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देश के विश्वविद्यालय और उनके कैंपस, इन जगहों से वैचारिक उत्थान की नींव रखी जानी थी, वहां भी आज पितृसत्ता और ब्राह्मणवाद अपने पांव पसारे हुए है। हमेशा से सत्ता अपना एजेंडा लागू करवाने के लिए तमाम संस्थानों की सहायता लेती है, जिसका विरोध बुद्धजीवियों की तरफ़ से किया जाता रहा है। ये बुद्धजीवी विश्वविद्यालय में पढ़ाने वाले शिक्षकों से लेकर विभिन्न कला क्षेत्रों से जुड़े लोग हैं, जो स्वतन्त्रता, अखण्डता, पंथ- निरपेक्षता, समानता जैसे बुनियादी संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए लगातार संघर्ष कर रहे हैं। देश में दक्षिणपंथी सरकार आने के बाद से लगातार ऐसी नीतियां और कानून पारित किए गए, जो जन विरोधी थे। हमारे शिक्षण-संस्थानों के कैंपस भी इन नीतियों से अछूते नहीं रहे। बुद्धजीवियों, शिक्षाविदों और छात्रों को मीडिया चैनलों ने ‘एन्टी नेशनल’ जैसे तमगों से नवाज़ दिया गया और जनता की भावनाएं ऐसे भड़काई गईं, जिससे मॉब-लिंचिंग’ जैसी घटनाएं रोज़ाना सुर्खियों में शामिल हो गई।

कैंपस और कैंपस के बाहर विरोध-प्रदर्शनों में भाग लेने वाले शिक्षकों और छात्रों पर सरकारें सुरक्षा जैसे शब्दों की आड़ में कार्रवाई तो करती ही हैं। विश्वविद्यालय प्रशासन की तरफ़ से भी कैंपस में होने वाले छोटे-छोटे प्रदर्शनों को हतोत्साहित किया जाता है। अगर प्रदर्शन लड़कियों का होता है तो उन्हें इन प्रदर्शनों में शामिल होने का खामियाज़ा धमकियों और पेरेंट्स तक पहुंचाई गई शिकायतों के रूप में भुगतना पड़ता है।

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भारतीय समाज पितृसत्तामक समाज है यानी यहां की सामाजिक व्यवस्था में स्त्रियां पुरुषों से पिछड़ी हैं। औरतों को जीवन के हर स्तर पर सांस्थानिक शोषण और भेदभाव से गुज़रना होता है। जन्म होने से पहले और अपने पूरे जीवन में एक महिला स्त्री-विरोधी घटनाक्रमों को झेलती है। परिवार जैसे बुनियादी संस्थान में धर्म के हस्तक्षेप से इस शोषण को वैधता मिलती है। पितृसत्ता एक व्यवहार है, जो स्त्री औ पुरुष दोनों के ही आचरण में समाज के ज़रिए इस तरह डाल दिया जाता है, जिससे हर भेदभाव और शोषण से जूझना स्त्री की नियति बन जाती है।

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भारत में मौजूद तमाम रूढ़ीवादी विचार इस शोषण को और अधिक गहरा करते हैं। धर्म, जाति, रंग, आदि वे कारक हैं, जिनके माध्यम से शोषण और प्रभुत्व को और मज़बूत किया जाता है। सभी तत्व इस देश के सभी संस्थानों में अपनी पैठ बनाए हुए हैं। चूंकि हमारे शिक्षण संस्थानों के कैंपस और उसमें काम करने वाले लोग इसी समाज का हिस्सा हैं इसलिए ये संस्थान भी सामाजिक रूढ़ियों और कुरीतियों से मुक्त नहीं हैं। हमारे कैंपस में इन रूढ़िवादी विचारधाराओं का अलग-अलग रूप देखने को मिलता है।

बॉयज़ हॉस्टल का वॉर्डन लड़कों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करता। वह बस लड़कियों को धमकाते हुए गर्ल्स हॉस्टल की वॉर्डन को सलाह देता है कि ‘इन सबके मां- बाप को बुलाओ, फ़ोन करो इनके घर।’

उदाहरण के तौर पर 14 फरवरी को हिंदू कॉलेज में वी-ट्री पूजा मनाने की कुप्रथा है। इस दिन लड़के कैंपस में मौजूद एक वी शेप्ड पेड़ जिसे वे ‘वर्जिन ट्री’ कहते हैं उसकी पूजा करते हैं। इस पूजा की पूरी प्रक्रिया स्त्री-विरोधी और ब्राह्मणवादी है। इस पूजा के दौरान एक एक लड़का पंडित बनता है और पूरी पूजा प्रक्रिया उसके द्बारा करवाई जाती है। पूजा के दौरान एक आरती गाई जाती है, जिसमें ‘दमदमी माई’ के शरीर के आदर्श आकारों का वर्णन किया जाता है। किसी भी बॉलीवुड अभिनेत्री की बिकिनी तस्वीरें लगाकर उसे दमदमी का प्रतीक बनाया जाता है और पेड़ से कंडोम लटकाए जाते हैं। कॉलेज में एक प्रोग्रेसिव तबके की ओर से इस पूजा का विरोध किया जाता है। दिल्ली विश्वविद्यालय के दूसरे कॉलेज जैसे मिरांडा हाउस, लेडी श्री राम जैसे कॉलेजों की छात्राओं ने भी इसे महिला विरोधी करार दिया गया है। इसी के ख़िलाफ़ हिंदू कॉलेज में लड़कियों ने कर्फ्यू तोड़कर ‘पिंजरा तोड़’ संगठन के साथ प्रदर्शन भी किया था। इस प्रदर्शन का नतीजा यह हुआ कि वॉर्डन ने छात्राओं के घर फोन करके कहा कि ‘उनकी बेटी किसी लड़के से मिलने हॉस्टल से भाग गई है।’

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जबकि इसी स्थिति में बॉयज़ हॉस्टल की तस्वीर अलग होती है। बॉयज़ हॉस्टल का वॉर्डन लड़कों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करता। वह बस लड़कियों को धमकाते हुए गर्ल्स हॉस्टल की वॉर्डन को सलाह देता है कि ‘इन सबके मां- बाप को बुलाओ, फ़ोन करो इनके घर।’ असल में, परिवार स्त्री के ख़िलाफ़ शोषण को लागू करने वाला संस्थान है। कॉलेज, जिसे हमारे परिवार के मुकाबले उदार स्पेस होना चाहिए था, वहां भी लड़कियों को पारिवारिक माहौल में रखने का प्रयास किया जाता है। इसके लिए कई बार उन्हीं नियम-कायदों का इस्तेमाल होता है जिसे हम अपने परिवारों में शुरू से झेलते आए हैं। हॉस्टल्स में ख़ासकर यही होता है, वॉर्डन इतने तक ही नहीं रुकती। अगली बार एडमिशन प्रक्रिया में लड़कियों के माता-पिता को बुलाकर आधे-आधे घंटे तक उनके दोस्तों, लड़कों से दोस्ती की बातें बताते हुए आखिर में यह कहती कि ‘मैं भी इनकी मां जैसी हूं और इन्हें बिगड़ने नहीं देना चाहती।’ यह कहकर वह अपनी पितृसत्तामक सोच को सन्तुष्ट करती है और लड़कियों के मन में परिवार का डर बैठा कर मनमानी करती।

किसी भी लड़की के छुट्टी लेने पर वह ज़्यादा से ज़्यादा पूछताछ करती है। इतना ही नहीं हॉस्टल में एक लड़की के गले पर निशान देखकर जबरन उसकी टी-शर्ट में झांककर उसे परिवार का डर दिखाते हुए शोषित भी किया जाता है। सुरक्षा और देखभाल के नाम पर की जाने वाली ये हरकतें किसी भी छात्रा को मानसिक रूप से परेशान करने वाली होती हैं। देश के अलग-अलग जगहों से संघर्ष कर दिल्ली आने वाली लड़कियां इस तरह की हरक़तों का खुलकर विरोध नहीं कर पातीं क्योंकि उन्हें परिवार का डर सताता है जिसके द्वारा उन्हें भावनात्मक रूप से शोषित किया जाएगा साथ ही पढ़ाई छुड़वाने तक की नौबत भी आ जाएगी। शोषण के दूसरे केंद्रों की तरह शिक्षण संस्थानों की ये गतिविधियां स्वीकार्य नहीं हैं बल्कि भीतर तक झकझोर कर रख देती है क्योंकि शिक्षा के इतने बड़े संस्थान में, हमारे कैंपस और प्रोग्रेसिव स्पेसेज़ में अगर यह सब होगा तो बाकी रूढ़ीवादी और पिछड़ी जगहों को बदलना कैसे संभव होगा?

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तस्वीर साभार: indianexpress

गायत्री हिंदू कॉलेज से इतिहास विषय में ऑनर्स की पढ़ाई कर रही हैं। मूलत: उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल क्षेत्र के एक छोटे से गांव से दिल्ली जाने वाली पहली महिला के रूप में उनके पास सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक परिप्रेक्ष्य से जुड़े बहुत सारे अनुभव हैं, जो इंटरसेक्शनल नारीवाद की ओर उनके झुकाव के प्रमुख कारक हैं। उनकी दिलचस्पी के विषयों में नारीवाद को गांवों तक पहुंचाना और ग्रामीण मुद्दों को मुख्यधारा में ले आना शामिल हैं।

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