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‘खेतों में मज़दूरी करने से लेकर आज फ़ेमिनिज़म इन इंडिया में लिखने तक का सफ़र चुनौतियों भरा रहा है। ये पहला मौक़ा है जब मैं अपनी संघर्ष की कहानी साझा कर पा रही हूं।’

बनारस से थोड़ी दूरी पर मेरा गांव है करधना (भटपुरवां)। मैं एक गरीब परिवार से हूं। पिता मज़दूरी करते हैं और कभी-कभी दूसरों के घर जाकर साड़ी की बुनाई भी करते हैं और मां दूसरों के खेतों में जाकर मजदूरी करती हैं। लेकिन दुर्भाग्यवश माता-पिता की कुल मज़दूरी भी इतनी नहीं हो पाती है कि दस सदस्यों वाले परिवार (आठ बच्चे और दंपति) का पेट भी ठीक से भर सके।

इसी ग़रीबी के चलते मुझे बचपन से ही मामा के घर भेज दिया गया, जिससे परिवार का बोझ थोड़ा हल्का हो सके। मामा के घर पर जब दूसरे बच्चों को मैं स्कूल जाते देखती तो हमेशा स्कूल जाने और पढ़ाई करने की इच्छा होती। पर मामा स्कूल नहीं भेजते और मामी घर का सारा काम करवाती। स्कूल जाने की बात पर वे हमेशा कहते ‘क्या करोगी स्कूल जाकर? कौन-सा कलेक्टर बनोगी? लड़की हो एक दिन तो चूल्हा चौका ही करना है।’ इसके बाद जब मुझे लगा कि मैं दूसरों बच्चों की तरह कभी स्कूल नहीं जा पाऊंगी और कभी नहीं पढ़-लिख पाऊंगी तो मैंने मामा के घर से वापस अपने घर जाने की ज़िद की। फिर अपने पिता जी से कहकर मैंने अपना नाम प्राईमरी स्कूल में लिखवाया। उस समय फीस दो रुपये महीना थी। मुझसे दो बड़े भाई और एक दीदी है और दो छोटे  भाई और दो बहन है।

घर की आर्थिक स्थिति ठीक न होने की वजह से बड़े भाई ने कक्षा आठ तक पढ़ाई करके स्कूल छोड़ दिया और मज़दूरी करना शुरू कर दिया। वहीं दीदी को हाईस्कूल तक पढ़ाकर, क़र्ज़ लेकर उनकी शादी कर दी गई। अब पिता जी के ऊपर कर्ज़ और बच्चों की जिम्मेदारी दोनों थी, जिससे वे हमेशा चिंतित रहते थे। क़र्ज़ और ज़िम्मेदारी के चलते पिता जी ने अपने ऊपर और भी काम का भार लिया, जिससे वे क़र्ज़ चुका सकें। इस बीच स्कूल में फ़ीस देने के लिए मैं डरते-डरते पिता जी से फ़ीस मांगती। कई बार फ़ीस न दे पाने की वजह से टीचर मुझे क्लास में भी घुसने नहीं देते थे। किसी तरह मैंने सरकारी स्कूल में आठवी कक्षा तक पढ़ाई पूरी की। उसके आगे मैं पढ़ना चाहती थी लेकिन परिवार वाले नहीं पढ़ा रहे थे। पिता जी हमेशा कहते ‘तुम्हें पढ़ाए या खाने को जुटाए।’ जब मुझे लगा कि शायद मैं नही पढ़ पाऊंगी तब मैंने अपने पिताजी और मां से बोला कि मैं मजदूरी करके पढ़ाई करूंगी। तब जाकर पिता जी ने मेरा एडमिशन एक प्राइवेट स्कूल में करवाया क्योंकि आसपास कोई सरकारी स्कूल नहीं था।

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आज मैं कई गांव में महिलाओं और किशोरियों के साथ काम करती हूँ। उन तक हर वो अवसर और सूचना पहुंचाने की कोशिश कर रही हूँ, जो मुझे कभी नहीं मिले।

इसके बाद मैं स्कूल जाती और समय निकालकर कोई काम मिलता तो वो भी करती, जिससे मेरी पढ़ाई परिवार पर बोझ न बने। मैं,  मिर्ची तोड़ना, आलू की गोड़ाई करना, सब्जी तोड़ना, मटर तोड़ना, धान की रोपाई करना, धान और गेहूं की कटाई करना जैसे काम करती और अनाज की जगह अपनी पढ़ाई के लिए पैसा लेती थी। इस तरह मैंने दूसरों से किताब मांगकर पढ़ाई की और हाईस्कूल अच्छे नंबरों से पास किया। इसके बाद परिवारवाले और रिश्तेदार सभी बोलने लगे कि ‘अब इसकी शादी कर देनी चाहिए।’

शादी की बात सुनते ही मैं रोने लगती और बार-बार अपने मां और पिताजी से बोलती की मुझे अभी शादी नही करनी है मुझे अभी और आगे तक पढ़ना है। मैं पढ़-लिखकर कुछ बेहतर करना चाहती थी अपने परिवार के लिए। मेरी मां और पिताजी को महंगाई को लेकर डर था और ये भी डर था कि अगर मैं ज्यादा पढ़ लिख लूंगी तो उसी हिसाब से लड़का भी खोजना पड़ेगा और जिसके लिए ज्यादा दहेज भी देना पड़ेगा। तब मैं हमेशा कहती ‘मैं पढ़ लिख जाऊंगी। तब मैं अपने शादी में एक भी दहेज नही लेने दूंगी।’ फिर भी मेरे परिवार वाले मेरी बातों को नहीं मान रहे थे। फिर भी मैं अपने परिवार वालों से लड़- झगड़कर इंटर फाइनल किया और उसी बीच इंटर में मुझे स्कॉलरशिप मिल गई। इंटर के बाद मेरे परिवारवाले मुझ पर शादी का दबाव डालने लगे लेकिन मैं तैयार नहीं हुई।

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तब मेरी मां और बड़े भाई ने मेरा साथ और मेरा डिग्री कॉलेज में एडमिशन करवाया। पढ़ाई के साथ मुझे स्कॉलरशिप मिली जिसकी मदद से मैंने अपनी पढ़ाई पूरी की। इस तरह मैंने बीए तक अपनी पढ़ाई पूरी कर ली। मैं आगे पढ़ना चाहती थी लेकिन इसके लिए मेरे छोटे भाई-बहन को अपनी पढ़ाई रोकनी पड़ती, इसलिए मैंने फ़िलहाल अपनी पढ़ाई रोकने का फ़ैसला किया। इसके बाद मैं दो साल दूसरों के खेतों में मज़दूरी करने जाती। इस दौरान मुझे किसी ने ये जानकारी दी कि एक संस्था गांव में महिलाओं और किशोरियों के साथ उनके अधिकार और स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों पर काम करने के लिए कार्यकर्ता तलाश रही है, मैंने बिना समय गंवाए इस नौकरी के लिए आवेदन किया और मेरा चयन हो गया।

आज मैं कई गांव में महिलाओं और किशोरियों के साथ काम करती हूं। उन तक हर वो अवसर और सूचना पहुंचाने की कोशिश कर रही हूं, जो मुझे कभी नहीं मिले। इस काम ने मुझे मेरी पहचान दी है। पहले मुझे मेरे गांव के लोग नहीं जानते थे और जानते भी तो उनके लिए मेरी पहचान एक मज़दूर से ज़्यादा नहीं थी। लेकिन आज मैं गांव में संस्था का प्रतिनिधित्व करती हूं, गांव के जनप्रतिनिधियों से मिलती हूं और गांव के लोग, महिलाएं और किशोरियां मुझे जानने लगी है। मैं सीख रही हूं, बढ़ रही हूं और ज़िद कर रही हूं कि मुझे और मेरी जैसी हर लड़की को अपने सपने पूरा करने का समान अवसर मिले। इसलिए मैं अपनी कहानी और आगे बढ़ने की अपनी इस ज़िद को लिख रही हूं।  

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तस्वीर साभार : cyclingweekly

बनारस से दूर करधना गाँव की रहने वाली वंदना ने सामाजिक और आर्थिक संघर्ष के बीच अपनी पढ़ाई पूरी की और एक स्वयंसेवी संस्था में क्षेत्र समन्विका के पद पर कार्यरत है। वंदना अपनी लेखनी के ज़रिए गाँव में नारीवाद, जेंडर और महिला मुद्दों को उजागर करने की दिशा में आगे बढ़ रही है।

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