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कानून क्या कहता है? 

घरों में होने वाली हिंसा को घरेलू हिंसा कहते है। आमतौर पर घरेलू हिंसा का सामना अधिकतर महिलाओं को ही करना पड़ता है। इसीलिए, समय-समय पर भारत में घरेलू हिंसा को रोकने के लिए अलग-अलग बनाए गए और पारित किए गए। घरेलू हिंसा को रोकने के लिए हमारे देश में निम्नलिखित कानून हैं :

  1. सबसे पहले तो हम बात करेंगे भारतीय दंड संहिता 1860 की धारा 498A की। इस धारा के तहत, अगर एक विवाहित महिला का पति या पति के रिश्तेदार महिला से क्रूरता से बर्ताव करते है तो उन्हें तीन साल तक की सजा दी जा सकती है। साथ ही आरोपी को जुर्माने का भी भुगतान करना होगा। इसी धारा में ‘क्रूरता’ को भी परिभाषित किया गया है। अगर पति या उसके रिश्तेदार महिला से ऐसा कोई भी बर्ताव करते है जिससे महिला को मजबूरन अपनी जान लेनी पड़ती है तो उसे ‘क्रूरता’ का अपराध माना जाएगा। 
  1. भारतीय दंड संहिता 1860 की धारा 304B के अंतर्गत अगर किसी महिला की हत्या दहेज़ के लिए की जाती है तो इस अपराध को करने वालों को सात साल से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा दी जा सकती है। सार में कहे तो ये धारा तब लागू होती है जब दहेज़ के लिए महिलाओं को इस स्तर पर प्रताड़ित किया जाता है कि उनकी जान ही चली जाती है।         
  1. इसके अतिरिक्त, घरेलू हिंसा को रोकने के लिए 2005 में भारतीय संसद ने एक कानून पारित किया है, ‘घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005’। इस कानून के तहत, अगर किसी महिला (विवाहित या अविवाहित) का उसी के अपने घर में शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, यौन शोषण किया जाता है, तो उस महिला को कोर्ट से निम्नलिखित राहत मिल सकती है –
  • सरंक्षण आदेश 
  • काउंसलिंग 
  • स्वास्थ्य सुविधा
  • भरण पोषण के लिए मुआवज़ा
  • शेल्टर होम में रहने की जगह, आदि।    

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कोर्ट से राहत पाने के लिए, पीड़िता को कोर्ट में यह साबित करना होगा कि पीड़िता और उत्पीड़न करने वाले के बीच में ‘डोमेस्टिक रिलेशनशिप’ है। डोमेस्टिक रिलेशनशिप का अर्थ यह है कि पीड़िता और उत्पीड़न करने वाला, इनमें से किसी भी प्रकार से एक दूसरे से संबंधित है- 

  • पीड़िता और उत्पीड़क के बीच खून का सम्बन्ध है, जैसे कि उत्पीड़क पीड़िता का पिता है, चाचा है, आदि। 
  • पीड़िता और उत्पीड़क के बीच शादी की वजह से एक संबंध है, जैसे कि उत्पीड़क पीड़िता का पति है, देवर है, आदि।  
  • पीड़िता और उत्पीड़क के बीच जो संबंध है वो ‘शादी के नेचर’ में है।  
  • पीड़िता और उत्पीड़क के बीच ‘एडॉप्शन’ की वजह से कोई संबंध है। जैसे कि उत्पीड़क पीड़िता का सौतेला पिता है, सौतेला भाई है, आदि ।
  • पीड़िता और उत्पीड़क संयुक्त परिवार के तहत एक साथ रह रहे है। ऐसे परिस्थिति में पीड़िता संयुक्त परिवार के किसी भी परिवार (सास, ससुर,आदि) के खिलाफ केस कर सकती है अगर वे उसका शोषण कर रहे हैं तो।      

इसी के साथ, यह भी साबित करना होगा कि पीड़िता और उत्पीड़क एक साथ एक ही घर में रह चुके हैं या रह रहे हैं। कानूनन, इसे ‘शेयर्ड हाउसहोल्ड’ कहा जाता है। वैसे तो घरेलू हिंसा की शिकायत करने के लिए कोई तय समय सीमा नहीं है लेकिन अगर शिकायत करने में देरी हो जाए तो कोर्ट के सामने देरी के कारण स्पष्ट करने होंगे।     

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घरेलू हिंसा की शिकायत कैसे कर सकते हैं?

पीड़ित महिला के पास मुख्य तौर पर तीन रास्ते होते हैं –

  1. पहला तो ये कि वह पुलिस की मदद ले सकती है। अगर हालत काबू से बाहर जा रहे हैं, महिला के लिए उत्पीड़न असहनीय हो रहा है तो उसे तुरंत ही 100 नंबर पर कॉल करना चाहिए। जब आप इस नंबर पर कॉल करें तो आपक साथ जो भी घटित हुआ है, उसकी जानकारी विस्तार से दें। साथ ही साथ, आपकी लोकेशन और कांटेक्ट डिटेल्स भी साझा करें। इसके अतिरिक्त, पीड़ित महिला पति/ रिश्तेदारों के खिलाफ धारा 498A के अंतर्गत एफआईआर भी दर्ज करवा सकती है। आम तौर पर एफआईआर तब ही दर्ज करवाई जाती है जब शोषण की सारी हदें ही पार हो जाती है।        
  1. दूसरा विकल्प यह है कि पीड़िता राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) को शिकायत करे। महिला आयोग में शिकायक दर्ज करवाने के लिए कई माध्यम हैं। NCW की वेबसाइट- ncwapps.nic.in  पर ‘रजिस्टर ऑनलाइन कम्प्लेंट्स’ के सेक्शन पर जाकर शिकायत दर्ज करवाई जा सकती है। डाक के द्वारा शिकायत लिखित में भी भिजवाई जा सकती है। इसके अलावा, पीड़िता 1091 हेल्पलाइन नंबर पर भी कॉल कर सकती है। ncw@nic.in पर मेल के द्वारा भी शिकायत दर्ज करवाई जा सकती है। हर राज्य में राज्य महिला आयोग (SCW) भी होता है। राष्ट्रीय महिला आयोग के अतिरिक्त, पीड़िता राज्य महिला आयोग की भी मदद ले सकती है।      
  1. तीसरा विकल्प यह है कि पीड़िता कोर्ट की मदद ले। घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 की धारा 18 के तहत शोषित महिला कोर्ट से मदद मांग सकती है। राहत के तौर पर, कोर्ट उसके हक़ में संरक्षण आदेश, मुआवज़ा देने का आदेश, रेजिडेंस आदेश दे सकती है। इस पूरी प्रक्रिया का उपयोग करने के लिए, पीड़िता को प्रोटेक्शन अफसर की मदद लेनी होगी। 2005 अधिनियम के तहत, हर जिलें में प्रोटेक्शन अफसर की नियुक्ति की जाती है। आपके जिलें में कौन सा प्रोटेक्शन अफसर है, यह जानने के लिए आप इस लिंक की मदद ले सकती है। प्रोटेक्शन अफसर ही आपकी मदद करेगा/ करेगी डोमेस्टिक इंसिडेंट रिपोर्ट (DIR) को बनाने में, कोर्ट के सामने फाइल होने वाली एप्लीकेशन को बनाने में।         

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तस्वीर साभार : Feminism In India

Sonali is a lawyer practicing in the High Court of Rajasthan at Jaipur. She loves thinking, reading, and writing.

She may be contacted at sonaliandkhatri@gmail.com.

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2 COMMENTS

  1. meri sister domestic violence s suffer kr rhi h lekin vo husband k khilaf kojaction nhi le.rhi kyunki unhen dar h ki.vo unke baccho ko or unhen jan s na marde…..or pariwar bachane k liye vo violence seh thi hai….smjh nahi aa rha h ki kese bachayen us jahil insaan s…unki vo khud sarpanch hai or uski netagiri m achhi pehchan h isiliye koi police vala koi action nhi le.pa rha hai….Plz help.me

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