समाजख़बर ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट 2021 : 28 पायदान गिरकर 140वें पायदान पर पहुंचा भारत

ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट 2021 : 28 पायदान गिरकर 140वें पायदान पर पहुंचा भारत

वर्ल्ड इकॉनमिक फोरम की ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट में 156 देशों में भारत पूरे 28 पायदान गिरकर 140वें पायदान पर आ गया है।

मौजूदा राजनीतिक माहौल में भारत में महिलाओं के अधिकार, उनकी आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक आज़ादी आदि एक चुनौतीपूर्ण स्थिति में पहुंच चुके हैं इसे लेकर अब कोई शक बाकी नहीं रह गया। लेकिन बीते बुधवार को जारी हुई वर्ल्ड इकॉनमिक फोरम की ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट 2021 ने भारत में महिलाओं की चिंताजनक स्थिति पर एक और मोहर लगा दी है। बता दें कि वर्ल्ड इकॉनमिक फोरम की ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट में भारत पूरे 28 पायदान गिरकर 140वें पायदान पर आ गया है। यह पायदान तब और चिंताजनक लगता है जब पता चलता है कि भारत को यह 140वां पायदान कुल 156 देशों में दिया गया है। इसके साथ ही भारत लैंगिक समानता के क्षेत्र में दक्षिण एशिया का तीसरा सबसे खराब प्रदर्शन वाला देश बन चुका है। भारत लैंगिक समानता के मामले में अपने पड़ोसी देशों नेपाल, भूटान, श्रीलंका, बांग्लादेश और म्यांमार से भी पिछड़ चुका है। रिपोर्ट यह भी कहती है कि भारत और चीन जैसे घनी आबादी वाले देशों का खराब प्रदर्शन भी विश्व का औसत परिणाम खराब होने की एक वजह है। बता दें कि साल 2020 में भारत को 153 देशों में 112वीं पायदान पर रखा गया था।

156 देशों के आंकड़ों का अध्ययन करने वाली यह रिपोर्ट आर्थिक अवसरों, राजनीति, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्रों के आधार पर तैयार की जाती है। इस साल की जेंडर गैप रिपोर्ट भी कोविड-19 महामारी से अछूती नहीं रह गई है। वर्ल्ड इकॉनमिक फोरम के मुताबिक जिस जेंडर गैप को खत्म करने में पहले 99.5 साल लगने वाले थे, कोविड-19 के कारण अब इसे खत्म होने में 135.6 साल लग जाएंगे। अभी महिलाओं की कई पीढ़ियों को इस बात का इंतज़ार करना है कि वे जिस समाज में रहें वहां लैंगिक आधार पर भेदभाव न हो। 

तस्वीर साभार: जेंडर गैप रिपोर्ट 2021

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बात राजनीति के क्षेत्र में मौजूद जेंडर गैप की

बात अगर वैश्विक परिपेक्ष्य में करें तो इस रिपोर्ट के अनुसार दुनियाभर में मौजूद 35,000 संसदीय सीटों पर केवल 26.1 फीसद महिलाएं दुनियाभर की संसदों में अपनी मौजूदगी दर्ज करवा रही हैं। वहीं, केवल 22.6 फीसद महिलाएं मंत्री पद पर हैं। राजनीतिक क्षेत्र में मौजूद इस जेंडर गैप को पूरा करने में 145 साल से भी अधिक का वक्त लग सकता है। राजनीति वह क्षेत्र भी है जहां लैंगिक रूप से सबसे अधिक असमानता मौजूद है। अरमेनिया, सऊदी अरब, पापुआगिनी, थाईलैंड, यमन, वियतनाम जैसे देशों में तो आज भी एक भी महिला मंत्री है ही नहीं। वहीं, रिपोर्ट में शामिल 156 देशों में से 81 देशों (करीब 50 फीसद देशों) में आज तक कोई महिला ‘हेड ऑफ द स्टेट’ यानी राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री जैसे पदों पर रही ही नहीं। प्रगतिशील माने जाने वाले देशों अमेरिका, स्पेन, नीदरलैंड जैसे देशों में भी आज तक ऐसा नहीं हुआ। बात अगर भारत के संदर्भ में करें तो रिपोर्ट कहती है कि भारत उन देशों में शामिल है जहां महिला मंत्रियों की संख्या में एक बड़ी गिरावट (23.1 फीसद 2019 से 9.1 फीसद 2021) देखी गई है। वैश्विक स्तर पर इस गैप को खत्म होने में 267.6 सालों का वक्त लगेगा।

शिक्षा के क्षेत्र में भारत का प्रदर्शन निराशाजनक

बात अगर उच्च शिक्षा की करें तो इस क्षेत्र में वैश्विक पटल पर चीज़ें बदलती नज़र आ रही हैं। रिपोर्ट के मुताबिक साल 2018 में दुनिया में 40.6 महिलाओं और 35.6 फीसद पुरुष का (tertiary education) तृतीयक शिक्षा में नामांकन हुआ। यह इस बात की ओर इशारा करता है कि महिलाएं आगे बढ़ने के लिए शिक्षा का सहारा ले रही हैं। रिपोर्ट के मुताबिक उच्च शिक्षा में पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की भागीदारी अधिक देखी गई। लेकिन वहीं प्राथमिक शिक्षा में महिलाओं की भागीदारी कम देखी गई। रिपोर्ट में इसका ज़िम्मेदार लड़कों को दी जाने वाली प्राथमिकता को बताया गया है। रिपोर्ट कहती है चीन, भारत और पाकिस्तान जैसे देशों में पांच साल से कम उम्र की बच्चियों की मौत सबसे अधिक होती है, यहां भ्रूण को उसके लिंग के आधार पर वरीयता दी जाती है। शिक्षा प्राप्ति के क्षेत्र में 156 देशों में भारत को 114वां पायदान दिया गया है।

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आर्थिक अवसर और अर्थव्यवस्था में भागीदारी

भारत में महिलाओं के लिए आर्थिक अवसर और अर्थव्यवस्था में उनकी भागीदारी पहले से ही बेहद कम रही है। इस स्थिति को कोविड-19 ने और भी अधिक चिंताजनक बना दिया है। ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट 2021 के मुताबिक भारत में केवल 29.2 फीसद महिलाएं ही तकनीकी भूमिकाओं में शामिल हैं। साथ ही जेंडर गैप में भारत की भारत के खराब प्रदर्शन की एक बड़ी वजह यह भी है। भारत में श्रम बल में औरतों की भागीदारी जहां घटकर 24.8 फीसद से 22.3 फीसद हो गई, वहीं सीनियर और मैनेजर के ओहदों पर महिलाओं की मौजूदगी में गिरावट दर्ज की गई है। केवल 14.6 फीसद महिलाएं ही इन ओहदों पर मौजूद हैं, साथ ही केवल 8.9 फीसद फर्म ही ऐसे हैं जहां महिलाएं टॉप मैनेजर्स की भूमिका में हैं। इस क्षेत्र में 156 देशों में भारत की रैंकिंग 151 है। साथ ही महिलाएं मर्दों द्वारा कमाई जाने वाली राशि का पांचवा हिस्सा ही कमा पाती हैं। बता दें कि भारत दुनिया के उन देशों में शामिल है जहां श्रम बल में महिलाओं की भागीदारी सबसे कम है।

सरकार इस जेंडर गैप को कम करने के लिए कोई कदम उठाएगी या इस रिपोर्ट को भी भारत की छवि वैश्विक पटल पर खराब करने की एक साजिश बता खारिज कर दिया जाएगा, यह एक सवाल है।

कई अन्य रिपोर्ट्स भी बताती हैं कि कोविड-19 के कारण जिन लोगों ने रोज़गार खोया, उनमें भी सबसे अधिक प्रभावित महिलाएं ही हुई। भारत के संदर्भ में सबसे अधिक असर असंगठित क्षेत्र में काम करनेवाली महिलाओं पर हुआ। ऑक्सफैम इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक अप्रैल 2020 में करीब 17 मिलियन (1 करोड़ 70 लाख) महिलाओं ने अपनी नौकरी खोई। यही वजह है कि महिलाओं की बेरोज़गारी दर लॉकडाउन के बाद 18 फीसद हो गई जो लॉकडाउन से पहले 15 फीसद थी। न सिर्फ करोड़ों महिलाओं ने अपनी नौकरी खोई बल्कि उन पर पेड और अनपेड दोंनो ही तरह के कामों के घंटों का भार बढ़ा।

स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी भारत की रैंकिंग 156 देशों में 155 है। यह गिरावट लिंग अनुपात में कमी, जेंडर के आधार पर बच्चों का चयन जैसी वजहों के कारण है। साथ ही भारत में हर चार में से एक भारतीय महिला ने अपने साथी द्वारा हिंसा का सामना किया है।

जेंडर गैप पर कोविड-19 महामारी का प्रभाव

वर्ल्ड इकॉनमिक फोरम की ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट 2021 ने इस जेंडर गैप को और अधिक चुनौतीपूर्ण बनाने के लिए कोविड-19 को भी एक बड़ी वजह माना है। रिपोर्ट कहती है कि कोविड-19 में मर्द और औरतों दोंनो की ज़िंदगियों को बदलकर रखा दिया है लेकिन इस महामारी ने लैंगिक समानता हासिल करने के लक्ष्य के रास्ते में कई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। इस महामारी में महिलाओं ने मर्दों के मुकाबले अधिक परेशानियों का सामना किया। कोविड-19 के कारण उपजी परेशानियों को हल करने के लिए यह रिपोर्ट सुझाव देती है कि सरकारों को ऐसी नीतियां बनानी चाहिए जो लैंगिक रूप से समावेशी हो। केयर सेक्टर में अधिक निवेश करने की ज़रूरत है।ऐसी नीतियों की ज़रूरत है जो पेशवर लैंगिक भेदभाव को कम करे। साथ ही बिना किसी भेदभाव के लोगों का चयन, प्रमोशन, समान वेतन, महिलाओं के कौशल को बढ़ाए जाने की ओर ध्यान देने की ज़रूरत है।

इस रिपोर्ट में दिए गए सुझाव नए नहीं है, हां इनका कोविड-19 के चश्मे से देखा जाना नया है। इन सुझावों को अगर भारत के संदर्भ में देखा जाए तो कोविड-19 लॉकडाउन और पोस्ट-कोविड दौर में भी महिलाओं और अन्य जेंडर माइनॉरीटीज़ के लिए कोई ठोस नई योजना की घोषणा या कदम नहीं उठाए गए। लॉकडाउन के दौरान सबसे अधिक प्रभावित हुए उन श्रमिकों के लिए की गई सरकार की घोषणाएं भी नाकाफ़ी साबित हुई जो मीलों पैदल अपने घर जाने को मजबूर थे। हां, सरकार ने फौरी मदद के तौर पर ’20 लाख करोड़’ के राहत पैकेज की घोषणा ज़रूर की जिसके तहत जनता को कितनी राहत मिली यह अब तक एक सवाल है। एक आरटीआई के तहत मिले जवाब में यह बताया गया सरकार के इस आत्मनिर्भर पैकेज का केवल 10 फीसद ही वितरित किया गया है। ऐसे में सरकार इस जेंडर गैप को कम करने के लिए कोई कदम उठाएगी या इस रिपोर्ट को भी भारत की छवि वैश्विक पटल पर खराब करने की एक साजिश बता खारिज कर दिया जाएगा, यह एक सवाल है।

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तस्वीर साभार : UN India

About the author(s)

Ritika is the Managing Editor at Feminism in India (Hindi). Ritika is an award-winning multimedia journalist with over five years of experience. She is a passionate advocate for social justice and gender rights, and has been awarded the prestigious UN Laadli Media Awards twice and Breakthrough Reframe Media Awards for her gender-sensitive writing and reporting. She is also a fellow of Rise Up (Youth Championship Initiative).

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