26 जनवरी 1950 में हमारा संविधान बनकर तैयार हो गया था। संविधान के बनने के साथ ही भारत में लोकतंत्र की व्यवस्था लागू हो चुकी थी। न्यायतंत्र भी न्यायालय के साथ बनकर तैयार हो चुका था। लेकिन इस पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं के लिए सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचना इतना आसान नहीं था। महिलाओं को वहां तक पहुंचने में लगभग 4 दशक लग गए। आखिरकार 6 अक्टूबर 1989, को वह दिन आया जब किसी महिला ने देश के सर्वोच्च न्यायालय में बतौन न्यायाधीश अपनी मौजूदगी दर्ज करवाई। अपने साथ-साथ उस महिला ने अन्य महिलाओं के लिए संभावनाओं का दरवाजा खोला और वह औरत फ़ातिमा बीवी थीं। फ़ातिमा बीवी का जन्म 30 अप्रैल 1927 को पूर्ववर्ती राज्य त्रावंकोर जिसे अब केरल कहा जाता है, वहां के पथानामथिट्टा में हुआ था। उनका पूरा नाम मीरा साहिब फ़ातिमा बीबी है।
फ़ातिमा बीवी के पिता का नाम अन्नावीतिल मीरा साहिब और मां का नाम खदीजा बीबी था। उनके पिता एक सरकारी कर्मचारी थे। वह छह बहनों और दो भाइयों में सबसे बड़ी थीं। उस दौर में भी उनके माता-पिता ने उनकी पढ़ाई में कोई कसर नहीं छोड़ी। उनकी प्रारंभिक शिक्षा कैथीलोकेट हाई स्कूल, पथानामथिट्टा से पूरी हुई। उन्होंने 1943 में हाई स्कूल पास किया। उसके बाद आगे की पढ़ाई के लिए वह त्रिवेंद्रम चली गईं। वहां वह छह साल तक रहीं। उन्होंने यूनिवर्सिटी कॉलेज, त्रिवेंद्रम से साइंस में स्नातक और लॉ कॉलेज, त्रिवेंद्रम से एलएलबी की डिग्री हासिल की। पहले साल में सिर्फ पांच लड़कियां उनके साथ पढ़ती थीं। दूसरे साल यह संख्या घटकर तीन हो गई। लेकिन फ़ातिमा बीवी ने अंतिम साल तक अपनी पढ़ाई पूरी की। उन्होंने न सिर्फ अपनी पढ़ाई पूरी की बल्कि इस क्षेत्र में अपना अहम योगदान भी दिया। फ़ातिमा अपनी पढ़ाई साइंस में ही जारी रखना चाहती थीं। लेकिन उनके पिता अन्ना चाण्डी से काफी प्रभावित थे, जो हाईकोर्ट में भारत की पहली महिला जज थीं। उन्हीं से प्रभावित होकर उनके पिता ने बीवी को लॉ पढ़ने के लिए प्रेरित किया।
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कॉलेज खत्म होने के बाद साल 1950 में भारत के बार काउंसिल की परीक्षा में फ़ातिमा बीवी ने टॉप किया। इस परीक्षा को टॉप करने वाली वह प्रथम महिला थीं। उसी साल नवंबर में उन्होंने एक वकील के रूप में अपना पंजीकरण किया और केरल के सबसे निचली अदालत ‘कोल्लम’ में एक वकील के रूप में अपनी प्रैक्टिस शुरू कर दी। इस समाज को महिलाओं का खुद के बल पर आगे बढ़ना कभी से बर्दाश्त नहीं होता। इसलिए उनकी प्रतिभा और काबिलियत भी लोगों से हजम नहीं हो पा रहा था। लोग उनके काम करने को लेकर भी तरह-तरह के बातें बनाते थे। लेकिन इन सभी चीजों को नजरअंदाज करके वह हिजाब पहनकर कोर्ट जाती और अपना काम करती थी। 8 साल बाद उन्होंने केरल के अधीनस्थ न्यायिक सेवाओं में मुंसिफ के तौर पर काम किया। सुप्रीम कोर्ट की जज नियुक्त होने से पहले केरल की कई न्यायिक संस्थानों में भी उन्होंने काम किया। अपने बेहतरीन कार्य की वजह से धीरे-धीरे वह सफलता की सीढ़ियां चढ़ती गईं। उन्होंने साल 1972 से 1974 तक मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के रूप में काम किया। साथ ही 1974 से 1980 तक वह जिला एवं सत्र की न्यायाधीश रहीं। साल 1980 से 1983 में उन्होंने आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण में न्यायिक सदस्य के रूप में अपनी सेवाएं दी।
वेबसाइट द स्क्रोल को दिए गए एक इंटरव्यू में फ़ातिमा बीवी ने कहती हैं, “मैंने दरवाजा खोल दिया है।”
इसके बाद एक बड़ा मौका उनकी जिंदगी में तब आया जब 1983 में केरल हाई कोर्ट में वह जज़ बनीं। वहां उन्होंने 1989 तक अपनी सेवा दी। हाई कोर्ट के जज़ के पद से रिटायर होने के महज़ छह महीने बाद फ़ातिमा बीवी को अक्टूबर, 1989 में सुप्रीम कोर्ट का जज़ नियुक्त किया गया। किसी भी उच्च न्यायपालिका में नियुक्त होने वाली वह पहली महिला जज़ थी। साथ ही पूरे एशिया क्षेत्र में सुप्रीम कोर्ट की पहली महिला जज़ होने का खिताब भी उन्होंने अपने नाम किया। यह एक ऐसा समय था, जब फ़ातिमा ने पूरे भारत की महिलाओं का प्रतिनिधित्व शीर्ष अदालत में किया था। यह इतिहास में एक सुनहरा पल था। वेबसाइट द स्क्रोल को दिए गए एक इंटरव्यू में फ़ातिमा बीवी ने कहती हैं, “मैंने दरवाजा खोल दिया है।” यह शब्द उनकी उपलब्धि को बखूबी बयां करते हैं कि उन्होंने इस पुरुष प्रधान न्यायतंत्र में महिलाओं के लिए रास्ता बना दिया है। साल 2016 में द वीक के एक इंटरव्यू में उनसे पूछा गया कि क्या भारतीय न्यायतंत्र पितृसत्तात्मक है? इस पर उन्होंने जवाब दिया, “जी बिल्कुल है।” वह हमेशा से औरतों के उच्च न्यायालय में प्रतिनिधित्व को लेकर चिंताजनक रहीं। उन्होंने इंटरव्यू में यह भी कहा कि न्यायाधीशों के पद पर महिलाओं की संख्या बढ़ाने की ज़रूरत है। बार और बेंच दोनों ही क्षेत्रों में अब बहुत-सी महिलाएं हैं। लेकिन उनका प्रतिनिधित्व पुरुषों के बराबर नहीं है। इसके लिए ऐतिहासिक कारण भी है कि महिलाओं ने यह क्षेत्र देर से चुना। महिलाओं को न्यायपालिका में बराबरी का प्रतिनिधित्व करने में समय लगेगा। उच्च न्यायपालिका में महिलाओं की संख्या बढ़ाने के लिए आरक्षण पर विचार करना जरूरी है। साल 1992 में वह सुप्रीम कोर्ट से रिटायर हो गईं।
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उसके बाद उन्होंने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सदस्य के रूप में कार्य किया। 25 जनवरी 1997 को भारत के राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने उन्हें तमिलनाडु का राज्यपाल नियुक्त किया। इस दौरान उन्होंने मद्रास विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में भी काम किया। अपने कार्यकाल के दौरान जो सबसे मुख्य फैसला उन्होंने लिया था वह था राजीव गांधी के चार हत्यारों की दया याचिका अस्वीकार करना।
साल 2001 में उन्होंने जयललिता को तमिलनाडु के मुख्यमंत्री का शपथ ग्रहण करने के लिए आमंत्रित किया था। इस निर्णय को लेकर वह विवादों में आ गई थीं क्योंकि उस वक्त जयललिता को भ्रष्टाचार के मामले को लेकर चुनाव में लड़ने से प्रतिबंधित किया गया था। लेकिन फ़ातिमा बीवी ने यह भी साफ किया था कि जयललिता को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला कोई अचानक से लिया गया फैसला नहीं था बल्कि इसके लिए सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों और भारत के सर्वोच्च न्यायाधीशों से भी सलाह किया गया था। जब उन्हें मुख्यमंत्री बनाया गया तब उन पर भ्रष्टाचार का कोई आरोप सिद्ध नहीं हुआ था पर इसे लेकर केंद्रीय मंत्रिमंडल फ़ातिमा से नाराज हो उठा। उन्होंने राष्ट्रपति से अनुरोध किया कि वह राज्यपाल से इस्तीफा मांगे क्योंकि वह संवैधानिक दायित्व को पूरा करने में असक्षम है। इसलिए फ़ातिमा बीवी ने साल 2001 में राज्यपाल के पद से इस्तीफा दे दिया। 1993 में उन्होंने केरल पिछड़ा वर्ग आयोग का अध्यक्ष और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सदस्य के रूप में भी काम किया था। 1990 में उन्हें डि.लिट.(D.Lit) की मानद उपाधि और महिला शिरोमणि पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। जब एनडीए ने राष्ट्रपति के नामांकन के डॉ ए.पी.जे अब्दुल कलाम का नाम प्रस्ताव में रखा था तब वामदलों ने फ़ातिमा बीवी के संभावनाओं पर भी चर्चा की थी।
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तस्वीर साभार : Indian Women Blog
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