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कोरोना महामारी के कारण दुनियाभर की अर्थव्यवस्था बिलकुल ठप्प पड़ चुकी है। लोगों के रोजगार छिन चुके हैं, व्यापार मंदी की मार झेल रहा है, लोगों के हाथों में पैसा नहीं है तो बाज़ारों में मांग भी कम है। लॉकडाउन के बाद धीरे-धीरे खुलने वाले व्यापारों को कारीगर और मज़दूर नहीं मिल रहे क्योंकि लोग अपने-अपने घर को लौट चुके हैं। जो प्रवासी मज़दूर शहरों की ओर दोबारा लौट रहे हैं उन्हें काम नहीं मिल रहा। कई रिपोर्ट में ये दावा किया जा चुका है कि कोरोना के कारण दुनिया की एक बड़ी आबादी गरीबी के मुंह में समा रही है। लेकिन विश्व स्वास्थ्य संगठन की माने तो यह महामारी अभी अपने अंतिम चरण में नहीं पहुंची है। कई देशों में कोरोना वायरस की दूसरी लहर भी शुरू हो गई है। इसी संबंध में यूएन वीमेन और सयुंक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम के साझा अध्ययन में एक बात सामने आई है जिसके मुताबिक दुनिया के सामाजिक और आर्थिक हालात काफी दयनीय स्थिति में पहुंच सकते हैं।

इस रिपोर्ट में कहा गया है कि कोरोना महामारी महिलाओं को बहुत ज़्यादा प्रभावित करेगी। कोविड-19 के आने से पहले साल 2019 से 2021 के बीच महिलाओं में गरीबी दर 2.7 फीसद तक घटने का अनुमान लगाया गया था। लेकिन अब महामारी के इस दौर में आई नई रिपोर्ट में कहा गया है कि महिलाओं की गरीबी में 9.1 फीसद की वृद्धि हुई है। वैश्विक महामारी 2021 तक करीब 9.6 करोड़ लोगों को अत्यधिक गरीबी की ओर धकेल देगी जिनमें से 4.7 करोड़ महिलाएं और लड़कियां होंगी। रिपोर्ट में बताया गया है कि महामारी से दुनिया भर में गरीबी की दर काफी बढ़ी है, लेकिन इसका सबसे अधिक असर महिलाओं और खासकर प्रजनन आयु वर्ग की महिलाओं पर हुआ है। एक अनुमान के मुताबिक साल 2021 तक, 25 से 34 साल आयु वर्ग में शामिल अत्यधिक गरीबी का सामना करने वाले हर 100 पुरुषों की तुलना में 118 महिलाएं गरीबी का शिकार होंगी। यह अंतर  साल 2030 तक प्रति 100 पुरुष पर 121 महिलाओं का हो जाएगा। इसी वजह से दुनिया की एक बड़ी आबादी को गरीबी रेखा से ऊपर लाने के लिए दशकों में हुई प्रगति फिर से उसी अवस्था में आ पहुंची है।

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‘फॉर्म इनसाइट्स टू एक्शन : जेंडर इक्वॉलिटी इन दी वेक ऑफ कोविड-19’ शीर्षक वाली इस रिपोर्ट में  दिए गए आंकड़े बताते हैं कि कोविड-19 के कारण 9.6 करोड़ से ज्यादा लोग साल 2021 तक गरीबी रेखा के बिलकुल नीचे चले जाएंगे। इस तरह से कोविड-19 और उसके बाद के सामाजिक-आर्थिक हालातों के कारण दुनिया में गरीब लोगों की संख्या 43.50 करोड़ हो जाएगी।

वैश्विक महामारी 2021 तक करीब 9.6 करोड़ लोगों को अत्यधिक गरीबी की ओर धकेल देगी जिनमें से 4.7 करोड़ महिलाएं और लड़कियां होंगी।

बात अगर हम भारत की करें तो इस कठिन दौर में भारत में रोजगार खोने वालों की संख्या भी काफी अधिक है। ‘एशिया और प्रशांत क्षेत्र में कोविड-19 युवा रोजगार संकट से निपटना’ शीर्षक से आईएलओ-एडीबी द्वारा जारी की गई रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में 41 लाख युवाओं के रोज़गार जाने का अनुमान है। इनमें 7  प्रमुख क्षेत्रों में से निर्माण और कृषि क्षेत्र में लगे लोगों के रोज़गार गए हैं।” इसमें यह भी कहा गया है कि कोविड-19 महामारी के कारण युवाओं के लिए रोज़गार की संभावनाओं को भी बड़ा झटका लगा है। रिपोर्ट के मुताबिक महामारी के कारण 15 से 24 साल के युवा ज्यादा प्रभावित होंगे। इतना ही नहीं आर्थिक और सामाजिक लागत के हिसाब से यह जोखिम दीर्घकालिक और गंभीर है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में महामारी के दौरान कंपनी के स्तर पर दो तिहाई प्रशिक्षण पर असर पड़ा। वहीं तीन चौथाई  ‘इंटर्नशिप’ पूरी तरह से बाधित हुई हैं।

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रिपोर्ट में सरकारों से युवाओं के लिए रोज़गार पैदा करने, शिक्षा और प्रशिक्षण कार्यक्रमों को फिर से पटरी पर लाने और 66 करोड़ युवा आबादी के भविष्य को लेकर तुरंत बड़े पैमाने पर कदम उठाने के लिए कहा गया है। कोविड-19 से पहले भी एशिया और प्रशांत क्षेत्र में युवाओं के सामने रोज़गार को लेकर बड़ी चुनौतियां मौजूद थी। इसी कारण बेरोज़गारी दर भी ऊंची थी और बड़ी संख्या में युवा स्कूल और काम दोनों से बाहर थे। साल 2019 में क्षेत्रीय युवा बेरोजगारी दर 13.8 प्रतिशत थी। वहीं 25 साल और उससे अधिक उम्र के वयस्कों में  यह 3 प्रतिशत थी। वहीं, बिजसनस स्टैंडर्ड में छपी एक रिपोर्ट बताती है कि सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी (CMIE) के मुताबिक लॉकडाउन के दौरान यानी अप्रैल से लेकर अब तक 2 करोड़ से अधिक वेतनभोगी लोगों की नौकरियां जा चुकी हैं।

इस बार अर्थव्यवस्था पर संकट 2008 के संकट से कहीं ज्यादा घातक है। अगर इन्हें बचाने के लिए बड़े स्तर पर प्रयास नहीं किये गए तो अमीर और गरीब के बीच का फासला अप्रत्याशित रूप से बढ़ जाएगा। रिपोर्ट के हिसाब से तो वायरस से लड़ने का एक ही तरीका है, गरीब और अमीर देश मिलकर महामारी का सामना करें। गरीबी के संबंध में आई इस रिपोर्ट में महिलाओं की संख्या इसलिए ज्यादा है क्योंकि महिलाएं अक्सर असंगठित क्षेत्रों में काम करती हैं। खासकर कि विकाशसील देशों में काम कर रही महिलाओं का कार्यक्षेत्र असंगठित है, भारत के संदर्भ में बात करें तो नेशनल काउंसिल ऑफ अप्लाइड इकोनॉमी रिसर्च’ के अनुसार भारत में 97 फीसद महिला मज़दूर असंगठित या अनौपचारिक क्षेत्र में काम करती हैं। इन महिलाओं के लिए ट्रेड यूनियन एक्ट (1926), न्यूनतम मज़दूरी क़ानून (1948), मातृत्व लाभ क़ानून (1961) और ऐसे कई क़ानून हैं, जो कहीं भी लागू नहीं होते क्योंकि मालिक मजदूरी का कहीं भी सबूत नहीं छोड़ते। वहीं, संगठित क्षेत्र में भी महिलाओं का प्रतिशत अभी काफी कम है और अब इस महामारी ने इन्हें भी ठप्प कर दिया है इसलिए ज़रूरी है कि रोज़गार के लिए सरकार द्वारा कड़े कदम उठाए जाएं।

लॉकडाउन में रह रही यह पीढ़ी आय के स्त्रोत ढूंढ रही है ऐसा कोई क्षेत्र अछूता नहीं जहां इस बीमारी ने अपना प्रकोप न दिखाया हो। वहीं, दुनियाभर में महिलाएं सामाजिक और आर्थिक समानता के लिए संघर्ष कर ही रहीं थी लेकिन इस महामारी और लॉकडाउन ने उनके इस संघर्ष को दोगुना कर दिया है। फिलहाल अब देखना ये होगा कि सभी देशों की सरकारें इस समस्या से निपटने के लिए किस तरह के समाधान निकालती है।

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तस्वीर साभार : wsj

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