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सैयद रज़ा हुसैन ज़ैदी

जैसा कि पीके ने बोला था कि उसके गोले में लोग एक दुसरे से बात करने के लिए अल्फाजो का इस्तेमाल नहीं करते बल्कि एक दूसरे को समझ जाते है।’ सोचने वाली बात है अगर सिर्फ हाथ पकड़कर हमारे गोले मतलब हमारी धरती पर भी ऐसा होता की हमको अलफ़ाज़ इस्तेमाल ना करने पड़ते तो क्या आपस में जो इतनी असमानताए हैं जेंडर को लेकर शायद वो न होती। लेकिन वास्तव में ये एक नामुमकिन ख़्वाब जैसा ही है कि इंसान अल्फाज को खल्क ना करता तो आज क्या होता?

खैर इंसान ज़मीन पर आया और विकास के क्रम में लफ्जो को भी बनाता चला गया और जैसे की हमारे समाज में सत्ता हमेशा से पुरुषों के हाथो में रही तो लफ़्ज़ भी हमेशा ऐसे है बने, जो कमज़ोर वो ‘ज़नाना’ कहलाया और जो कद्दावर वो ‘मर्दाना।’ ये हमेशा से चला आ रहा है कि भाषा किस तरह से भेदभाव करती है और आज ये बात हिंदी भाषा में करना इसलिए भी अहम् है क्योंकि हम उस देश में रहते है जहां सेन्सस 2011 के अनुसार 52 करोड़ से ज्यादा जनता हिंदी को अपनी मातृभाषा मानती है और सिर्फ 2,59,678 लोग हैं जो कि अंग्रेजी को अपनी पहली भाषा मानते हैं। इसके अलावा जितने लोग हैं वह हमारी स्थानीय भाषाओं को इस्तेमाल करते है, चाहे वो मराठी हो, गुजराती हो, भोजपुरी हो या पंजाबी या कोई और स्थानीय भाषा। खैर इस लेख में हम ये जानने की कोशिश करेंगें कि कैसे भाषा की वजह से एल जी बी टी क्यू + समुदाय मुश्किल झेलता है।

लॉकडाउन में मैंने अपने दोस्त को फोन किया और बोला ये बता जेंडर को हिंदी में क्या कहते है, वो बोला लिंग, मैंने बोला और सेक्स को, बोला लिंग। मैंने कहा मतलब हिंदी में जेंडर और सेक्सुअलिटी में कोई फर्क ही नहीं है, उसने बोला फर्क है मगर शब्द नहीं है और ये तो सिर्फ एक जेंडर की बात है जिसका स्थानीय भाषा में शब्द नहीं है। ऐसे में सोचने वाली बात है कि अब तक 30 से ज्यादा जेंडर की खोज करी है, तो हम उन सबको क्या कहेंगे?

नारीवादी कमला भसीन ने जेंडर का हिंदी शब्द बनाया हैं, इसे ‘सामाजिक लिंग’ बोलते हैं जो की बिलकुल ही प्रचलन में नहीं है, हम में से 90 फ़ीसद लोगों को नहीं पता है क्योंकि ये अधिकारिक नहीं है।

ऐसे में जब भी सशक्तिकरण की बात शुरु होती है तो बात हमेशा शब्दों पर भाषा पर और शिक्षा पर आती है, क्योंकि हम शिक्षा की बात तब तक नहीं कर सकते हैं, जब तक कि हमारे पास कुछ हो ना शिक्षा देने के लिए। यानी कि अगर विश्वविद्यालय में पाठ्यक्रम ही नहीं है तो शिक्षा किस बात की दी जाएगी  और अगर हिंदी का पाठ्यक्रम अंग्रेजी में है तो कैसे पढ़ाया जाएगा। अब बात घूम फिर कर आती है हमारी ‘शब्दावली’ पर। हमारे ‘लफ्जों।’ पर हमारी ‘बातचीत’ पर।

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और हिंदुस्तान को ध्यान देते हुए स्थानीय भाषा और भी अहम् हो जाती है। मुझे आज भी याद है की पिछले साल प्राइड परेड से पहले लखनऊ में प्रेसवार्ता थी। वहाँ पर एक पत्रकार ने सवाल किया कि क्या समलैंगिक और किन्नर एक होते है? मुझे एक पल को तो गुस्सा आया, मगर अपनी जगह को समझते हुए मैंने उसे समझाया। वहाँ मैंने ये सोचा कि स्थानीय भाषा का विकास जब तक नहीं होगा तब तक लोगों के दिलों से डर नहीं जाएगा।

सत्रह मई को ई-डा-हो-ट-बी (इंटरनेशनल डे अगेंस्ट होमोफोबिया, ट्रांस्फोबिया और बाईफोबिया) होता है और इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि मैं इस शब्द को ही हिंदी या उर्दू में नहीं लिख सकता हूं। क्योंकि होमोफोबिया का कोई हिंदी, उर्दू शब्द नहीं है। ट्रांस्फोबिया का कोई हिंदी या उर्दू शब्द नहीं है।

आप ज़्यादा से ज़्यादा यह कह सकते हैं कि समलैंगिकता से भय के लिए ‘भाषा’ भी ज़िम्मेदार है। सही शब्दावली का ना होना एक बहुत बड़ा कारण है कि छोटे प्रांतों, शहरों, कस्बों और प्रदेशों में लोगों को लगता है कि ये ‘बड़े लोगों की बीमारी’ है, क्योंकि उनके पास खुद के स्थानीय शब्द नहीं है। बहुत ज्यादा हुआ तो वह लड़कों को हिजड़ा बोल देते हैं और घर से निकाल देते है। अगर कोई लड़की समलैंगिक है तो उसे अक्सर चुड़ैल कह देते है या फिर रूपांतरण चिकित्सा (कन्वर्सन थेरेपी) के लिए ले जाते है।

सही भाषा और शब्दावली के न होने से छोटे प्रांतों, शहरों, कस्बों और प्रदेश के लोगों में समलैंगिकता को लेकर भय रहता है, जिससे वे असहज रहते हैं।

इसी तरीके से एक गलतफहमी यह है कि हिजरा या किन्नर पैदा होता है। मानो कि ये प्राकृतिक पहचान है। हिजरा और किन्नर दोनों ही पूर्वी एशिया के कल्चरल पहचान है और अगर यह प्राकृतिक पहचान होती पूर्वी एशिया में ही क्यों मिलती है पूरी दुनिया में क्यों नहीं हो आपको हिजड़ा समुदाय के लोग सिर्फ और सिर्फ पूर्वी एशिया में ही मिलेंगे हिंदुस्तान, पाकिस्तान बांग्लादेश और नेपाल के कुछ हिस्सों में बाकी पूरी दुनिया के किसी भी हिस्से में किन्नर समाज नहीं मिलेगा, क्योंकि यह प्राकृतिक पहचान और बॉर्न आईडेंटिटी नहीं है।

अब सवाल है कि फिर यह क्या है? तो जैसा मैंने कहा कि ये एक कल्चरल पहचान है। कोई भी इंसान जो अपने आपको उस समाज का हिस्सा महसूस करता है, उसका हिस्सा हो सकता है, उनकी खुद की अलग भाषा है, अलग पहचान है। हमारी एक बहुत अज़ीज़ किन्नर मित्र ज़ैनब एक सवाल के जवाब में कहती है की हमने खैरात घर नहीं खोला है जो आप कहते है की किन्नर बच्चों को घर से उठा ले जाते है। आप लोगो को ज्ञान और समझ ना होने की वजह से उस मासूम बच्चे को जिसको कोई मेडिकल कंडीशन है आप किन्नर समझ रहे हो। अब बात आती है कि जन्म के वक़्त अगर योनि और लिंग विकसित नहीं है, तो वो बच्चे को हम क्या कहेंगे? क्या इसके लिए हमारी लोकल भाषा में कोई शब्द है? इसका सीधा सा जवाब है-नहीं।

इंग्लिश में जरूर है हम ऐसे बच्चो को जिनके जननांगों में कुछ अलग है तो उसे इंटरसेक्स कहते है। कहीं-कहीं पर हिंदी में इसे उभयलिंगी कहा जाता है। मगर ये प्रचलित नहीं है, सामाजिक लिंग की तरह तो अब फिर से हम वहीं आ गए। अगर शब्द नहीं  है  तो बच्चा ‘हिजड़ा।’ शायद भाषा की ये खीचातानी कभी ख़त्म न हो या हो भी जाए तो हमें उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए।

और सबसे आखिर में किसी शायर ने कहा है –

लफ़्ज़ तासीर से बनते है, तलफ़्फ़ुज़ से नहीं,
अहले दिल आज भी है, अहले ज़ुबान से आगे…

तो बस अल्फाजो, जज्बातों और मुहब्बतों की चुप्पी तोड़िए और अगर हमारे लिए या किसी के लिए भी कोई लफ़्ज़, अल्फ़ाज़ कुछ भी नहीं समझ आ रहा तो भागने के बजाए दिल में पीके की तरह मुहब्बत रखिए। क्योंकि इश्क़ से बेहतर कोई ज़ुबान नहीं होती।

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यह लेख सैयद रज़ा हुसैन ज़ैदी ने लिखा है।

तस्वीर साभार : AsiaTimes

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