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चिमामांडा एनगोज़ी अदीची एक नारीवादी नाइजीरियाई लेखक हैं जो लघु कथाएं, उपन्यास और नॉन-फिक्शन लिखती हैं। उनका जन्म 15 सितंबर 1977 को नाइजीरिया में हुआ था। ‘चिमामांडा’ शब्द का मतलब होता है भगवान मुझे असफल नहीं करेगा। समकालीन साहित्य में ये शब्द चिमामांडा एनगोज़ी अदीची की वजह से काफी प्रसिद्ध हुआ। टाइम्स लिटरेरी सप्लीमेंट चिमामांडा का वर्णन कुछ इस तरीके से करती है, ‘क्रिटिकली अक्लेम्ड युवा लेखकों की सूचि में सबसे आगे जो अफ्रीकी साहित्य के लिए पाठकों की एक नई पीढ़ी को आकर्षित करने में सफल हो रही हैं।’ चिमामांडा अब तक कई उपन्यास लिख चुकी हैं, जैसे कि पर्पल हिबिसकस (2003); हाफ ऑफ़ अ येलो सन (2006), द अमेरिकाना (2013), लघु कथा संग्रह- द थिंग अराउंड योर नैक (2009), वी शुड आल बी फेमिनिस्ट्स (2014), साथ ही उनकी किताब ‘ए फेमिनिस्ट मैनिफेस्टो इन फिफ्टीन सजेसशनस’ 2014 में प्रकाशित हुई थी।              

उनकी सबसे चर्चित किताब, ‘वी शुड आल बी फेमिनिस्ट्स’, एक व्यक्तिगत और वाकपटुता से पूर्ण निबंध जैसी है। इसमें चिमामांडा 21वीं सदी के लिए नारीवाद की एक अनूठी परिभाषा देती हैं। एक ऐसी परिभाषा जो समावेश और जागरूकता पर आधारित है। यह किताब उनके जीवन के व्यक्तिगत अनुभवों और यौन राजनीति की वास्तविकताओं पर आधारित है। इस किताब में वह स्पष्ट रूप से समझाती हैं कि आज औरत होने का क्या मतलब होता है। इसी के साथ- साथ यह किताब इस बात पर भी ज़ोर देती है कि क्यों हम सबको नारीवादी क्यों होना चाहिए। 2014 में प्रकाशित यह किताब बेहद चर्चित और न्यूयॉर्क टाइम्स की बेस्ट सेलर किताबों की सूची में शामिल है।

वी शुड आल बी फेमिनिस्ट्स को पढ़े और समझे बगैर हम चिमामांडा को पूर्ण रूप से नहीं समझ सकते। यह किताब ‘नारीवाद’ को आसान शब्दों में समझने के लिए आज के दौर में एक बहुत ही महत्वपूर्ण किताब है। इस किताब में चिमामांडा अपने लैंगिक भेदभाव के अनुभव साझा करती हैं। इस किताब में वे जो भी मुद्दे उठाती हैं, वे ऐसे मुद्दे है जिनसे हर कोई खुद को जुड़ा हुई महसूस कर सकता है। वे कई मुद्दों पर बात करती हैं, जैसे कि नारीवाद और नारीवादियों को लेकर हमारी रूढ़िवादी मानसिकता, सामान्यीकरण की प्रक्रिया, इनविजिबलाइजेशन, वेतन में लैंगिक आधार पर असमानता, लड़कियों और लड़कों को अलग-अलग तरीके से बड़ा करना, संस्कृति और लैंगिक भेदभाव। उनमें से कुछ मुद्दों की चर्चा हम इस लेख में भी करेंगे। 

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वे कहती हैं कि जिस तरीके से हम लड़कों को बड़ा करते हैं उस तरीके से हम उनकी इंसानियत को खत्म कर देते हैं। जिस तरीके से लड़कों की परवरिश की जाती है, उससे हम उनका बहुत नुकसान करते हैं। हम ‘मर्दानगी’ को बहुत ही संकुचित तरीके से परिभाषित करते है। मर्दानगी एक बहुत ही मुश्किल और छोटी जेल है और हम लड़कों को उस जेल में बंद कर देते हैं। हम लड़कों को डर से, कमजोरी से, वल्नरेबिलिटी से दूर भागना सिखाते हैं। हम लड़कों को एक मुखौटे में रखना सिखाते हैं जो उन्हें मजबूर करता है अपना वास्तविक रूप छिपाने के लिए। वे ये मुखौटा पहकर इसलिए घूमते हैं ताकि दुनिया के सामने ‘मजबूत मर्द’ लग सके। 

चिमामांडा यह भी कहती हैं कि जब भी विद्यार्थी वर्ग वाले लड़का और लड़की बाहर घूमने जाते हैं, उस उम्र में दोनों के पास कम ही जेब खर्च होता है, लेकिन बावजूद इसके लड़के से ही ये उम्मीद की जाती है कि वही बिल का भुगतान करेगा (क्योंकि उसी से उस की मर्दानगी साबित होगी)। क्या हो अगर लड़कों और लड़कियों दोनों को ही बचपन से यह सिखाया जाए कि मर्दानगी और पैसे का कोई संबंध नहीं है? बेशक, हिस्टोरिकल एडवांटेज की वजह से ज्यादातर पुरुषों के पास ही ज्यादा पैसा होगा। लेकिन अगर आज हम हमारे बच्चों को इस अलग प्रकार की सोच के साथ बड़ा करेंगे तो फिर आज से पचास साल बाद या सौ साल बाद लड़कों को हमेशा बिल का भुगतान करके अपनी मर्दानगी साबित नहीं करनी पड़ेगी। 

 

चिमामांडा नारीवाद की यही परिभाषा है कि जो जैसा है उसे वैसे ही रहने देना चाहिए। किसी को भी मजबूर नहीं करना चाहिए एक निश्चित खांचे में ढलने के लिए।

लेकिन सब से बुरा जो हम लड़कों के साथ करते है वो है- उन्हें ये महसूस करवाना की उन्हें ‘रफ़ और टफ’ होना जरूरी है। ऐसा करने पर हम उन्हें बहुत ही छोटे से अहंकार के साथ छोड़ देते है। जितना ज्यादा हम मज़बूर करते है एक पुरुष को कठोर होने के लिए, उतना ही छोटा-सा उसका अहंकार होता जाता है। और ऐसा करके हम लड़कियों के साथ बहुत ही बुरा करते हैं क्योंकि फिर हम उन्हें इस तरीके से बड़ा करते है कि वे लड़कों के उस नाजुक अहंकार की जरूरतों को पूरा करें। इसीलिए हम लड़कियों को पीछे हटना सिखाते हैं, छोटा होना सिखाते हैं। हम उन्हें ये कहते हैं कि महत्वाकांक्षी बनो, लेकिन बहुत ज्यादा नहीं, सफल होने का ख्वाब देखो, लेकिन बहुत ज्यादा सफल होने का नहीं क्योंकि अगर बहुत ज्यादा सफल हो गई तो पुरुषों को डर लगेगा। अगर परिवार के लिए पैसा तुम कमा रही हो तो ऐसे व्यवहार करो जैसे कि तुम नहीं कमा रही हो, ख़ास तौर पर पब्लिक में कभी ये सब मत बताओ क्योंकि ऐसा करने से तुम उसकी मर्दानगी पर चोट पंहुचा दोगी। इसीलिए वे कहती है कि ऐसे कठोर जेंडर रोल्स और अपेक्षाओं में बदलाव लाने की सख्त ज़रूरत है। 

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इस किताब में वे अपने पढ़ाने के अनुभवों को भी साझा करती हैं। वह ये कहती हैं की जब मैंने पहली बार ग्रेजुएट स्कूल में राइटिंग क्लास में पढ़ाया था तब मैं बेहद ही चिंतित थी। मैं टीचिंग मटेरियल को लेकर नहीं चिंतित नहीं थी क्योंकि मैं अच्छी तरह से तैयार थी और मैं वो पढ़ाने वाली थी जो मुझे पसंद था। बावजूद इसके मुझे यह चिंता थी कि मैं क्या पहनूं। यह चिंता मुझे इसलिए थी क्योंकि मैं यह चाहती थी कि मुझे गंभीरता से लिया जाए। मैं यह जानती थी कि मुझे खुद को साबित करने में बहुत मेहनत करनी पड़ेगी क्योंकि मैं एक महिला हूं। मुझे यह डर था कि अगर मैं ज्यादा महिलाओं जैसी लगी तो शायद मुझे गंभीरता से नहीं लिया जाएगा। मैं सच में अपना शाइनी लिप ग्लॉस लगाना चाहती थी, स्कर्ट पहनना चाहती थी, लेकिन मैंने इनमें से कुछ भी नहीं किया। बजाय इसके मैंने पुरुषों जैसे कपड़े पहने। दुखद सच तो यह है कि जब भी पहनावे की बात आती है तो हम पुरुषों के कपड़ों को ही स्टैण्डर्ड मानते हैं। हम में से अधिकांश को यही लगता है कि जो लड़की जितनी कम महिला जैसा लगेगी, उतना ही गंभीरता से उसे लिया जाएगा। जब कोई पुरुष बिज़नेस मीटिंग के लिए जाता है तो उसे यह नहीं सोचना पड़ता कि कहीं उसे उसके कपड़ों की वजह से उसे गंभीरता से लिया जाएगा या नहीं, लेकिन महिलाओं को यह सोचना पड़ता है।             

आगे वह यह कहती हैं कि काश मैंने उस दिन पुरुषों जैसे कपड़े नहीं पहने होते। काश, मैं उस दिन हिम्मत कर पाती जैसी मैं हूं वैसे ही क्लास में जाने की। अगर उस दिन मैं ऐसा करती तो इसका सबसे ज्यादा फायदा मेरे विद्यार्थियों को होता। लेकिन उस घटना के बाद अब मुझे अपने स्रीत्व को छुपाने की कोई इच्छा नहीं होती। अब मैं अपने स्रीत्व की इज्जत करती हूं। ख़ुशी से उसे दुनिया के सामने आने देती हूँं। मुझे हाई हील पहनना, लिपस्टिक लगाना पसंद है और मैं ये सब लगाती हूं। मैं कई बार ऐसे कपड़े पहनती हूं जो पुरुषों को पसंद नहीं आते या समझ नहीं आते। लेकिन मैं फिर भी उन्हें पहनती हूं क्योंकि उन्हें पहनना मुझे पसंद है और मुझे उनको पहनना अच्छा लगता है। मेरे कपड़ों पर आदमियों की टकटकी काफी इन्सिडेंटल है।     

ऐसा ही कुछ वह हर पुरुष और महिला को सलाह देती है। चिमामांडा नारीवाद की यही परिभाषा है कि जो जैसा है उसे वैसे ही रहने देना चाहिए। किसी को भी मजबूर नहीं करना चाहिए एक निश्चित खांचे में ढलने के लिए। वह हमें प्रोत्साहित करती हैं एक ऐसी न्यायसंगत दुनिया बनाने कि जिसमें औरत और पुरुष दोनों ही खुश है क्योंकि वे अपने वास्तविक रूप के साथ जीते हैं। चिमामांडा कहती है कि ऐसा तभी मुमकिन हो पाएगा जब हम सिर्फ लड़कियों की ही नहीं बल्कि लड़कों की परवरिश भी अलग ढंग से करेंगे। चिमामांडा की इन्हीं सब शिक्षाओं की वजह से उन्हें जानना बेहद जरूरी है। 

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तस्वीर साभार : Brittle Paper

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