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पिछले हफ्ते सुप्रीम कोर्ट ने देश की सभी अदालतों को महिलाओं के पहनावे, व्यवहार, आचरण, नैतिकता या शुद्धता पर टिप्पणी करने से मना किया और यौन अपराधों के मामलों का फैसला करते हुए किसी भी ‘समझौते’ का सुझाव ना देने का निर्देश दिया। उच्च न्यायालय ने यह ज़ोर देकर कहा कि कई बार न्यायिक फैसलों में  पितृसत्तात्मक और स्त्री द्वेष दृष्टिकोण दिखता है, जो कि नहीं होना चाहिए। दुनिया के इतिहास में यह शायद पहली बार था कि देश का सर्वोच्च न्यायालय खुद दूसरी अदालतों को ऐसे निर्देश देने पर मजबूर हो गया। भारत में बीते कुछ दिनों में अलग-अलग अदालतों से आई टिप्पणियों और फैसलों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश डूबते को तिनके का सहारा के समान है। आज जहां भारत में नेताओं और मंत्रियों का महिला-विरोधी बयान देना समय बिताने का पसंदीदा तरीका बन चुका है, वहीं कई बॉलीवुड अभिनेता भी इस प्रतिस्पर्धा में पीछे नहीं है।

लैंगिक समानता के क्षेत्र में लगातार खराब प्रदर्शन कर रही भारत की राजनीति, अर्थनीति और सामाजिक नीतियों को देखते हुए इस विषय पर प्रश्न उठना लाज़मी है। जस्टिस ए.एम खानविल्कर और जस्टिस एस रवींद्र भट की पीठ ने कहा कि यौन शोषण को तुच्छ मानना, सर्वाइवर के लिए मुश्किलें बढ़ा देती है। उन्होंने इस बात पर ज़ोर देते हुए कहा कि कोई भी न्यायाधीश समाज द्वारा हानिकारक रूढ़ियों को नकारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। यह उनकी एक अहम जिम्मेदारी है कि वे सबूतों को कानून और तथ्यों के दायरे में रखते हुए फैसले करें न कि लैंगिक रूढ़िवादिता के अधीन होकर। पीठ ने यह भी कहा कि ऐसा करने से अदालती कार्यवाही की निष्पक्षता प्रभावित होती है।

ये निर्देश जस्टिस एएम खानविल्कर और जस्टिस एस रवींद्र भट ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के जुलाई 2020 के यौन शोषण के एक मामले में ज़मानत के लिए आरोपी को शिकायतकर्ता से राखी बंधवाने की शर्त रखने को रद्द करते हुए दिए। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने अटॉर्नी जनरल के.के वेणुगोपाल के साथ मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली अधिवक्ता अपर्णा भट्ट और अन्य आठ महिला वकीलों के प्रस्ताव पर अधिवक्ताओं के लिए लैंगिक संवेदनशीलता पर एक कोर्स को मूलभूत प्रशिक्षण के हिस्से के रूप में शामिल करने की भी बात की। देश के सर्वोच्च न्यायालय का अपने ही अदालतों को चेताना, दिशानिर्देश जारी करना और महिला अधिवक्ताओं का यह प्रस्ताव भारत की रूढ़िवादी और पितृसत्तात्मक सामाजिक, राजनीतिक माहौल को बयान करती है। साथ ही यह हमारे न्याय व्यवस्था में व्याप्त लैंगिक असमानता को भी जाहिर करती है।

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एक ओर यह निर्देश देना, यौन शोषण की सर्वाइवर महिलाओं को निष्पक्ष न्याय दिलाने में मददगार साबित हो सकता है तो दूसरी ओर यह स्त्रीद्वेष में लिप्त भारतीय न्याय व्यवस्था की दुर्दशा बताती है। बता दें कि पिछले दिनों कई मामलों जैसे मुंबई हाईकोर्ट की नागपुर पीठ की न्यायमूर्ति पुष्पा गनेदीवाला के पॉस्को एक्ट के मामले में स्किन-टू-स्किन कॉन्टैक्ट वाला आदेश, मुंबई सेशन कोर्ट का ससुरालवालों द्वारा बहु से व्यंग्यात्मक तरीके और ताना मारकर बात करने वाली टिप्पणी या खुद मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे का बलात्कार आरोपी को पीड़िता से शादी करने का तथाकथित प्रस्ताव पर अलग-अलग संस्थाओं, नागरिकों और नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं ने पुरजोर विरोध किया था। लेकिन यह कोई पहली बार नहीं है जब न्यायालय की तरफ से महिला-विरोधी बयान आए हो। कई मीडिया रिपोर्टों के अनुसार महिला अधिवक्ताओं को खुद कोर्ट परिसर में कामकाज के दौरान पुरुष सहकर्मियों द्वारा पितृसत्तात्मक और रूढ़िवादी टिप्पणियों का सामना करना पड़ता है। ऐसी ही कुछ घटनाओं का जिक्र करते हुए भारत की पहली महिला अडिश्नल सॉलिसीटर जनरल इंदिरा जयसिंह ने साल 2019 में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर मुख्य न्यायधीश को एक पत्र लिखा था और इन समस्याओं को कानून के दायरे में लाने का आग्रह किया था।

द लीफलेट की रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने अपने पत्र में लिखा था कि लिंग भेद एक सामाजिक निर्माण है, जो अपने साथ रूढ़िवाद और चारित्रिक नैतिकता के प्रतिमान की अवधारणा को लाता है। इस देश का संविधान जेंडर के आधार पर भेदभाव से सभी की रक्षा करता है और इसलिए न्यायालय यह मानता है कि लैंगिक रूढ़ियों को कायम रखना भी लैंगिक भेदभाव है। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया था कि पिछले सत्तर सालों से भारतीय संविधान का अनुच्छेद 15 इस देश में सभी लिंग के लोगों को समान दर्जा देता है। इसलिए अदालतों में किसी भी लिंग के व्यक्ति को उसके लैंगिकता के आधार पर नीचा दिखाना अक्षम्य होना चाहिए क्योंकि लोग यहां न्याय की उम्मीद से आते हैं। हमारे न्यायिक व्यवस्था में लैंगिक असमानता का होना इस समस्या को और वृहद बनाता है।

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न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा की मार्च 2021 में सेवानिवृत्ति के बाद सुप्रीम कोर्ट में अब केवल एक महिला न्यायाधीश हैं। कुछ दिनों पहले अटॉर्नी जनरल वेणुगोपाल ने इस समस्या के बारे में चिंता व्यक्त करते हुए कहा था कि सुप्रीम कोर्ट में केवल दो महिला न्यायाधीश हैं जबकि न्यायालय में कुल 34 महिला न्यायाधीशों का प्रावधान है। न्यायालय के स्थापना के 70 सालों में अब तक केवल आठ महिला न्यायाधीशों को सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त किया गया है। फातिमा बीवी सुप्रीम कोर्ट की पहली महिला न्यायाधीश थी जिन्हें न्यायालय के गठन के 40 साल बाद 1989 में नियुक्त किया गया था। साल 1989 के बाद से अब तक महज सात अन्य महिलाओं को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया गया है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि देश के सर्वोच्च अदालत में यह प्रवृत्ति सालों से चली आ रही है।

बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट ने समय-समय पर महिलाओं और समाज के हाशिए पर रह रहे समुदायों के अधिकारों का समर्थन किया है और अपने फैसलों के माध्यम से संवैधानिक मूल्यों को कायम रखा है। विशाखा मामला जिसके अंतर्गत कामकाजी महिलाओं के मौलिक अधिकारों और यौन उत्पीड़न से निपटने के दिशानिर्देश बनाए गए, महाराष्ट्र बार डांसर्स को काम करने का अधिकार, तीन तलाक फैसला, धारा 377 का फैसला या नालसा मामले में ट्रांस समुदाय को समान अधिकार प्रदान करने जैसे फैसलों ने हमारी उम्मीद बनाई हुई है।

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तस्वीर साभार : livehindustan

 

कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज से हिंदी में बी ए और पंजाब टेक्निकल यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की पढ़ाई करने के बाद बतौर पत्रकार और शिक्षिका मैंने लम्बे समय तक काम किया है। बिहार और बंगाल के विभिन्न क्षेत्र में पले-बढ़े होने के कारण सामाजिक रूढ़िवाद, धार्मिक कट्टरपन्त, अंधविश्वास, लैंगिक और शैक्षिक असमानता जैसे कई मुद्दों को बारीकी से जान पायी हूँ। समावेशी नारीवादी विचारधारा की समर्थक, लैंगिक एवं शैक्षिक समानता ऐसे मुद्दें हैं जिनके लिए मैं निरंतर प्रयासरत हूँ।

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