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कभी आपने सोचा है कि आपके स्कूलों में ज़्यादातर शिक्षक महिलाएं ही क्यों होती हैं ? साल 2012 की टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में 64 लाख स्कूल शिक्षक हैं और उनमे से 29 लाख शिक्षक महिलाएं हैं। पिछले कुछ सालों में स्कूलों में महिला शिक्षकों की संख्या लगातार बढ़ी है। जहां साल 2008-09 के दौरान स्कूलों में 43.46 फीसद महिला शिक्षक थी। वहीं, साल 2010 -11 में ये आंकड़ा 45.51 फीसद तक पहुंच गया। स्कूलों में पुरुष शिक्षकों की तुलना में ज्यादा महिला शिक्षकों होने के पीछे कई वजह होती हैं। बचपन में ही कई लड़कियां अपनी महिला शिक्षकों से प्रेरणा लेकर मन ही मन यह फैसला कर लेती हैं कि वे भी बड़ी होकर शिक्षिका ही बनना चाहती हैं क्योंकि हमारे स्कूलों में अधिकतर महिला शिक्षक ही देखने को मिलती हैं। ऐसे में यह सवाल मन में आना लाजमी हैं कि हमें पुरुषों की तुलना में ज्यादा महिला शिक्षक स्कूलों में क्यों नज़र आती हैं? 

इसके पीछे अनेक कारण निकलकर आते हैं। कई बार बचपन से ही लड़कियों के दिमाग में यह बिठा दिया जाता है कि पढ़-लिखकर ‘शिक्षक’ बनना ही उनके लिए सटीक पेशा होगा। इस सलाह को यह कहकर सही ठहराया जाता है कि इस पेशे में उनकी बच्चों के साथ ही दोपहर में छुट्टी हो जाएगी, जिससे वे घर के प्रति भी अपनी जिम्मेदारियां आसानी से पूरी कर पाएंगी। साथ ही लड़कियों को यह भी कई बार सुनने को मिलता है कि शिक्षक बनकर वे आर्थिक रूप से मजबूत भी हो जाएंगी, उन्हें देर तक घर से बाहर नहीं रहना पड़ेगा और घर भी संभल जाएगा। बड़ी ही शान से ऐसे तर्क देकर लड़कियों और महिलाओं को एक शिक्षक बनने के फायदे बताए जाते हैं। साथ ही साथ यह चेतावनी भी दी जाती है कि अगर वे किसी दूसरे पेशे को अपनाएंगी तो घर और बाहर, दोनों जिम्मेदारियों को निभाना मुश्किल होगा। इसी वजह से लड़कियां/ महिलाएं इस पितृसत्तात्मक तर्क को अपनाकर अपनी इच्छा से भी इस पेशे को अपनाना पसंद करती हैं। इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि घर के काम का लैंगिक विभाजन भी महिलाओं/ लड़कियों को मजबूर करता है शिक्षा के पेशे को अपनाने के लिए।

साल 2012 की टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में 64 लाख स्कूल शिक्षक हैं और उनमें से 29 लाख शिक्षक महिलाएं हैं।     

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इसके अतिरिक्त इस पेशे के बारे में यह सोच भी है कि जैसे घर में मां बच्चे की देख-रेख अच्छे से कर लेती हैं। ठीक वैसे ही वे स्कूल में भी इस प्रकार की जिम्मेदारियां बेहतर तरीके से निभा पाएंगी। यह साफ़ दिखता है वर्ल्ड बैंक के आंकड़ों में, साल 1975 में जहां सिर्फ 25 फीसद महिलाएं प्राइमरी स्कूलों में शिक्षक थी। वहीं, साल 2017 में यह आंकड़ा 51.21 फीसद तक पहुंच गया। यह मानसिकता बहुत ही गहरी है कि महिलाएं पुरुषों की तुलना में ज्यादा संवेदनशील, पारिवारिक और ध्यान रखने वाली होती हैं। यही वजह है कि घर-परिवार, समाज और स्कूल प्रशासन से भी महिलाओं को इस पेशे को अपनाने के लिए काफी प्रोत्साहित भी किया जाता है। लेकिन ऐसी मानसिकता हमारे समाज में पितृसत्ता को बढ़ावा देती है। लड़कियों और महिलाओं के दिमाग में इस प्रकार की बातें भरकर हम उनसे यह मौका ही छीन लेते हैं कि वे ऐसे करियर विकल्पों के बारे में सोचे जो सख्ती और कठोरता जैसे गुणों की मांग रखते हो।  

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स्कूलों में महिला अध्यापिकाओं की इस बढ़ती हुई संख्या के पीछे भारत सरकार की 1986 की एक पॉलिसी भी है। भारत सरकार ने साल 1986 में ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड के तहत विद्यालयों में 50 फीसद नौकरियां महिलाओं के लिए आरक्षित की जाती थी। इसके तहत अगर किसी विद्यालय में दो शिक्षकों को नौकरी दी जा रही है तो उसमे से एक नौकरी में एक महिला को वरीयता दी जाएगी। सरकार का ये आरक्षण अच्छा है, लेकिन कई पूर्वाग्रहों से ग्रसित है।  

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जहां 1986 में ही देश की सरकार ने महिलाओं को स्कूलों में 50 फीसद आरक्षण दे दिया। वहीं, आजादी के 73 साल बाद भी देश की संसद में महिलाओं को 33 फीसद आरक्षण अब तक नहीं दिया गया है। ऐसा क्यों? क्या इसलिए कि  ‘ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड’ बनाने वालों को ये लगता था कि प्राइमरी स्कूल में पढ़ाने और पेरेंटिंग करने में ज्यादा फ़र्क़ नहीं होता? प्राइमरी स्कूल में शिक्षक की नौकरी महिलाओं के लिए एक ‘परफेक्ट’ नौकरी है इसलिए यहां ये 50 फीसद आरक्षण के लायक हैं, लेकिन महिलाओं को शायद देश की संसद का हिस्सा बनने के लायक नहीं समझा जाता है।

पितृसत्ता की नींव पर आधारित ऐसे तर्क जो महिलाओं को एक शिक्षक बनने की सलाह देते हैं पूरे समाज को एक संदेश देते हैं कि शिक्षक बनना ही महिलाओं के लिए एक सबसे उत्तम करियर विकल्प है। ये कुछ कारण हैं जिस वजह से हमें शिक्षा के क्षेत्र में में ज्यादा महिलाएं नजर आती है। कहने का ये तात्पर्य बिलकुल नहीं है कि शिक्षा दूसरे पेशों की तुलना में एक कम अच्छा पेशा है, लेकिन एक महिला को शिक्षक बनने के लिए जो तर्क दिए जाते हैं उनका आधार पूरी तरह स्त्री-विरोधी नज़र आता है।

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तस्वीर साभार : adb.org

Sonali is a lawyer practicing in the High Court of Rajasthan at Jaipur. She loves thinking, reading, and writing.

She may be contacted at sonaliandkhatri@gmail.com.

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