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बिहार के पीरो में रहने वाली सोनम की उम्र सिर्फ़ 18 साल है। इस 18 साल की छोटी सी उम्र में किशोरियां बारहवीं की परीक्षा देती हैं, या स्कूल से निकलकर कॉलेज जाने की तैयारियों में जुट जाती हैं। लेकिन इस छोटी सी उम्र में सोनम 2 बच्चों की मां बन चुकी है। उसके ये दोनों बच्चे सिर्फ़ 1 साल के अंतराल पर ही पैदा हुए हैं। नतीजतन सोनम आज एनीमिया से पीड़ित होने के साथ-साथ शारीरिक रूप से बेहद कमज़ोर हो गई है। यह कहानी सिर्फ बिहार की सोनम की नहीं है। हमारे देश में आज भी छोटी उम्र में शादी होने के कारण बड़ी संख्या में लड़कियां कई तरह की यौन और प्रजनन स्वास्थ्य से संबंधित परेशानियों का सामना कर रही हैं। ऐसे कई सर्वे और रिपोर्ट्स मौजूद हैं जो ये बताते हैं कि हमारे देश में लड़कियों की जल्दी शादी होने के कारण उनके यौन और प्रजनन स्वास्थ्य पर कितना नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। हाल ही में एक गैर सरकारी संगठन पॉपुलेशन काउंसिल ने ‘उदया’ नामक एक अध्ययन किया है। यह अध्ययन बताता है कि किशोरावस्था में शादी होने के कारण लड़कियों का यौन और प्रजनन स्वास्थ्य बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। यह अध्ययन साल 2015-16 और साल 2018-19 के बीच उत्तर प्रदेश के लगभग 10 हज़ार किशोर और किशोरियों पर किया गया था।

क्या कहता है उदया अध्ययन

पॉपुलेशन काउंसिल के अध्ययन उदया के मुताबिक इस सर्वे में शामिल 18 साल से 22 साल की 50 फीसद लड़कियां अपनी पहली गर्भवास्था टालना चाहती थी यानी वे अपनी गर्भावस्था के समय से खुश नहीं थी। लेकिन उनके पास गर्भनिरोधक इस्तेमाल करनी की कोई सुविधा मौजूद नहीं थी। इसके साथ ही सर्वे में शामिल हर चार में से 1 किशोरी को गर्भसमापन का सामना करना पड़ा। अध्ययन यह भी कहता है कि सर्व में शामिल सिर्फ 10 फीसद शादीशुदा किशोरियों को जो अभी तक मां नहीं बनी थी, उन्हें गर्भनिरोधक क्या होते हैं इसके बारे में जानकारी थी। वहीं, 75 फीसद किशोरियों जिनकी उम्र 18 से 22 साल थी, उन्होंने अपने जीवन में कभी किसी तरह के गर्भनिरोधक का इस्तेमाल नहीं किया था। इसी उम्र की 50 फीसद से अधिक किशोरियां जो एक बच्चे की मां थी वे दूसरा बच्चा नहीं चाहती थी। यह अध्ययन यह भी बताता है कि हर 4 में एक गर्भवती लड़की/महिला के मामले में में गर्भपात, गर्भसमापन या बच्चे की मौत जैसी चीज़ें शामिल थी। अध्ययन के मुताबिक जन्म के बाद बच्चे की मौत और गर्भ में ही बच्चे की मौत उन लड़कियों के मामले में अधिक दिखी जिनकी शादी छोटी उम्र में ही कर दी गई थी।

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यूनिसेफ़ की एक रिपोर्ट कहती है कि आंकड़ों के मुताबिक भारत में हर साल 10 लाख से अधिक लड़कियों की शादी 18 साल की उम्र से पहले हो जाती है। भारत में उन देशों में शामिल है जहां सबसे ज़्यादा लड़कियों की शादी छोटी उम्र में ही कर दी जाती है। वहीं यूएनएफपीए के मुताबिक बाल विवाह के मामले में तमाम सुधार के बावजूद दक्षिण एशिया में होने वाले 50 फीसद बाल-विवाह भारत में होते हैं। हालांकि साल 2018 में भारत का योगदान 30 फीसद था लेकिन फिर भी यह बेहद अधिक था।

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क्या शादी की उम्र बढ़ाना है समस्या का निदान

हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह एलान किया था कि सरकार लड़कियों की शादी की उम्र 18 साल से बढ़ाकर 21 साल करने का विचार कर रही है। हालांकि, विशेषज्ञ और अध्ययन बताते हैं कि महज़ शादी की उम्र बढ़ाकर 18 साल से 21 साल कर देने से इस मामले में भारत की स्थिति में कुछ ख़ास बदलाव नहीं आएंगे। ऐसा इसलिए है क्योंकि लड़कियों की जल्दी शादी होने के पीछे उनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति, शिक्षा, रोज़गार के अवसर और स्वास्थ्य सुविधाओं तक उनकी पहुंच जैसे कारण बेहद मायने रखते हैं। भारत में होने वाले बाल-विवाह के आंकडे बताते हैं कि जिन लड़कियों की शादी 18 साल से कम उम्र में हो जाती है उनमें से 46 फीसद लड़कियां निम्न आय वर्ग से संबंध रखती है।

वहीं, NFHS-4 के आंकड़े कहते हैं कि साल 1992-93 के दौरान 54.2 फीसद लड़कियों की शादी 18 साल से पहले कर दी गई। वहीं, साल 1998-99 में 50, साल 2004-046 में 47.4 और साल 2015-16 में 26.8 फीसद लड़कियों की शादी 18 साल से पहले कर दी गई। जिन लड़कियों की शादी 18 साल से पहले हुई उनमें अधिकतर गरीब घरों की लड़कियां थी। गरीब घरों से आने के कारण ज़ाहिर तौर पर इनके पास रोज़गार, स्वास्थ्य, शिक्षा के सीमित अवसर मौजूद थे। ये सारे कारण मिलकर नींव तैयार करते हैं जल्दी शादी की। और जल्दी शादी यानी इन लड़कियों के यौन और प्रजनन स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव। ऐसे में सिर्फ शादी की उम्र बढ़ाना ही इस समस्या का निदान नहीं हो सकता।

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इंडियन एक्सप्रेस को दिए गए अपने बयान में कंसंर्ड फॉर वर्किंग चिल्ड्रेन (CWC) की निदेशक कविता रत्ना कहती हैं कि बीते कुछ सालों में अधिक से अधिक कानून बनाने के लिए कदम उठाए गए हैं। ऐसे में उच्च शिक्षा और रोज़गार के अवसर लड़कियों को उपलब्ध कराए बिना शादी की उम्र बढ़ाकर 21 साल कर देने से से बदलाव आने की उम्मीद कम है।

उदया अध्ययन भी लड़कियों को शिक्षा के अवसर उपलब्ध करवाने को समस्या के एक निदान के रूप में देखता है। उदया अध्ययन के मुताबिक जो औरतें पढ़-लिख सकती हैं उनके बच्चों की संख्या कम पाई गई। साथ ही उनमें गर्भनिरोधकों के विषय पर अधिक जानकारी देखी गई। साथ ही साथ अध्ययन यह भी कहता है कि स्कूलों में मिलने वाली बेहतर शिक्षा लड़कियों और महिलाओं की जानकारी यौन और प्रजनन स्वास्थ्य के मुद्दे पर बढ़ाने में बेहद सहायक होता है। साथ ही साथ स्कूलों में लड़कियों को स्कूलों में किशोरावस्था, गर्भनिरोधक, गर्भावस्था, जल्दी शादी के नुकसान आदि विषयों पर भी जानकारी देना ज़रूरी होता है।

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तस्वीर साभार: girls not brides

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