मंदिर, मंडल और मार्केट के थ्री ‘एम’ से पैदा हुआ मीडिया आजकल ‘थ्री आर’ की यात्रा पर है – ‘राफ़ेल, राम मंदिर और रिया चक्रवर्ती।’ एंकर स्टूडियो ग्राफिक्स के सहारे राफ़ेल के कॉकपिट में बैठे नज़र आते हैं। देश में कोरोना के लगभग 17 लाख से अधिक मामले हो चुके हैं लेकिन, सभी धार्मिक आयोजनों की मनाही है पर अयोध्या में राम मंदिर के शिलान्यास पर हमारा मीडिया सवाल नहीं करता। राफ़ेल की जय-जयकार के बाद हमारे मीडिया ने अभिनेत्री रिया चक्रवर्ती के रूप में मीडिया ट्रायल का नया ‘शिकार’ चुन लिया है।
आज कल आप जिस टीवी चैनल की ओर रु़ख करेंगे वहां अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत पर मीडिया ट्रायल चलता देखेंगे। सुशांत के पिता ने सुशांत की मौत के मामले में एफआईआर दर्ज़ करवाई है जिसमें उन्होंने रिया चक्रवर्ती और उनके परिवार पर कई तरह के आरोप लगाए हैं। ये आरोप सच हैं या झूठ यह पता लगाना कानून की ज़िम्मेदारी है। रिया अपराधी हैं या नहीं यह तय करना भी कानून का काम है, मीडिया का नहीं। लेकिन कंटेट की कमी से जूझते हमारे मीडिया ने इस केस का मीडिया ट्रायल करने का फैसला किया। कोरोना, असम और बिहार की बाढ़, भुखमरी, बढ़ती अपराध की खबरें आखिर मीडिया दिखाए भी तो कैसे, इन खबरों से ‘देश में सब चंगा सी’ का तिलस्म टूटने का जो डर है।
‘रिया का काला जादू, सुशांत के पैसों पर रिया की अय्याशी, लव सेक्स और धोखा, सुशांत, रिया और 15 करोड़, क्या सुशांत को प्यार ने मारा,’ ऐसे न जाने कितने शो टीवी चैनलों ने धड़ा-धड़ बना डाले। सुशांत सिंह राजपूत की मौत से जुड़ी हर खबर ने समाज में बस एक ही संदेश पहुंचाया- ‘रिया चक्रवर्ती ही सुशांत की मौत की वजह हैं।’ मीडिया हर रोज़ रिया से जुड़े नए-नए एंगल निकालकर ला रहा है। उनके पुराने वीडियोज़ निकाले जा रहे हैं जिनका संदर्भ तब शायद कुछ और रहा होगा और उसे अब प्रसारित कर रिया को एक अपराधी साबित करने की पूरी कोशिश की जा रही है।
जिस तरीके से मीडिया सुशांत की मौत से जुड़ी काल्पनिक परतें उघाड़ने में लगा है उससे इस पितृसत्तात्मक समाज़, जहां महिलाओं के प्रति दुर्भावना और पूर्वाग्रह पहले से मजबूत रहे हैं, उसे सशक्त कर रहा है। सुशांत की मौत से जुड़े मीडिया ट्रायल ने सोशल मीडिया में पहले से ही रिया चक्रवर्ती के खिलाफ चल रहे ट्रायल को और मज़बूत किया है। वह मीडिया जो एक महीने पहले तक मनोचिकित्सकों का पैनल बनाकर संवेदना व्यक्त कर रहा था आज वही ‘गिद्धों’ की भांति किसी के जीवन को तहस-नहस करने पर तुला हुआ है। वह दर्शक वर्ग जो एक महीने पहले तक मानसिक स्वास्थ्य के प्रति संवेदना व्यक्त कर रहा था, सोशल मीडिया पर मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता फैला रहा था अब वह अब एक महिला को नोंच देना चाहता है। उस महिला की मौत की कामना कर रहा है, उसे सोशल मीडिया पर बलात्कार की धमकियां दी जा रही हैं। रिया चक्रवर्ती के खिलाफ़ अभी कोई सबूत नहीं मिले हैं। पुलिस जांच कर रही है। कुछ भी ठोस अब तक नहीं मिला है जिससे सुशांत की मौत में रिया की भूमिका का पता चल सके लेकिन इस केस के आधार पर महिलाओं के खिलाफ एक पूरी फौज खड़ी हो गई है।
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जिस तरीके से मीडिया में इस केस का ट्रायल चल रहा है उसके पीछे हमारी समाज की पितृसत्तात्मक सोच ही है। महिला विरोधी ग्राफिक्स, स्लग्स बनाने वाले, कॉपी लिखने वाले प्रोड्यूसर्स, चिल्ला-चिल्लाकर रिया को अपराधी साबित करने में लगे एंकर इसी पितृसत्तात्मक समाज का हिस्सा हैं। उदाहरण के तौर पर एक न्यूज़ प्रोग्राम का टाइटल कुछ इस तरह था- रिया चक्रवर्ती का काला जादू। रिया चक्रवर्ती बंगाली हैं और यह टाइटल समाज के कई पुर्वाग्रहों में से एक है जहां कहा जाता है- ‘बंगाली लड़कियां काला जादू जानती हैं।’
इस टाइटल और थमनेल को तैयार करने वाले प्रोड्यूसर के दिमाग में एक साथ न जाने कितने पूर्वाग्रह चल रहे होंगे। रिया की ऐसी तस्वीर खोजना जिसमें उनके हाथ एक खास मुद्रा में हो, फिर एक शीशे के गोले में सुशांत को कैद दिखाना। सिर्फ इस एक तस्वीर के ज़रिए भारत के करोड़ों दर्शक इस बात को अब तक मान चुके होंगे कि रिया ने ज़रूर सुशांत पर काला जादू किया होगा। उनका यह पूर्वाग्रह कि बंगाली लड़कियां जादू-टोना करती हैं पहले से कहीं अधिक मज़बूत हो गया होगा। वे अब इसे एक तथ्य मान चुके होंगे कि ‘बड़ी-बड़ी आंखों और लंबे बालों वाली बंगाली लड़कियां’ लड़कों को अपने वश में कर लेती हैं। समूचे बंगाली समुदाय को जादू-टोटकों का समाज घोषित कर दिया गया है। अवैज्ञानिक सोच को बढ़ावा दिया जा रहा है।
जहां पत्रकारिता से उम्मीद की जाती है प्रेम और मानवीय संबंधों के प्रति संवेदनशील होगा, वहां मुख्यधारा की पत्रकारिता ने प्रेम संबंधों को लव, सेक्स और धोखे के मुहावरों से लैस कर दिया है।
हज़ारों-करोड़ों घरों में एक गर्लफ्रेंड एक ब्यॉयफ्रेंड की मौत की दोषी साबित हो चुकी है। प्रेम संबंधों को रिया जैसी गर्लफ्रेंड का हवाला देकर कोसा जा रहा है, शक पैदा किया जा रहा है। करोड़ों दर्शकों के दिमाग में ये कूड़ा भरा जा रहा है कि रिया चक्रवर्ती सिर्फ सुशांत के पैसों पर ‘अय्याशी’ किया करती थी। दर्शक वर्ग 17 लाख कोरोना केसेज़ की वजह जानने से अधिक दिलचस्पी इसमें ले रहा है कि आखिर सुशांत के 15 करोड़ रुपये गए कहां। जहां पत्रकारिता से उम्मीद की जाती है प्रेम और मानवीय संबंधों के प्रति संवेदनशील होगा, वहां मुख्यधारा की पत्रकारिता ने प्रेम संबंधों को लव, सेक्स और धोखे के मुहावरों से लैस कर दिया है। मीडिया से उम्मीद की जाती है कि वह समाज के पूर्वाग्रहों को खत्म करे न कि उन्हें बढ़ावा दे।

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मीडिया में चल रहे ट्रायल के बीच रिया चक्रवर्ती ने एक वीडियो जारी कर कहा कि उन्हें इस देश के न्यायतंत्र पर पूरा भरोसा है। उनके इस बयान के बाद सुशांत सिंह राजपूत के परिवार की तरफ से नियुक्त किए गए वकील विकास सिंह का बयान आता है, “रिया ने जो वीडियो जारी किया है वह दिखावा अधिक है, मुझे नहीं लगता उन्होंने जो सलवार सूट वीडियो में पहन रखा है वह आज से पहले कभी पहना होगा। उन्होंने यह वीडियो खुद को एक आम महिला की तरह दिखाने के लिए जारी किया है।” एक नामी वकील की तरफ से यह बयान आना अपने आप में शर्मनाक है। एक वकील सबूतों, बयानों और गवाहों के आधार पर अपना केस लड़ता है लेकिन यहां विकास सिंह लोगों का ध्यान रिया चक्रवर्ती के बयान से अधिक उनके पहनावे की ओर ले जाना चाहते हैं। चूंकि इस केस में मुख्य आरोपी एक महिला को बनाया गया है इसलिए विकास सिंह भी केस को पितृसत्तात्मक तरीके से मज़बूत करते दिख रहे हैं।
लड़कियां सिर्फ पैसों के लिए लड़कों के साथ होती हैं, गर्लफ्रेंड अपने पार्टनर को परिवार से दूर कर देती है, लड़कियां अपने पार्टनर पर हुक्म चलाती हैं, वे सिर्फ अपने फायदे के लिए लड़कों का इस्तेमाल करती हैं और न जाने कितने ही अनगिनत पूर्वाग्रहों को इस सुशांत सिंह राजपूत के केस के मीडिया ट्रायल ने मज़बूती दी है। रिया चक्रवर्ती के मीडिया ट्रायल से पत्रकारिता के छात्रों और युवा पत्रकारों को यह सीख लेनी चाहिए कि पत्रकारिता कैसे नहीं करनी चाहिए। पितृसत्ता और औरतों से जुड़े पूर्वाग्रहों की नींव शुरू से ही कमज़ोर करने की ज़रूरत इसीलिए होती है ताकि कोई आगे चलकर ऐसे पैकेज न लिखे- ‘जानें, सुशांत को कैसे रिया ने अपने वश में किया था।’
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तस्वीर साभार: orissapost
About the author(s)
Ritika is the Managing Editor at Feminism in India (Hindi). Ritika is an award-winning multimedia journalist with over five years of experience. She is a passionate advocate for social justice and gender rights, and has been awarded the prestigious UN Laadli Media Awards twice and Breakthrough Reframe Media Awards for her gender-sensitive writing and reporting. She is also a fellow of Rise Up (Youth Championship Initiative).

