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भारत में दलितों और हाशिए के लोगों को उनके अधिकारों से अवगत कराने वाले बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर थे लेकिन वह अकेले कभी अपने उद्देश्य को सिद्ध नहीं कर पाते जब तक कि उन्हें उन जैसे ही कर्मनिष्ठ लोगों का साथ नहीं मिलता। उन्हीं में से एक थीं शांताबाई दाणी, जो जातिवाद के ख़िलाफ़ जारी आंदोलन के सबसे प्रसिद्ध नेताओं में शामिल थीं। बाबा साहब आंबेडकर के नेतृत्व में दलितों की राजनीति को प्रमुखता से उठानेवाली वह एक प्रभावशाली दलित नेता थीं। वह कानपुर में अनुसूचित जाति संघ के महिला परिषद की अध्यक्ष थीं। शांताबाई धनाजी दाणी एक राजनीतिज्ञ के साथ साथ लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता भी थीं। वह मुख्य-रूप से मराठी भाषा में लिखती थीं। उनके संस्मरण “रतनदीन अम्हा (हमारे लिए – ये रातें और दिन)” में उन्होंने दलितों के जीवन का संघर्ष को दर्शाया है कि कैसे ये दिन और रातें उनके लिए एक युद्ध जैसी स्थिति पैदा करते हैं। इस संस्मरण में रात और दिन के भूख से आने वाली यादों का चित्रण है।

शांताबाई का जन्म 1919 में नासिक शहर के एक छोटे से बस्ती खडकली में हुआ था। उनके पिता की आर्थिक स्थिति इतनी मजबूत नहीं थी लेकिन फिर भी उन्होंने उनकी पढ़ाई में कभी हस्तक्षेप नहीं किया। उनकी मां भी उन्हें पढ़ाई के प्रति‌ हमेशा प्रोत्साहित करती थीं। शांताबाई याद करती हैं कि कैसे उनकी मां कहती थीं,”सुनो लड़की, गरीबों के लिए शिक्षा एक आशा की किरण है।” उन्होंने अपने प्रारंभिक शिक्षा नासिक के मिशन प्राइमरी स्कूल से प्राप्त की फिर गुजरात के हाई स्कूल से अपनी पढ़ाई जारी रखी और पुणे के महिला प्रशिक्षण कॉलेज से अपने कॉलेज की शिक्षा प्राप्त की। शांता अपनी एक बहन और दो भाइयों से छोटी थीं। इनके जन्म से पहले इनके एक भाई की मृत्यु हो चुकी थी। जब इनका जन्म होने वाला था तो उनके पिता को एक बेटे की आस थी लेकिन जब बेटी हुई तो वह मायूस हो गए और इसीलिए उन्होंने इनका नाम शांता रख दिया क्योंकि उनकी सारी उम्मीदें शांत हो चुकी थी।

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शांता को अपने जीवन में कई बार जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़ा। जब वह पांचवी कक्षा में थीं तब उनके पिता के दोस्त के परिवार ने उन्हें दावत के लिए आमंत्रित किया था। परिवार उच्च मराठा जाति से था, इसलिए उन्हें गाय के शेड में खाना परोसा गया। इस पर शांताबाई को काफी आश्चर्य हुआ। जात-पात की दुनिया से अनभिज्ञ शांताबाई ने अपने पिता से इसका कारण पूछा। पिता ने कहा,”हम महार जाति से हैं हम उनके साथ कैसे खा सकते हैं। वह हमारी उपस्थिति से दूषित हो जाते हैं।” शांताबाई ने पूछा, “दूषित क्या है?” पिता ने बताया कि हम उन्हें छू नहीं सकते। अगर छू लेंगे तो क्या हो जाएगा? इस सवाल पर उनके पिता ने कहा, “यदि हम उन्हें छूएंगें तो हम और वह दोनों पापी हो जाएंगे। पाप क्या है? पिता ने सरल शब्दों में बताया,”पाप बुरी चीज है। वह अच्छा काम नहीं है।” शांताबाई ने फिर पूछा,” क्या हम इंसान नहीं है?” बेशक है, पिता ने कहा। “यह लोग बिल्लियां और कुत्ते को तो छूते हैं फिर हमें क्यों नहीं?” पिता शांताबाई की जिज्ञासा को शांत नहीं कर पाए और यह घटनाक्रम उनके मन मस्तिक में घर कर गया। कई शिक्षण संस्थानों में भी उन्हें भेदभाव का सामना करना पड़ा था।

एक बार उनके कॉलेज में डॉक्टर भीमराव आंबेडकर आए। उनके भाषण का शांताबाई पर गहरा प्रभाव पड़ा। इसके बाद उन्होंनेदलितों के राजनीतिक अधिकारों के लिए लड़ने का फैसला किया। उसी समय वह कर्मवीर दादासाहेब गायकवाड़ के संपर्क में आईं। दादा साहब बाबा आंबेडकर के करीबी सहयोगी थे। वह उनके चचेरी बहन के पति थे। शांताबाई ने दादा साहब के मार्गदर्शन में काम शुरू किया। उन्हीं के सानिध्य में शांताबाई की रुचि को एक नई दिशा मिली। उन्होंने महार समुदाय के गरीब वर्गों के बीच जागरूकता फैलाने, उनमें सामाजिक चेतना लाने और एक बड़ी लड़ाई के लिए प्रेरित करना शुरू किया। एक बार दादा साहब के घर पर वह बाबा साहब भीमराव आंबेडकर से मिली थी। उनके साथ की गई छोटी बातचीत ने ही उनके जीवन को एक नई दिशा दे दी। वह इस महान व्यक्ति के विनय और सौहार्द से मंत्र-मुग्ध हो गई थीं। उनके मार्गदर्शन और लोगों को सलाह देने की क्षमता से खासा प्रभावित हुई थीं।

जब साल 1946 में बाबा साहब आंबेडकर ने विधानसभा में अनुसूचित जातियों के लिए प्रतिनिधित्व की मांग करने के लिए सत्याग्रह का आह्वान किया था, तब शांताबाई ने अपनी परीक्षाओं को छोड़ दिया था क्योंकि वह खुद को राजनीति से दूर नहीं रख सकीं।

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उस समय दलितों के लिए कोई अलग मंच नहीं था। इसलिए बाबा साहब आंबेडकर ने अपनी राजनीति शुरू करने के लिए अनुसूचित जाति महासंघ (Scheduled Caste Federation) की स्थापना की। पहली बार दलितों को देश की राजनीति में केंद्र में आने का मौका मिला। जब साल 1946 में बाबा साहब आंबेडकर ने विधानसभा में अनुसूचित जातियों के लिए प्रतिनिधित्व की मांग करने के लिए सत्याग्रह का आह्वान किया था, तब शांताबाई ने अपनी परीक्षाओं को छोड़ दिया था क्योंकि वह खुद को राजनीति से दूर नहीं रख सकीं। इसलिए वह अपने बीए की डिग्री पूरी नहीं कर पाईं। एक बार एक प्रदर्शन के दौरान उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और यरवदा जेल ले जाया गया। वहां भी शांताबाई ने महिला कैदियों के बीच आंबेडकरवादी विचारधारा को फैलाया। वह लगातार पार्टी के कार्य से जुड़ी रहीं। पूना पैक्ट के खिलाफ आंदोलन के बाद, शांताबाई ने सभी सामाजिक मोर्चों पर मोर्चा संभाल लिया। आजादी के बाद भी उन्होंने दलितों के अधिकारों के लिए बोलना बंद नहीं किया। इतना ही नहीं उन्होंने महाराष्ट्र में भूमिहीन कृषि श्रमिकों के एक आंदोलन के लिए अथक परिश्रम किया। 1968 में शांताबाई को राज्य विधान मंडल में राज्यपाल के उम्मीदवार के रूप में नियुक्त किया गया। उन्होंने 1974 तक राज्यपाल का कार्य संभाला।

साल 1989 उन्होंने राजनीति को अलविदा कह दिया। नासिक के ग्रामीण इलाकों में लड़कों और लड़कियों के लिए स्कूल स्थापित करने के काम में खुद को समर्पित कर दिया क्योंकि उनकी मां ने उन्हें हमेशा सिखाया था कि शिक्षा ही वह हथियार है जो समाज के सभी परेशानियों का हल कर सकती है। इसलिए वह स्कूल का निर्माण करके समाज में शिक्षा का संचार करना चाहती थीं। लेकिन स्कूल का निर्माण करने में भी पैसे की कमी होने लग तो उन्होंने और दादा साहेब गायकवाड़ की दूसरी पत्नी सीताबाई ने अपना सोना बेचकर धन एकत्रित किया और स्कूल निर्मित किया। साल 1987 में, शिक्षा के क्षेत्र में शांताबाई को उनके योगदान के लिए सावित्रीबाई फुले पुरस्कार से नवाजा़ गया। 1985 में महाराष्ट्र सरकार ने उन्हें दलित मित्र पुरस्कार से पुरस्कृत करने के लिए आमंत्रित किया लेकिन उन्होंने यह कहकर इस पुरस्कार को स्वीकार करने से इनकार कर दिया कि अगर राज्य दलित समुदाय के लिए कुछ करना ही चाहता है तो उन्हें मूलभूत सुविधाएं जैसे स्वच्छता और पानी की सुविधा प्रदान करने का प्रयत्न करें। 72 वर्ष की आयु में अपने राजनीतिक जीवन से सेवानिवृत्त होने के बावजूद उन्होंने जन आंदोलन, दलित पैंथर, दलित मुक्ति सेना और रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया के सभी गुटों के प्रतिनिधियों की एकता के लिए बैठक आयोजित की। समाज में जातिगत भेदभाव के उन्मूलन के लिए लगातार लड़ रही वीरांगना का साल 2001 में निधन हो गया।

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