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“कोई भी भोजपुरी फ़िल्म महिला-केंद्रित नहीं है। इस भाषा में फिल्माए गए सभी गीत स्त्री को वस्तु के रूप में प्रदर्शित करते हैं।”

यह कथन है, साल 2001 के राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार (बेहतरीन समीक्षक श्रेणी) के विजेता विनोद अनुपम का जिनके मुताबिक भोजपुरी में फ़िल्म बनाने वाले लोग भोजपुरी संस्कृति और समाज को बिल्कुल नहीं समझते। असल में भोजपुरी सिनेमा कहीं से भी भोजपुरी के उद्देश्यों को पोषित नहीं करता। क्षेत्रीय कला और साहित्य के निहित उद्देश्यों से इतर भोजपुरी सिनेमा का मूल उद्देश्य आर्थिक फायदे तक सीमित रह गया है। भोजपुरी सिनेमा अश्लीलता और फूहड़ता दर्शाकर अशिक्षित दर्शक वर्ग की सेक्स कुंठा की मांग पूरी करता है।

भोजपुरी सिनेमा की शुरुआती फिल्में आज की तुलना में काफ़ी अलग थी। ऐसा समाज जिसकी अभिव्यक्ति भिखारी ठाकुर के नाटकों और शारदा सिन्हा के गीतों से होती थी, आज वह सिनेमा में लगभग हर मायने में बदल गया है। इसमें एक ढर्रे के तहत बॉडी शेमिंग, ट्रांस समुदाय को उपेक्षित करना और औरतों के शरीर को हद से ज़्यादा ऑब्जेक्टिफाई करना सामान्य हो गया है।

भोजपुरी समाज और फिल्में

भोजपुरी हिंदी की उपभाषा है। यह अपने शब्दों के लिए हिंदी और संस्कृत पर निर्भर है। हालांकि इसे भाषा के रूप में प्रयोग करने वाला एक बड़ा समूह है। भारत में लगभग 3.3 करोड़ लोग भोजपुरी बोलते हैं और विश्व के अलग-अलग देशों में भी रोज़गार की तलाश में गए या उपनिवेशवाद के समय दूसरे देशों में भेजे गए मजदूरों की नई पीढ़ियां भी यह भाषा समझती हैं। इसलिए भोजपुरी सिनेमा के पास एक बड़ा दर्शक वर्ग है। यह बड़ा समूह तमाम कुरीतियों और रूढ़ियों का ग्राउंड ज़ीरो है। दरअसल, भोजपुरी दर्शक वर्ग जिस क्षेत्र से आता है वहां सामाजिक सुधार कार्यक्रमों से भी कोई बड़ा परिवर्तन नहीं आया है। यहां की अधिकतर जनता अशिक्षित है। राजनीति में धर्म और उच्च जाति का प्रभुत्व है। महिलाएं अभी भी घूंघट काढ़े चारदीवारी में सेवा करते हुए अपने कर्तव्य निभा रही हैं।

इस उत्तर-आधुनिक दौर में यहां एक बड़े सामाजिक आंदोलन की आवश्यकता है जो कला आदि के माध्यम से लाया जाना चाहिए था। लेकिन, पृष्ठभूमि की सच्चाई यह है कि क्षेत्रीय सिनेमा अपने आप में ख़ुद जातिवाद, पितृसत्ता और शोषण की नींव रखता नज़र आता है। भोजपुरी फिल्मों के माध्यम से अपने शोषणात्मक रवैये को वैधता देने की कोशिश करता है। यहां क्लीशे कहानियां प्रस्तुत की जाती हैं जिनमें उच्च वर्गीय जमींदार ‘ठाकुर’ होता है और किसी अन्य ‘ठाकुर’ से उसकी दुश्मनी होती है। बदलते समय के साथ भोजपुरी सिनेमा अधिक ‘रिजिड’ ही हुआ है, उसमें प्रगतिशीलता का लेशमात्र भी नहीं मिलता।

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भोजपुरी फिल्मों के माध्यम से अपने शोषणात्मक रवैये को वैधता देने की कोशिश करता है।

सिनेमा की भूमिका

सिनेमा समाज का आईना है और समाज को सिनेमा से बहुत कुछ सीखना चाहिए। असल में, सिनेमा, समाज और साहित्य एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। सिनेमा की विधा अपने भीतर तमाम दूसरी विधाओं को शामिल करते हुए एक बड़े दर्शक वर्ग तक पहुंचती है। इसलिए वैचारिक संचार में इसका महत्व अधिक है। फिल्में असल में केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं हैं। उनमें एक निहित उद्देश्य होता है, समाज के उत्थान व बेहतरी का उद्देश्य। भारत के मुख्य सिनेमा बॉलीवुड को देखें तो उसमें सत्यजीत रे, बलराज साहनी, देविका रानी जैसे प्रमुख नाम हैं जिन्होंने नए सिरे से सिनेमा को गढ़ा। उसे मनोरंजन मात्र का उद्देश्य और सामाजिक शोषण को वैधता देने वाला माध्यम न बनाकर सामाजिक परिवर्तन की नींव रखने वाला माध्यम बनाया।

ऐसा बदलाव भोजपुरी सिनेमा में नहीं हुआ। भोजपुरी सिनेमा का शुरुआती दौर साल 1963- ‘गंगा मईया तोहके पियरी चढ़ईबै’ में धार्मिक रहा, बाद में 1990 के बाद ये पूरी तरह कमर्शिअल सिनेमा हो गया जिसमें सामाजिक पितृसत्ता के कारण स्त्री देह का बाज़ारीकरण किया गया। जब यह धार्मिक था, तब भी स्त्रियों पर धर्म के नियम और कानून थोपकर उनका शोषण करता था। आज भोजपुरी सिनेमा में धड़ल्ले से स्त्री शरीर को निशाना बनाते हुए गाने बन रहे हैं, जिन्होंने स्त्री की परिभाषा वस्तु होने भर तक सीमित कर दी है। स्त्री के अंगों, वस्त्रों और उसकी मुद्राओं को इस तरह दिखाया जा रहा है, जिससे यह नैरेटिव सिद्ध हो कि तथाकथित वस्त्र अथवा मुद्रा ‘अपीलिंग’ होती है। यही कारण है कि आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में लड़कियों के साथ यौन हिंसा और बलात्कार के लिए लड़कियों को ही दोषी ठहरा दिया जाता है।

यौनिकता और भोजपुरी सिनेमा

सामंतवादी दौर के बाद धर्म अधिक शक्तिशाली हुआ जिससे दिन-प्रतिदिन के जीवन में उसकी पैठ बनी। तमाम धार्मिक ग्रन्थों के आचारों और नियमों के माध्यम से स्त्री को हाशिए पर ढकेल दिया गया। धर्म स्त्री को माया और वासना के रूप में दर्शाते हुए उसे संतों और समाज कल्याण के इच्छुकों के लिए सदैव श्राप बताता आया है। धार्मिक कथाओं में अक्सर दर्शाया जाता है कि अप्सराएं ऋषियों का ध्यान भंग करने आती थीं यानी एक मापदंड बना दिया गया, जिसके अनुसार सेक्स की इच्छा को हमेशा बुरी चीज़ मानकर प्रसारित किया गया।

आज भी परिवार इसपर बात नहीं करते और यह ‘गन्दी बात’ मानी जाती है। बढ़ती उम्र के साथ व्यक्ति हार्मोन्स के कारण सेक्स की इच्छा तो महसूस करता है लेकिन तथाकथित सभ्य होने की परिभाषा के कारण वह इसे ज़ाहिर नहीं कर पाता, नतीजतन वह इच्छा कुंठा बनकर उभरती है। दरअसल, यह समाज स्त्री के शरीर को नहीं जानता, वह एक औरत के शरीर को अपने शरीर की तरह सहजता से नहीं स्वीकार करता है। रोक-टोक के कारण किसी भी स्त्री से बात तक नहीं कर पाने के कार उस शरीर के प्रति आकर्षण और उसे भेदने की इच्छा और तीव्र होती है। यही कारण है कि अशिक्षित ग्रामीण भोजपुरी समाज में इतनी तेज़ी से खेसारी लाल यादव और रितेश के अश्लील और औरतों के शरीर पर टिके गाने इतने पसंद किए जाते हैं।

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भोजपुरी समाज अभी भी रूढ़ियों और कुरीतियों से जूझ रहा है। इन क्षेत्रों में धर्म और जाति अभी भी सबसे महत्वपूर्ण मसले हैं। स्त्रियां हाशिए पर हैं और पितृसत्ता चरम पर है, धर्म जीवन का अभिन्न अंग है। यहां फ़िल्म के महत्वपूर्ण तकनीशियन और कारीगर पुरुष हैं। फ़िल्म निर्माता पुरुष हैं इसलिए वे पुरुषों के चश्मे से ही फिल्में बनाते हैं। दर्शक वर्ग भी पुरुष है। इसलिए पूरी फिल्म इस उद्देश्य से बनती है कि उक्त समूह को आकर्षित कर बड़ी हिट हो जाए। भोजपुरी सिनेमा में जो कुछ फिल्में अश्लील नहीं भी होती वे भी पितृसत्ता को ढोती दिखती हैं। उनके माध्यम से पत्नी, बहन और बेटी के रूप में आदर्श स्वरूप गढ़े जाते हैं जिनके जीवन का मूल उद्देश्य पिता, पति और भाई के ‘सम्मान’ के लिए अपना जीवन न्योछावर करना होता है।

इन फिल्मों में अधिकतर ‘ठाकुर’, ‘ब्राह्मण’ और ‘यादव’ जातियों को दिखाया जाता है जो सीधे तौर पर अन्य जातियों को कमतर आंकने और समाज में उनकी मौजूदगी को नकारती मालूम पड़ती हैं। यहां की अमिनेत्रियों और गायिकाओं को बोलने तक की स्वायत्तता नहीं होती। रोजगार की कमी के कारण लगातार नए लोग आ रहे हैं और वे किसी भी समय प्रतिस्थापित की जा सकती हैं, यह डर उन महिलाओं को अपनी राय रखने का पूरा मौका नहीं देता। हाल ही में एक प्रसिद्द भोजपुरी अभिनेत्री ‘रानी चटर्जी’ ने यह बात ट्विटर पर शेयर करते हुए कहा कि महिलाएं बोल नहीं सकती क्योंकि फिल्म से उन्हें हटाकर दूसरे लोगों को रख दिया जाएगा।

भोजपुरी सिनेमा जिस समाज का नेतृत्व कर रहा है उसमें बहुत सारे बदलाव किए जाने की आवश्यकता है। ऐसे में अगर सिनेमा भी उसी पितृसत्ता और स्त्री-द्वेष को पोषित करेगा तो संपूर्ण बदलाव के लिए दूसरे अवसर खोजने होंगे। यह अवसर भोजपुरी साहित्य को मिले। साथ ही, पढ़े-लिखे लोगों को इन समस्याओं को समझने की ज़रूरत है। इन क्षेत्रों में जाकर व्यापक सुधार करने और कुंठाओं को तोड़ने की आवश्यकता है। इसमें महिलाओं को आगे बढ़ना होगा और तमाम रूढ़ियों को खत्म करना होगा। ये गाने और फिल्में सेंसर किए जाने चाहिए क्योंकि ये कम पढ़े लिखे युवाओं को वो सब करने के लिए उकसा रहे, जिसमें महिला को इंसान नहीं समझा जाता, उसकी राय नहीं ली जाती, न ही उसकी भावनाओं का कोई मोल होता है।

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तस्वीर साभार : indianobserverpost

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