FII is now on Telegram
6 mins read

एसआरएम पॉडकास्ट को ऑडियो सामग्री की बढ़ती मांग को देखकर शुरू किया गया है। उनके पास पॉडकास्ट की एक विस्तृत श्रृंखला है। उनमें से एक है पेरेंटिंग के लिए- पी फॉर पैरेंटिंग। तीसरे एपिसोड में अनुभा और अंजलि ने ब्रेस्टफीडिंग और फार्मूला फीड के मुद्दे पर चर्चा की है। ब्रेस्टफीडिंग का मतलब होता है बच्चे को को मां के स्तनों से दूध पिलाना। फार्मूला-फीडिंग का मतलब होता है एक बाज़ार में मिलने वाला फार्मूला वाला दूध बच्चे को पिलाना। ये दूध अक्सर बोतल में डालकर बच्चे को पिलाया जाता है, इसलिए इसे बॉटल फीडिंग भी कहते हैं। पॉडकास्ट की शुरुआत अनुभा इस सवाल से करती है, “अंजली, तुमने आरोही के लिए क्या चुना था (आरोही अंजली की बेटी है)? ब्रेस्ट फीडिंग या फार्मूला फीडिंग? इस सवाल के जवाब में अंजली कहती हैं कि यह सबसे मुश्किल फैसला था। आरोही को बोतल से दूध पीना पसंद नहीं था और इसीलिए उसने बोतल से कभी दूध नहीं पीया, बावजूद इसके कि अंजली ने बहुत कोशिश की।  

इसके बाद अनुभा अपना अनुभव बताती हैं। उनके दो बच्चे हैं (सारा और ध्रुव) और दोनों ही बार उसके अनुभव अलग-अलग रहे। लगबघ डेढ़ साल उन्होंने सारा को ब्रेस्ट फीडिंग ही करवाई थी। तब तक अनुभा फिर से गर्भवती हो चुकी थी, इसलिए उन्हें ब्रेस्ट फीडिंग बंद करनी पड़ी। डॉक्टर्स के अनुसार, ऐसे में शरीर में काफी हार्मोनल परिवर्तन आते है, इसलिए ऐसे दूध को बच्ची को पिलाना ठीक नहीं होता, इसका बच्चे के स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इसके बाद, अनुभा ने उसे बोतल से दूध पिलाना शुरू किया। लेकिन सारा को वह पसंद नहीं आया, इसलिए आखिर में अनुभा ने उससे गिलास से ही दूध पिलाना शुरू कर दिया। जब अनुभा का दूसरा बच्चा ध्रुव हुआ था, तब उनका एक ऑपरेशन हुआ था, इसीलिए डिलीवरी के बाद भी वह अस्पताल में भर्ती ही थी। उनका दूध बच्चे को पिलाने लायक नहीं था। इसीलिए शुरुआती हफ्ते में ध्रुव को बोतल का ही दूध पिलाया गया। उसके बाद भी अनुभा की तबीयत ठीक नहीं थी, इसलिए अगले ड़ेढ़ महीने भी ध्रुव ने बोतल से ही दूध पिया। इसके बाद अनुभा को ध्रुव को ब्रेस्ट फीडिंग करवाने में काफी शिद्दत करनी पड़ी।   

और पढ़ें : पॉडकास्ट : पी फॉर पैरेंटिंग में जानें कैसे रखें कोविड के दौरान बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य का ख्याल   

अनुभा के ब्रेस्ट फीडिंग में शिफ्ट करवाने के संघर्ष को सुनकर अंजली कहती हैं कि बोतल से दूध पिलाने के कई फायदे होते हैं। इसलिए अंजली ने आरोही को बोतल से दूध पिलाने की बहुत कोशिश की, लेकिन वह नहीं मानी। वह बोतल से पानी पीने को तैयार थी, लेकिन दूध नहीं। अंजली अपना एक अनुभव बताती हैं कि जब वह आरोही के साथ अकेली फ्लाइट में सफर कर रही थी। लगभग दो घंटे के सफर में आरोही ने ब्रेस्ट फीडिंग ही किया जो अंजली के लिए बहुत ही थकानेवाला अनुभव था। इसीलिए उन्हें लगता है कि अगर बच्चे को बोतल से दूध पीने की आदत हो तो सफर करना आसान हो जाता है। इस कारण अंजली कहती हैं कि ब्रेस्ट फीडिंग और बोतल फीड दोनों के ही फायदे और नुकसान हैं। 

   

ये फैसला मां को लेना चाहिए, चाहे वह ब्रेस्ट फीडिंग का हो या बोतल से दूध पिलाना हो। दो विकल्पों में से किसी के लिए दबाव नहीं डाला जाना चाहिए।

यह सुनकर अनुभा ब्रेस्ट फीडिंग के फायदे बताती हैं। ब्रेस्ट मिल्क में एंटीबॉडी होते हैं यानी इसमें कीटाणु से लड़ने वाले कारक होते हैं। यह बच्चों को दस्त और कब्ज से लड़ने में मदद करता है। वह उन अध्ययनों का भी हवाला देती हैं जिनमें उन बच्चों में अचानक मृत्यु सिंड्रोम के प्रमाण मिले हैं, जिन्हें स्तन का दूध नहीं मिलता है। यह सुनकर, अंजली कहती हैं कि बोतल से फीड करवाना कामकाजी महिलाओं के लिए मददगार साबित होता है। आरोही के समय अंजली ने अपने करियर से ब्रेक ले लिया था। लेकिन हर महिला के पास यह सुविधा नहीं होती। वे बच्चा होने के बाद भी काम से छुट्टी नहीं ले सकती। बोतल से फीड करवाना ऐसी महिलाओं को बहुत मदद करता है। वह कहती है कि असल में तो बॉटल से फीड और ब्रेस्ट फीडिंग इन दोनों का मेल परफेक्ट कॉम्बिनेशन होता है। अगर बच्चा सिर्फ ब्रेस्ट फीडिंग पर ही निर्भर करता है तो वह केवल मां पर ही निर्भर हो जाता है। जैसा कि आरोही के साथ के हुआ था, दो सालों तक वह सिर्फ मम्मी पर ही चिपकी रहती थी।    

वहीं अनुभा कहती हैं कि ब्रेस्ट फीडिंग एक परफेक्ट फीड है क्योंकि इसमें लैक्टोज, प्रोटीन, विटामिन डी होता है, ये सभी बच्चे के लिए बहुत मददगार होते हैं। इस पर अंजलि कहती हैं कि जब आप बॉटल फीडिंग करते हैं तो आप स्पष्ट होते हैं कि बच्चे ने कितना दूध पिया है, लेकिन आप इस बात का अंदाजा ब्रेस्ट फीडिंग में नहीं लगा सकते हैं। यह सुनकर अनुभा कहती हैं कि ब्रेस्ट फीडिंग फ्री है। अगर मां अच्छी मात्रा में खाना खाती है, तो इससे बच्चे को लाभ होता है क्योंकि उसे उन सभी किस्मों का स्वाद मिलता है। वह इस दावे को पुष्ट करने के लिए एक वैज्ञानिक अध्ययन का हवाला देती हैं कि स्तनपान बच्चों को आसानी से ठोस भोजन अपनाने में मदद करता है।

और पढ़ें : बच्चों के लिए रचने होंगें नये खेल और कहानी, लैंगिक समानता के वास्ते

यह सुनकर अंजलि कहती हैं कि स्तनपान का सबसे कठिन दौर होता है जब बच्चे के मुंह में दांत आते हैं। ऐसा लगता है कि जैसे कोई शार्क आपके स्तनों को चूस रहा है। दूध पीने के दौरान कितनी बार बच्चा मां के स्तनों को काटता है जो बहुत ही पीड़ादायक होता है। इसके जवाब में अनुभा कहती है कि चूंकि स्तनपान में शरीर से शरीर का स्पर्श होता है, यह मां और बच्चे को शारीरिक और भावनात्मक स्तर पर भी जोड़ता है। इससे मां की अतिरिक्त कैलोरी भी बर्न होती है। लेकिन कई बार इससे मां का बहुत वजन भी बढ़ जाता है। प्रसव के बाद यदि मां की स्थिति ठीक नहीं है तो यह एक चुनौती बन जाती है कि बच्चे को क्या दिया जाना चाहिए। यह सुनकर अंजलि ने अपने एक रिश्तेदार का अनुभव साझा किया। उनकी बेटी विशेष रूप से स्तनपान पर निर्भर थी। फिर, अचानक मां को अस्पताल में भर्ती कराया गया और बेटी पूरी रात रोती रही क्योंकि उसे भूख लगी थी क्योंकि उसे मां का दूध नहीं मिला था। इसलिए, वह बताती हैं कि स्तनपान और बोतल से दूध पिलाना दोनों का संयोजन अच्छा है। यह आपातस्थिति में बहुत मदद करता है।

अंजलि कहती हैं कि यह संयोजन माता-पिता के लिए मददगार होता है। वे रात को अच्छी नींद ले सकते हैं और आसानी से सफर कर सकते हैं। अनुभा भी इस बात से सहमत हैं। वह कहती है कि बॉटल-फीड आपको यह पता लगाने में मदद करता है कि बच्चे ने कितना दूध पिया था। ब्रेस्ट फीडिंग के मामले में यह संभव नहीं है। कुछ समय बीतने के बाद बच्चा फिर से दूध के लिए कहता ह यह पूरे दिन के लिए सिरदर्द है। इसके लिए, अंजलि बताती है कि 6 महीने के बाद बच्चा ठोस खाद्य पदार्थ खाने के लिए तैयार है और इसलिए भूख बढ़ जाती है। जब आरोही छह महीने की हो गई थी, तो अंजलि उसे लगभग दिन भर ही स्तनपान करवाती थी। अनुभा कहती हैं कि बाजार से हमेशा फॉर्मूला दूध खरीदें, इसे अपने आप पकाने की कोशिश न करें। अंजलि भी उनका यह कहते हुए समर्थन करती हैं कि उनके बच्चों के शरीर के साथ प्रयोग करना सही नहीं है।

अनुभा कहती हैं कि बॉटल फीड एक पिता भी करवा सकता है। यह पिता और बच्चे के बीच एक अच्छा बंधन बनाने में मदद करता है। इसीलिए, वह अक्सर महसूस करती हैं कि ध्रुव उसके पति के ज्यादा करीब है। अंजलि का कहना है कि उसके कई दोस्तों के स्तनों में पर्याप्त दूध नहीं है और इसलिए, वे अपने बच्चों को स्तनपान कराने में असमर्थ हैं। अनुभा कहती हैं कि जब एक मां अपने बच्चे को स्तनपान नहीं करा पाती है, तो यह उसके अंदर बहुत अधिक अपराध बध पैदा करता है खासकर जब वह दूसरी मांओं को अपने बच्चों को स्तनपान कराते देखती हैं। कई बार, वह यह भी महसूस करती है कि वह अपने बच्चे को कुछ जरूरी चीज़ों से वंचित कर रही हैं। अंजलि ने अपने दोस्त का उदाहरण साझा किया जो अपने बच्चे को स्तनपान कराने में सक्षम नहीं थी और फिर उसके परिवार ने उसे कई बार दोषी महसूस कराया। लेकिन अंजलि का कहना है कि यह गलत है। अगर मां किसी भी कारण से अपनी मर्ज़ी से बोटल फीड का चयन कर रही है, तो उसके परिवार को उसका सम्मान करना चाहिए। स्तनपान के लिए उस पर दबाव नहीं डाला जाना चाहिए। उसे अपने लिए और अपने बच्चे के लिए चुनने का विकल्प दिया जाना चाहिए।

और पढ़ें : औरत के शरीर को रहस्य न बनाएं

अनुभा कहती हैं कि स्तनपान और बॉटल फीड का संयोजन अच्छा है। लेकिन बोतल से फीड करवाने की अपनी चुनौतियां हैं। जैसे- माओं के एंटीबॉडी बच्चे को नहीं मिलते जैसा कि स्तनपान के मामले में होता है। बॉटल-फीड के लिए भी बहुत सारी योजना और संगठन की आवश्यकता होती है। आपको यह सुनिश्चित करना होगा कि पर्याप्त बोतलें हर समय उपलब्ध हों, फिर इसे उबालें, फ्रीज़ करें, आदि कई बार। कामकाजी मां के लिए यह बहुत बोझिल हो सकता है। यह सुनकर अंजलि कहती है कि कामकाजी महिलाएं अपना दूध बाहर निकाल सकती हैं यानी पंप कर सकती हैं, बोतल में डाल सकती हैं, इसे फ्रीज कर सकती हैं और जब भी जरूरत हो इसका इस्तेमाल कर सकती हैं। यह दोनों उद्देश्यों को पूरा करेगा- बच्चे को बोतल से दूध पीने की आदत हो जाएगी और स्तन का दूध भी मिल जाएगी। अंत में, दोनों ने यह निष्कर्ष निकाला कि ये फैसला मां को लेना चाहिए, चाहे वह स्तनपान या बोतल से दूध पिलाना हो। कोई भी मां अपने बच्चे को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहती। इसलिए, उसे दो विकल्पों में से किसी के लिए दबाव नहीं डाला जाना चाहिए। और अगर फिर भी कोई संदेह हो तो डॉक्टर से परामर्श करें, वह सबसे अच्छी सलाह देगी।

और पढ़ें: घरों में होने वाली हिंसा का बच्चों पर क्या प्रभाव पड़ता है?


तस्वीर साभार : Scroll

Support us

Leave a Reply