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एडिटर्स नोट : यह लेख फेमिनिस्ट अप्रोच टू टेक्नॉलजी के प्रशिक्षण कार्यक्रम से जुड़ी लड़कियों द्वारा लिखे गए लेखों में से एक है। इन लेखों के ज़रिये बिहार और झारखंड के अलग-अलग इलाकों में रहने वाली लड़कियों ने कोविड-19 के दौरान अपने अनुभवों को दर्शाया है। फेमिनिज़म इन इंडिया और फेमिनिस्ट अप्रोच टू टेक्नॉलजी साथ मिलकर इन लेखों को आपसे सामने लेकर आए हैं अपने अभियान #LockdownKeKisse के तहत। इस अभियान के अंतर्गत यह लेख झारखंड के गिरीडीह ज़िले की नीलम ने लिखा है।

जिंदगी ऐसी अधूरी रह जाएगी कभी ऐसा सोचा न था। कितना अलग अनुभव था हमारी जिंदगी का जब गीता और हम एक दूसरे से मिले थे। हमारी शादी से पहले हम कितनी मस्ती किया करते थे। रात हो या दिन हम हमेशा खूब मस्ती करते थे। हमारे दादाजी हमारे पीछे पड़े रहते थे कि जब देखो दोनों बस हा-हा ही-ही करती रहती हैं। वह कहते थे कि हमारे इतना हंसने पर हमारे दांत बाहर निकल आएंगे। इस पर हम सब उनकी धोती खींचते हुए कहते थे, “क्या दादाजी आपके दांत झड़ गए हैं। आप तो अच्छे से हंस भी नहीं सकते और हम जब हंसते हैं तो आपको दिक्कत हो रही है।” मेरी पांच बहुत अच्छी दोस्त थी; गीता, अंजू, आशा, सुनीता और मैं यानि नीलम। हम जो भी करते एक साथ करते थे। एक दिन ऐसा हुआ कि हमारी टीचर ने हम सभी को एक कविता याद करने को कहा। हममें से किसी को वह कविता याद नहीं हो रही थी। हम सब कक्षा के बाहर निकाले गए और हमारे हाथों में दो-दो डंडे पड़े। फिर टीचर ने हमें कक्षा के अंदर बुला लिया। वह हमारी सबसे प्रिय शिक्षिका थीं। स्कूल में मैं हेड मॉनिटर थी और सबको खूब डराती थी। खासकर जब कोई अपना टास्क पूरा नहीं करके आता तो उसे धमकाती थी। उस समय सबके चेहरे का डर जो देखने को मिलता उससे मजा ही आ जाता था।

हमारे स्कूल का नाम मध्य विद्यालय चतरो था। मैं चतरो की ही रहने वाली थी। हमारा स्कूल घर से लगभग 3 किलोमीटर दूर था। मैं स्कूल साइकिल से जाया करती थी। हमारे स्कूल में आठवीं कक्षा तक ही पढ़ाई होती थी। हम सभी दोस्त आठवीं कक्षा में ही पढ़ रहे थे। जनवरी का समय था, हमारा साल खत्म हो रहा था। हम अक्सर स्कूल, से बाहर घूमने जाते थे। यही सारी बातें हम आपस में कर रहे थे। तभी सातवीं कक्षा की कुछ लड़कियां आईं और हमसे पूछा, “क्या दीदी हमलोग भी कहीं घूमने जा सकते हैं। हम लोगों बिना कुछ सोचे झट से हां कह दिया और कहा क्यों नहीं? ज़रूर जा सकते हैं। हमने इस बारे में हेड मास्टर सर से बात की। पूछा कि सर क्या हम सब स्कूल से कहीं बाहर घूमने जा सकते हैं। उस समय तो सर ने साफ मना कर दिया था कि हम कहीं नहीं जा सकते हैं। फिर सातवीं और आठवीं कक्षा के सारे लड़के और लड़कियां एक साथ अपनी प्रिय शिक्षिका से बात करने गए। उन्हें हमने मना ही लिया और उनसे हां करवा ही ली। वह कहते हैं न, ‘जहां चाह वहां राह।’

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सब स्कूल से पिकनिक मनाने के लिए मइथन गए और वहां जाने के बाद हम सभी को पता चला कि खाना भी साथ में मिलेगा। पहले सभी को कहा गया था कि अपने घर से खाना बनाकर लाना है। वहां पता चला कि हम सभी को खाना भी मिलेगा। हम खुश होकर बातें कर रहे थे कि उसी समय हमारी टीचर वहां आईं और हमसे पूछा, “कैसा लगा हमारा आइडिया” तब हम और हैरान हो गए। हमारे लिए वहां कचौरी और पनीर की सब्जी बनाई गई क्योंकि मैं और मेरी सहेली गीता दोनों शाकाहारी थे। पिकनिक में बाकी सबके लिए मांसाहारी चीजें बन रही थीं। उसमें हमारे लिए अलग से खाना पक रहा था और हमारी शिक्षिका को यह बात पता थी। हमारी प्रिय शिक्षिका ने कहा, “क्यों सब तुम ही लोगों को पता रहता है क्या? तुम्हारी क्या पसंद है क्या नहीं, यह हमें भी मालूम है। हम चकित थे कि कोई भी शिक्षिका इतना कैसे कर सकती है। सचमुच बड़ा मज़ा आया। हम लौटते वक्त बातें कर रहे थे कि यह पिकनिक हमारे लिए यादगार रहेगी। वह वक्त हम आज भी नहीं भूल पा रहे हैं, ना गीता भूल पाई है। गीता और मेरी शादी एक ही घर में हुई थई, इसलिए जब भी हमदोनों को समय मिलता हम अपनी पुरानी यादों को ताज़ा कर लिया करते थे। एकदिन इसी तरह हम बातें कर रहे थे कि उधर सास चिल्लाने लगी कि आज दोनों की बात खत्म हो जाए तो जरा चूल्हा चौका भी संभाल लिया करो। ठीक उसी समय गीता के भी पति आ गए और उससे खाना मांगने लगे। फिर हम क्या करते? हमदोनों अपने-अपने घर चले गए।

मेरे रंग की वजह से मेरे पति राकेश हमेशा मारपीट करते हैं। राकेश एक पारा शिक्षक थे फिर भी उनकी यह सोच थी। मुझे यह सोचकर घिन आती थी कि ये स्कूल में पढ़ाते क्या होंगे? बच्चों को क्या शिक्षा देते होंगे?

शादी के बाद हम दोनों की पढ़ाई छूट चुकी थी। बड़ी मुश्किल से मैं दसवीं कक्षा तक पढ़ाई कर पाई थी। मेरे घर में अम्मां थी। पिताजी के गुज़र जाने के बाद अम्मां अबरख के कारखाने में काम करके घर को चलाती थी। ज़िम्मेदारी से मुक्ति पाने के लिए उसने मेरी शादी कर दी। मैं घर में सबसे बड़ी बहन थी। मेरी अभी तीन छोटी बहन कुंवारी हैं और अम्मां के साथ रहती हैं। मेरे पास पढ़ने के लिए पैसे नहीं थे। मैं रोज सुबह उठकर गांव के किनारे के जंगल से सखुआ के दतुवन और उसके पत्ते चुनकर लाती थी। उनको बेचकर अपनी पढ़ाई करती थी। उस समय मैं अपनी जाति को ही कोसती थी कि शायद मेरी जाति में ही बुराई है पर बुराई मेरी जाति में नहीं थी, लोगों की सोच में थी। मैं हमेशा सकारात्मक सोच रखती थी। वही काम करके मेरी बहनें अपनी पढ़ाई कर रही हैं, और अपनी ज़रूरतों को पूरा करती हैं।

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मैं एक रविदास परिवार से हूं। लोग आज भी दलित समुदाय के लोगों के साथ भेदभाव करते हैं। उनसे घृणा करते हैं। दूसरे बिरादरी के लोग तो करते ही हैं, पर जब हमारी ही जाति के लोग बड़े और अमीर हो जाते हैं तो हम जैसे गरीब लोगों को पैरौं की जूती समझते हैं। मैं जब भी अपना दातुन बेचती और किसी के घर मे बेचते-बेचते चली जाती और पता चल जाता कि मेरी जाति क्या है तो वे हमारे पत्ते और दातुन नहीं खरीदते थे फिर मेरा सामान नहीं बिकता था। जब मेरी शादी हुई तो उस समय मुझे बहुत ताने सुनने को मिले क्योंकि मैं सांवली थी। मेरे रंग की वजह से मेरे पति राकेश हमेशा मारपीट करते हैं। राकेश एक पारा शिक्षक थे फिर भी उनकी यह सोच थी। मुझे यह सोचकर घिन आती थी कि ये स्कूल में पढ़ाते क्या होंगे? बच्चों को क्या शिक्षा देते होंगे? मेरी सास मुझे एक मिनट भी सुकून से बैठने नहीं देती थी। मेरे ससुराल में लंबा-चौड़ा परिवार था चाचा, चाची, उनके बच्चे और देवर। सबसे बड़े भाई मेरे पति ही थे और एक ननद थी। राकेश ही पूरे परिवार को संभालते थे क्योंकि उनके चाचाजी विकलांग थे। चचेरे भाई-बहनों की पढ़ाई का खर्च सब कुछ राकेश पर ही था। पारा शिक्षक का वेतन इतना कम होता है कि घर जैसे-तैसे चलता था!

राकेश के एक बहुत ही करीबी मित्र थे। हमारी शादी होने के बाद से वह घर आ रहे थे। एक दिन राकेश बोले कि आज तुम कुछ अच्छा खाना बना देना और तुम घर से बाहर मत निकलना। वह अपने मित्र का इंतजार करने लगे। वो आ गए और आते ही बोले कि कहां हैं मेरी भाभीजी। उनसे अभी तक मुलाक़ात नहीं हुई है। इस पर राकेश ने कहा कि आज वह घर पर नहीं है। यह सब सुनकर मैं बहुत दुखी हुई। मैं अपने सांवलेपन को कोसती हूं कि इसका क्या करें। यह सब देखकर मेरी ननद समझाती है कि एक दिन सब अच्छा हो जाएगा। जब कोरोना वायरस पूरे देश में भयानक तूफान की तरह फैल रहा था तब उस समय स्कूल बंद हो गए थे। उसी समय लॉकडाउन की भी घोषणा हुई ताकि लोग घर से बाहर ना जाएं। बहुत ज़रूरी सामान के लिए ही बाहर जाएं। तब राकेश भी 24 घंटे घर पर रहने लगे। हमारी दूरियां और ज्यादा बढ़ने लग गई थी। जब राकेश कमरे में होता तो मुझे बाहर निकाल दिया करता था और जब मैं बाहर में होती तभी वह भीतर जाता था।   

यह सब अब हमसे बर्दाश्त नहीं हो रहा था। पिछले 4 सालों से मैं सब बिना कुछ कहे बर्दाश्त कर रही थी और एक दिन मेरी सहनशक्ति जवाब दे गई। राकेश से मैंने अपने ऊपर हो रही हिंसा के बारे में बात की और बोली बस करो ये सब। चूंकि मैं पढ़ी-लिखी लड़की थी, समझदार भी थी, इसलिए मुझे लग रहा था कि लॉकडाउन में घर की परिस्थिति के कारण यह सब हो रहा है। मैं राकेश को हर बार मौका दे रही थी लेकिन वह एक ही बात को लेकर बार-बार गाली गलौज करता था। जब 4 साल के बाद भी वह मुझे समझ नहीं पाया तो मैं उसके साथ क्यों रहूं?  मैंने उसे छोड़ने का निर्णय ले लिया। अपने रंग और कद के कारण मैं इतना अत्याचार नहीं सह सकती थी। उसी दौरान मेरे ससुराल के घर के बगल में एक विवाहित लड़की के साथ वही हो रहा था जो मेरे साथ हो रहां था। और उसी समय मैंने निर्णय लिया कि मुझे अपनी आवाज उठानी चाहिए क्योंकि इसका शिकार बस हम ही नहीं हो रहे हैं। ऐसी बहुत सारी महिलाएं हैं जो इसका शिकार हो रही हैं और मैंने आवाज उठाई खुद के लिए और उसे भी कहा अपनी आवाज़ उठाने के लिए। बगलवाली औरत ने भी अपने लिए आवाज उठाई और हमदोनों इस लड़ाई में सफल भी हुए!  

जब मैं अपना ससुराल छोड़ रही थी उस समय राकेश को समझ में आ गया था कि उसने क्या गलती की है। उसने मुझसे माफी भी मांगी और मुझे जाने से रोका। वह बोला कि मुझे छोड़कर मत जाओ। मैंने भी उसे माफ कर दिया क्योंकि मैं इस रिश्ते को तोड़ना नहीं चाहती थी। आज हमदोनों खुश हैं। राकेश ने आगे पढ़ने के लिए कॉलेज में मेरा दाखिला भी करवा दिया है। अभी लॉकडाउन में हमदोनों अपने गांव में राशन और मास्क बांटने का काम कर रहे हैं। कोरोना वायरस के ऊपर जानकारी साथ में देते हैं और सबकी मदद कर रहे हैं। जो भी हमारे बीच दूरियां थीं अब वे खत्म हो गई हैं और हमदोनों अब खुशी खुशी साथ में रह रहे हैं। इन लम्हों का ही मुझे इंतज़ार था। अपनी खुशी मैं गीता से बांटना चाहती हूं।

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