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अक्सर बड़े ही गर्व से यह बताया जाता है कि कैसे औरतें बड़े ही प्रभावशाली तरीके से घर और ऑफिस, दोनों को संभाल लेती हैं। लेकिन सवाल यह है कि इसमें गर्व करने लायक कौन सी बात है? गर्व से ज्यादा यह शर्म की बात है कि एक थकी-हारी कामकाजी महिला पर घर के काम सिर्फ इसलिए थोप दिए जाते हैं क्योंकि वह एक महिला है। ऐसा करना कहां तक उचित है? क्या घर के बाकी सदस्य अपना काम करने में सक्षम नहीं है? सक्षम होने के बावजूद, हमारे ही घरों में बैठे लोग दुनिया में बराबरी लाने की बातें करते हैं, लेकिन जब खुद के घर के काम के बराबर बंटवारे की बात आती है तो मुंह छिपाते नज़र आते हैं। बार-बार यह तर्क दिया जाता है कि पुरुषों पर घर की सारी आर्थिक जिम्मेदारियां होती हैं, इसीलिए घर के काम में उनसे बराबरी की उम्मीद नहीं की जा सकती। औरतों से यहां तक कह दिया जाता है कि जिस दिन तुम सारी आर्थिक जिम्मेदारियों को उठा लोगी उस दिन बराबरी करना। 

इस प्रकार के तर्क देने वाले सभी लोगों के लिए कुछ सवाल हैं जिन पर मंथन करना बेहद ज़रूरी है। अगर रातों-रात आप किसी पुरुष से कहेंगे कि पूरा घर, परिवार, बच्चों और बूढ़ों की देखभाल करो, उन्हें संभालो तो क्या वह ऐसा कर पाएगा? बिल्कुल नहीं, क्योंकि हमारे घरों में लड़कों को बचपन से यह ट्रेनिंग ही नहीं दी जाती कि घर के कामों में उन्हें भी बराबरी की भूमिका निभानी चाहिए। घर के काम का जेंडर से कोई लेना-देना नहीं होता। उसी तरीके से एक महिला से यह उम्मीद करना कि वह एक साथ पूरे परिवार की आर्थिक जिम्मेदारी उठा ले कहां तक ठीक है? बचपन से लेकर अब तक हुए भेदभाव की वजह से ही वह लड़की/ महिला आज सारी आर्थिक जिम्मेदारी को उठाने में सक्षम नहीं हैं? बचपन से लेकर आज तक, जब आपने आपने सिर्फ आपने बेटे को दुकान पर बैठने दिया, सिर्फ उसे ही घर से बाहर निकलने दिया, सिर्फ उसे ही दूसरे शहर जाकर पढ़ने दिया, सिर्फ उसे ही आपने दोस्तों के साथ घूमने निकलने दिया, और भी न जाने ऐसे कितने ही भेदभाव के किस्से हमारे घरों में मौजूद हैं। जब किसी को बचपन से बराबरी का अधिकार ही नहीं दिया गया तो अचानक उससे ऐसी उम्मीद क्यों की जाती है?

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घरों में होने वाले लैंगिक भेदभाव के कारण ही नारीवाद की शुरू ये यह मांग रही है कि हमारे घरों में हो बराबरी की शुरुआत, क्योंकि जब तक हमारे घरों में बराबरी नहीं आएगी, तब तक बाहरी दुनिया में पुरुषों और महिलाओं के बीच लैंगिक बराबरी की उम्मीद रखने का कोई मतलब ही नहीं है। लेकिन अफ़सोस की बात यह है कि पिछले कई सालों से हमारे देश की संसद ने, न्यायपालिका ने जो भी कदम उठाए हैं वे सभी बाहरी दुनिया में होने वाले भेदभाव को ही संबोधित करते हैं। हमारे घरों में होने वाले भेदभाव पर बात तक नहीं की जाती। ऐसा लगता है कि जैसे किसी अदृशय संविधान में यह लिखा हुआ है कि घर का काम तो सिर्फ औरत का ही है और अगर पुरुषों का उसमें कोई योगदान होगा तो वह योगदान सिर्फ ‘मदद’ तक ही सीमित होगा। घर के काम में पुरुषों से बराबरी की मांग करना मानो एक गलत मांग है। 

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बराबरी की यह मांग कोई गलत नहीं है लेकिन इस बराबरी को वास्तविकता में अमल लाने का मतलब है; पुरुषों को अपने विशेषाधिकार को छोड़ना होगा। कोई भी समुदाय अपने विशेषाधिकार को अपने आप नहीं छोड़ेगा न छोड़ना चाहेगा क्योंकि इसका मतलब होगा खुद अपनी जिम्मेदारियों को बढ़ाना। इसका मतलब होगा घर के काम को न करने की आजादी को छोड़ना। इसीलिए लगता है अपने-आप से हमारे घरों में कभी लैंगिक बराबरी नहीं आ पाएगी।  उसी के साथ यह मान लेना कि आर्थिक सशक्तिकरण से बराबरी आएगी तो हम सभी जानते है कि 8 मार्च को आज भी बड़ी शान से भाषणों में ये बताया जाता है कि कैसे महिलाएं घर और बाहर दोनों की  जिम्मेदारियां उठा रही हैं। इसीलिए यह सोचना एक बहुत बड़ी बेवकूफ़ी है कि आर्थिक रूप से स्वतंत्र औरत घर के कामों की गुलामी नहीं करती। अगर यकीन नहीं होता तो अपने आस-पास नजरें उठा कर देख लीजिए। वे सभी कानून जो औरत को आर्थिक रूप से सक्षम बनाने की कोशिश करते हैं जैसे कि मैटरनिटी बेनिफिट एक्ट, कार्यस्थल पर महिलाओं का लैंगिक उत्पीड़न अधिनियम, 2013; समान पारिश्रमिक अधिनियम, 1976 आदि, वे घरों में होने वाले भेदभाव को खत्म करने के लिए किसी भी रूप से सक्षम नहीं हैं। 

    

घरों में होने वाले लैंगिक भेदभाव के कारण आज के नारीवाद की मांग है हमारे घरों में हो बराबरी की शुरुआत, क्योंकि जब तक हमारे घरों में बराबरी नहीं आएगी, तब तक बाहरी दुनिया में पुरुषों और महिलाओं के बीच लैंगिक बराबरी की उम्मीद रखने का कोई मतलब ही नहीं है।

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इसीलिए शायद घर का काम और अनपेड केयर वर्क सिर्फ औरतों की जिम्मेदारी नहीं है इससे संबंधित भी एक कानून आना चाहिए। यही नहीं, बल्कि उस कानून में यह भी दिया जाए कि घर और देखभाल के काम का घर के सदस्यों के बीच बराबर बंटवारा होना चाहिए। आज इस प्रकार का कोई कानून विश्व के किसी देश में नहीं है। इस प्रकार का कानून उस रुढ़िवादी मानसिकता पर भी करारा प्रहार करेगी जो यह कहती है कि घर का काम सिर्फ औरत की ज़िम्मेदारी है। हमारी आने वाली पीढ़ियां जब घरों में बराबरी देखेंगी, तो बाहरी दुनिया में भी वे महिलाओं को पुरुष के बराबर ही मानेगी। उसके उलट, बिना इस प्रकार के कानून के बच्चे ये देखते हैं कि बाहरी दुनिया में तो बराबरी की बात की जाती है, लेकिन उनके खुद के घर में बराबरी के नाम पर एक छल किया जाता है। इसीलिए उन्हें यह लगता है कि बराबरी की सिर्फ ‘बातें’ की जाती हैं, लेकिन हकीकत में उसे लागू नहीं किया जाता। इसीलिए यह बेहद ज़रूरी है कि हमारी आज की और आने वाली पीढ़ियों के भरोसे को हम तोड़े नहीं बल्कि उन्हें बराबरी के संवैधानिक सिद्धांत में फिर से यकीन दिलाएं।     

घरों में होने वाली इस बराबरी की शुरुआत से हम हिंसक मर्दानगी पर भी एक करारा प्रहार करेंगे। अपने घरों में लैंगिक समानता को लागू किए बिना हम एक बराबर दुनिया नहीं बना सकते। यही नहीं, घर और बच्चों के काम में जब पुरुष बराबर जिम्मेदारियां उठाएंगे, तब हम उस भावना को बल दे पाएंगे पितृसत्ता ने खत्म कर दिया है। इस कानून के कितने फायदे होंगे उसे इस पूरे लेख में लिखना मुश्किल हैं। आज शायद आपको हंसी आ रही होगी ये सोच कर कि लेखिका कितनी अजीब मांग कर रही है। लेकिन एक वक़्त आएगा जब हमारी समाज का एक बहुत बड़ा तबका इसे सामान्य मांग समझेगा। लेकिन सबसे अहम सवाल यह है कि क्या आप उस भविष्य को आज देख पा रहे हैं और उसके लिए खुद को तैयार कर रहे हैं?  

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तस्वीर साभार : Book of Life 01

Sonali is a lawyer practicing in the High Court of Rajasthan at Jaipur. She loves thinking, reading, and writing.

She may be contacted at sonaliandkhatri@gmail.com.

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