है।

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ख़त्म नहीं होता संघर्ष

जैसे-तैसे अगर वो अपने घरवालों को मना भी ले और अपने सपनों की राहों पर आगे बढ़ भी चले, तब भी ये पितृसत्ता की बेड़िया उन्हें कही न कही से जकड़ कर रखती है। एक ऐसा नियंत्रण उनपर रखा जाता है जिसके बाहर निकलना उनके लिए असंभव होता है। हम सभी ये जानते हैं कि पितृसत्ता का विशेषाधिकार और दंड दोनों का इस्तेमाल करके अपनी सत्ता जमाकर रखती है। इस विशेषाधिकार और दंड को घरवाले बहुत नरम भाषा से समझाने की कोशिश करते हैं कि ‘ये तो थोड़ी ढील और थोड़ी कसावट है जी!’ ख़ैर इन सबसे लड़ते-भिड़ते लड़कियों का आंतरिक मन कही न कही टूटने सा लगता है। सपने पूरे करने की चाह और वो छिन न जाएँ उसका डर इस तरह के द्वन्द में ज़िन्दगी बिताना बेहद कठिन होता है। घर की पाबंदिया जैसे की घर वापस लौटने का समय, कपड़े और पहनावा इसके साथ इसबात की भी पाबन्दी की ज़्यादा किसी से दोस्ती नहीं करनी है! इस तरह पितृसत्तात्मक सोच का ये कसा हुआ फन्दा उन्हें घोटने सा लगता है और यही वो समय होता है जब कई बार उनका मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित होने लगता है।

घर से अपने कॉलेज या काम की जगह पहुँचने में उनके कई तरह की हिंसा का सामना करना पड़ता है। वहीं दूसरी तरफ़ उनके कई बार अपने काम की जगह पर भी यौन उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है।

बाहरी दुनिया का संघर्ष

घर की पाबंदियां बाधाओं को तोड़ते हुए जब एक लड़की घर के बाहर कदम रखती है तब बाहरी दुनिया के संघर्ष भी सामने आ जाते हैं।वो संघर्ष और भी बड़े पैमाने तक उन्हें परेशान और असहज कर सकते हैं। ये वो संघर्ष है जो हमें सीधा समाज से मिलते है। जैसे कि सड़कों पर यौन उत्पीड़न का सामना करना। घर से अपने कॉलेज या काम की जगह पहुँचने में उनके कई तरह की हिंसा का सामना करना पड़ता है। वहीं दूसरी तरफ़ उनके कई बार अपने काम की जगह पर भी यौन उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है। और ये बातें वो अपने घर में खुलकर नहीं बता पातीं इसी द्वन्द में कि कहीं जो मौका उन्हें मिला है वो उनसे छिन न जाए। कहीं उनसे ये न कह दिया जाए की इसीलिए लड़कियों को बाहर इतना नहीं निकलना चाहिए और फिर समय की पाबंदियों को उचित साबित करने की लगातार कोशिशे करना। ऐसे में वो चुप्पी साध लेती हैं और बाहरी संघर्षों से अपने आप निपटने की कोशिशें करती हैं। लेकिन हर एक दिन की ये चुनौती क्या उन्हें मानसिक रूप से नहीं थकाती होगी? ऐसे में कितना कठिन होता होगा अपने मन को शांत रखना।

काम की दुनिया में भेदभाव

इतने सारे संघर्षों के बाद जब उन्हें अपनी मनचाही नौकरी मिलती है, तब भी अनगिनत रूप से भेदभाव का सामना करना पड़ता है। जैसे की कार्यस्थल में पुरुष कर्मचारियों की तुलना में काम आय मिलना, जबकि काम का भार की बराबर होता है। या फिर दूसरे रूप में ऐसा कि उन्हें कोई विशिष्ट काम न सौंपना और उनकी प्रतिभा पर शक करना। ऐसे में मन टूटने लगता है, थोड़ा और तब बिखरता है जब कहीं कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न का सामना करना पड़ जाए।

कितना असमंजस और इतनी सारी चुनौतियों का सामना करने के बाद एक मध्यम वर्गीय परिवार से आने वाली लड़की अपने सपने पूरे तो कर पाती है लेकिन किस कीमत पर? उसकी मानसिक स्वास्थ्य की कीमत पर! हम चाहते हैं कि एक ऐसे समाज का निर्माण हों जहाँ लोग पितृसत्ता का चश्मा हटाकर नारीवादी नज़रिये से दुनिया देखे, जब कभी भी कोई लड़की सपना देखे तो सब उसकी हौसला अफ़ज़ाई करें। न की उसकी राहों का काँटा बनकर उसके मन में चुभे और न ही उसके आतंरिक कौतुहल का कारण बने! ये सवाल आप सभी से है कि क्या हम बना सकते हैं ऐसा समाज? जिसमें गैर-बराबरी का कोई अंश न बचे।

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तस्वीर साभार : makers

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