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दिल्ली के बटला हाउस इलाके में लगभग दो किलोमीटर पैदल चलने पर एक कच्ची सड़क का रास्ता आता है, जहां से आगे यमुना की ओर जाने पर समूह में झुग्गियां और टेंट लगे दिखाई पड़ते थे। बीते 27 सितंबर को जब हम वहां पहुंचे तो वहां झुग्गियों की जगह मलबा बिखरा हुआ मिलता है, एक ओर जेसीबी गड्ढा खोद रही थी और उसके पीछे फटे-गंधाते कपड़ों में बच्चे अपने गंदे हाथों से आंखें मलते खड़े थे। महामारी के कारण पहले से ही हताश-निराश लोग जहां- तहां झुंड में इकट्ठे होकर कभी क़िस्मत को कोसते हुए ईश्वर को याद करने लगते थे तो कभी सरकार को, अफ़सोस कि यहां दोनों में से कोई उनकी सुध लेने वाला नहीं है।

25 सितंबर की घटना के बारे में बताते हुए रुख़साना बेग़म कहती हैं, ‘”सुबह क़रीब 11 बजे अधिकारी जेसीबी लेकर आए और उन्होंने एक घंटे में ही हम सब की झुग्गियां तोड़ दी। हमारा पूरा सामान अंदर दब गया और हमारे जानवर भी मर गए।” रुखसाना परवीन यहां करीब 15 साल से रह रही हैं, उनके पति की मौत हो गई है और परिवार में एक जवान बेटी और दो छोटे बेटे हैं। अपनी बेटी शहज़ादी परवीन की ओर इशारा करते हुए आगे कहती हैं, “उन लोगों ने शौचालय भी तोड़ दिया, घर में जवान बेटी है, कहां जाएगी। हमारे सिर से छत छीन ली, लॉकडाउन में पहले ही बरबाद हो चुके हैं, अब कहां जाएंगे।”

तस्वीर: गायत्री यादव

यमुना के धोबीघाट इलाके में क़रीब 150 झुग्गियां रही होंगी, जो अब मलबा बनकर बिखरी हुई हैं। इधर-उधर कपड़ों का तिरपाल लगाए लोग बैठे हुए हैं। बच्चे धूप में पॉलीथीन बीन रहे हैं और कोई भी गाड़ी देखकर उसके पीछे दौड़ने लगते हैं। औरतें बात करते-करते रो पड़ती हैं और आदमियों के चेहरे निराश हैं। हर आदमी एक आशा की किरण की तलाश करता दीखता है। हर तरफ़ गन्ध,कूड़े और ईंट-पत्थर का ढेर लगा पड़ा है। लोग इधर से उधर थोड़े बहुत सामान के साथ बैठे नज़र आते हैं और ऐसा लगता है, जैसे भारत का बंटवारा अभी-अभी हुआ हो।

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तस्वीर: गायत्री यादव

धोबी घाट की झुग्गियों में रहने वाले अधिकतर लोग यूपी या बिहार से कई साल पहले रोजी-रोटी के लिए दिल्ली आए थे और यहीं बस गए थे। तब उन्हें उम्मीद नहीं थी कि उनका यह ‘घर’ उनसे छिन जाएगा बल्कि सरकारों के प्रतिनिधियों द्वारा उनसे वायदे किए गए थे कि ‘जहां झुग्गी वहीं पक्का मकान’ बनवा दिया जाएगा। 81 साल के मोहम्मद इलियास कहते हैं, “हमें लगता था एक दिन झुग्गी की जगह पक्का मकान मिल जाएगा, सरकार ने तो यह भी छीन लिया, 25 साल से यहीं रह रहा हूं, सब धंस गया, खाने के लिए एक दाना नहीं है, छोटे बच्चे हैं, क्या खिलाएंगे, वोट मांगने सब आते हैं, हमें देखने कोई नहीं आया।”

यमुना के धोबीघाट इलाके में क़रीब 150 झुग्गियां रही होंगी, जो अब मलबा बनकर बिखरी हुई हैं। इधर-उधर कपड़ों का तिरपाल लगाए लोग बैठे हुए हैं। बच्चे धूप में पॉलीथीन बीन रहे हैं और कोई भी गाड़ी देखकर उसके पीछे दौड़ने लगते हैं। औरतें बात करते-करते रो पड़ती हैं और आदमियों के चेहरे निराश हैं।

बटला हाउस के इस इलाके में रहने वाले अधिकतर लोग दिहाड़ी मज़दूर हैं। महिलाएं भी घरों में जाकर काम करती हैं। कोरोना काल से पहले इनकी रोज़ की कमाई 200 से 400 तक थी लेकिन वैश्विक महामारी के कारण लॉकडाउन में इन्हें खाने तक के लाले पड़ गए थे। अब भी इन्हें आसानी से काम नहीं मिल रहा है और मज़दूरी की दरों में भी गिरावट आई है, इस स्थिति में ये लोग किराए पर कमरा लेकर रहने में सक्षम नहीं हैं और ये झुग्गियां ही इनका घर थी। हमसे बात करते हुए नाज़मी फ़ातिमा कहती हैं, ‘ छोटा बच्चा बीमार है, उनकी दवाई तक अंदर दब गई। महिला पुलिस ने धक्का मारकर गिरा दिया था, आंख जाते-जाते बची है। लॉकडाउन में मुश्किल से 1000 रुपए महीने पर काम कर बच्चे पाल रही थी, झुग्गी हमारे लिए भरोसा थी, अब तो बेसहारा हो गए हैं।’

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धोबी घाट इलाके में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की ओर से वेटलैंड पुनर्जीवित करने के लिए खुदाई की जा रही है। उनके अधिकारियों ने कहा कि झुग्गियों में रहने वाले लोग यमुना में प्रदूषण फ़ैला रहे हैं, जिसके कारण मछलियां मर जाती हैं। इन्हें फ़ौरन यहां से हटना चाहिए हालांकि झुग्गियां तोड़े जाने और उन लोगों के बारे में सवाल पूछने पर इसे उन्होंने दिल्ली विकास प्राधिकरण का कार्यक्षेत्र बताते हुए किनारा कर लिया। पुलिस के लोग भी अपनी स्थिति के हिसाब से कुछ न कह पाने की अक्षमता बताते हुए धोबीघाट में रहने वाले लोगों को नशाखोर और अपराध फैलाने वाले तत्व बताते हुए यह सलाह दे रहे थे कि इन लोगों को यहां से कहीं और चले जाना चाहिए। दिल्ली विकास प्राधिकरण का कोई भी अधिकारी वहां मौजूद नहीं था, हालांकि उनके बाशिंदे जो काम कर रहे थे, उनकी सुरक्षा के लिए प्राइवेट फर्म की सिक्योरिटी एजेंसी के लोग मौजूद थे, उन्होंने कुछ भी कहने से इनकार कर दिया।

इन सभी बातों को सुनते हुए यह महसूस होता जा रहा था कि इस देश में गरीब आदमी की जिम्मेदारी कोई नहीं लेता, उनके लिए कोई विकास कार्यक्रम नहीं हैं, न ही सरकारों को उनसे कोई लेना-देना है। यह वही देश है, जहां छात्रों और एक्टिविस्ट्स को अपराधी घोषित करने के लिए सरकारों के पास लाखों पन्ने हैं, वहीं मज़दूरों के लिए कोई कागज़ नहीं है, क्योंकि सरकार को इससे कोई फर्क ही नहीं पड़ता कि इस देश का ग़रीब कैसे रह रहा है। उसके लिए वह एक वोट भर है। यहाँ की नीतियां ऐसी हैं कि अमीर दिन प्रतिदिन अमीर होता जा रहा है और ग़रीब का अस्तित्व मिटता जा रहा है।

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तस्वीर साभार : गायत्री यादव

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