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क्या आपको कोई ऐसी घटना याद है जब आप थककर घर आए हो और मां की जगह आपके बजाय पिता या भाई को पानी पिलाने या भूख लगने पर अपने पिता को कुछ पकाकर खिलाने का आग्रह किया हो। स्वाभाविक और प्राकृतिक रूप में मानव दिमाग का पिता या भाई के बदले अपनी मां या बहन को इन घरेलू कामों के लिए आदेश देना पितृसत्ता से जन्मी मानसिकता का परिणाम है। हालांकि, महिलाओं के प्रति यह सोच सिर्फ हमारे घरों तक ही सीमित नहीं है। ऐसी ही सोच के कारण कृत्रिम बुद्धिमत्ता या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का इस्तेमाल कर ऐसे वर्चुअल असिस्टेंट या ह्यूमनॉइड यानी मानव रूपी रोबोट का आविष्कार हो रहा है जो महिलाओं की आवाज़ और उनके स्वरूप को उन कामों के लिए अपना रहे हैं जिनका दायरा पितृसत्तात्मक समाज ने पहले से ही तय कर रखा है। यह बात हैरान करने वाली ज़रूर है क्योंकि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का कोई जेंडर नहीं होता लेकिन आज अलग-अलग शोध और रिपोर्ट इस प्रवृत्ति की गवाह दे रहे हैं।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की दुनिया में भी पुरुषों के बोलबाले के कारण जिन कामों में सौहार्द, धैर्य, कोमलता या शिष्टाचार की उम्मीद की जाती है, उन्हें महिलाओं से जोड़ लेने में सहूलियत होती है। महिलाओं के प्रति यह पूर्वाग्रह और AI की दुनिया में महिलाओं का अस्वाभाविक रूप से कम संख्या में नेतृत्व करना आने वाले दिनों में खतरनाक साबित हो सकता है। संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (UNESCO) के मुताबिक एआई सिस्टम के डिज़ाइन, विकास और परिनियोजन में महिलाओं का भाग लेना और नेतृत्व करना आज बेहद ज़रूरी हो गया है। UNESCO के अनुसार साक्ष्यों से पता चलता है कि साल 2022 तक, महिलाओं के प्रति इस पूर्वाग्रह के वजह से एआई परियोजनाएं 85 फीसद तक गलत परिणाम दे सकती हैं।

ह्यूमनॉइड रोबोट अलग-अलग तकनीक के माध्यम से संचालित एक पूरी तरह स्वायत्त या आंशिक रूप से स्वायत्त मशीन है जो अपने आस-पास के माहौल के अनुरूप बातचीत या व्यवहार करने में योग्य होता है। यह मनुष्य के आकार का हो सकता है या एक मनुष्य की तरह भी हो सकता है। ऐपल के आईफोन की सहायक सिरी, ऐमजॉन की अलेक्सा, पहली रोबोट नागरिक सोफिया से लेकर जापान की पहली रोबोट होटल कर्मचारी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का महिलाओं की आवाज़ और उनके स्वरूप को अपनाने के पीछे यह धारणा काम करती है कि जिन कामों को ये कर रही हैं, वे पुरुषों के लिए नहीं हैं। साल 2016 में, माइक्रोसॉफ्ट द्वारा ‘थिंकिंग अबाउट यू’, टीएवाई नामक एक चैटबॉट बनाया गया था जो 19 वर्षीय अमरीकी किशोरी की ट्वीटिंग शैली की तरह बातचीत करने में सक्षम थी। इसने लाखों ऑनलाइन ट्विटर यूज़र्स से ट्वीट करना भी सीखा था। महिलाओं को जिन रूपों में यहां दिखाने का चलन बन गया है, उस अवधारणा का गठन दिन पर दिन हमारे पितृसत्तात्मक समाज में होता है। यह ध्यान देने वाली बात है कि एआई के क्षेत्र में पुरुष वर्चस्व होने के कारण जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता और इंसानों की तरह दिखने या काम करने के लिए बनाए जाने वाले रोबोट तैयार किए जाते हैं, तो मशीनें पारंपरिक रूप से महिलाओं द्वारा किए जाने वाले काम का ही प्रदर्शन करती हैं। मसलन कई रोबोट को हाउस हेल्प, व्यक्तिगत सहायकों, होटल की वेट्रेस या संग्रहालय की गाइड के रूप में कार्य करने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं।

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इस अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर यूनेस्को और वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम ने गर्ल ट्रबल: ब्रेकिंग थ्रू द बायस इन एआई’ के नाम से एक सम्मेलन किया जिसमें इस बात पर चिंता व्यक्त की गई कि आज एआई की दुनिया में महिला एआई विशेषज्ञ खोजने के बावजूद मिल नहीं रही हैं। एआई और डेटा साइंस की नौकरी के लिए नियुक्ति करने वाली कंपनियां बताती हैं कि उन्हें मिलने वाले आवेदनों में से एक फीसद से भी कम महिलाओं के आवेदन होते हैं। यूनेस्को के अनुसार पुरुषों के तुलना में महिलाओं और लड़कियों को कंप्यूटर को प्रोग्राम करने के बारे में जानने की संभावना 4 गुना कम है। महिलाओं का प्रौद्योगिकी में पेटेंट के लिए आवेदन करने की संभावना पुरुषों के तुलना में 13 फीसद कम है। वैश्विक स्तर पर महिलाओं का टेक कंपनियों में नेतृत्व के पदों पर बने रहने की संभावना भी कम है। एआई किसी भी बौद्धिक कार्य के लिए उपयोगी हो सकता है। एआई का प्रयोग स्वायत्त वाहन जैसे ड्रोन या सेल्फ-ड्राइविंग कार, मेडिकल डायग्नोसिस, गणित के थिऑरम साबित करना, शतरंज खेलना, गूगल सर्च जैसे सर्च इंजन, सिरी जैसे ऑनलाइन सहायक और चेहरे की पहचान जैसे कार्यों में हो सकता है। आज एआई तस्वीरों की पहचान, स्पैम फ़िल्टरिंग, हवाई उड़ान की देरी की भविष्यवाणी, ऑनलाइन विज्ञापनों को लक्षित करने जैसे कामों में मददगार साबित हो रहा है। हालांकि एआई के संभावित खतरे भी हैं जिनपर चर्चा होती आई है।

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यह पितृसत्तात्मक समाज की विडंबना ही है कि समाज के लिए महिलाओं का एआई से जुड़ा होना सिर्फ कल्पनात्मक ही होते हैं। उदाहरण के लिए, अंग्रेज़ी फिल्म ‘Her’ में एक कृत्रिम बुद्धिमान ऑपरेटिंग सिस्टम सैमंथा को दिखाया जाता है। फिल्म में इसे अभिनेत्रियों के लिए मौजूदा छवि जैसे आकर्षक या सुंदर दिखने के प्रतिमान को पूरा करने के लिए इसे अभिनेत्री स्कारलेट जोहानसन की मनमोहक आवाज में प्रस्तुत किया गया था। इसके विपरीत उसके मालिक की भूमिका में अभिनेता जोआक्विन फीनिक्स को आखिरकार इस रोबोट से प्यार हो जाता है। यूनेस्को के कई आलोचक एआई पर पक्षपाती डेटा-सेट से चलने के आरोप पर ज़ोर दे रही है। आलोचकों का मानना है कि इस प्रवृत्ति से हमारे समाज की मौजूदा महिला-विरोधी पूर्वाग्रह और बढ़ रहे हैं। साथ ही एआई में महिलाओं के लिए यह रूढ़िवादी मानसिकता उन्हीं के खिलाफ़ कट्टरपंथी को और पुख्ता कर रही है।

यूनेस्को के अनुसार विश्व स्तर पर केवल 22 फीसद महिलाएं एआई के क्षेत्र में नौकरियां कर रही हैं। लोग अपने स्वयं के पूर्वाग्रह के चश्मे से इन एआई यंत्रों या व्यक्तित्वों को देखते हैं। चूंकि ये रूढ़िवादिता समाज के किसी एक वर्ग या लिंग तक सीमित नहीं, इसलिए चाहे सेवा भूमिका हो, किसी साथी या सहायक की भूमिका हो या सिर्फ आवाज़ की बुनियाद पर विश्वास की भावना को कायम करने की बात हो, उपभोक्ताओं के लिए एआई के किसी महिला स्वरूप या व्यक्तित्व को अपनाना ज्यादा आसान होता है। एआई को मुख्यधारा से जोड़कर लोकप्रिय और आम जीवन का हिस्सा बनाने का उद्देश्य रखने वाली टेक कॉम्पनियों को इस समस्या से कोई आपत्ति नहीं होती। यूनेस्को की साल 2019 की रिपोर्ट ‘आई वुड ब्लश इफ आई कुड: क्लोज़िंग जेन्डर दिवाइड्स इन डिजिटल स्किल्स थ्रू एजुकेशन’ बताती है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस स्पष्ट रूप से लैंगिक पक्षपात करती है। रिपोर्ट में यह बताया गया कि एआई डेटा सेट और विशेष कर प्रशिक्षण के लिए प्रयुक्त किए जाने वाले डेटा सेट लैंगिक रूढ़िवाद पर आधारित होते हैं। रिपोर्ट इस बात पर जोर देती है कि एल्गोरिदम और उपकरणों में हानिकारक लैंगिक रूढ़ियों को फैलाने और उन्हें मजबूत करने की क्षमता है। ये लैंगिक पक्षपात वैश्विक स्तर पर महिलाओं को हाशिए पर जीने का खतरा पैदा करती हैं।

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आज एआई की बढ़ती लोकप्रियता के कारण इस तरह के पूर्वाग्रह महिलाओं को आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक जीवन के क्षेत्रों में भी पीछे छोड़ सकती है। एआई में व्याप्त लैंगिक रूढ़िवाद किस तरह नकारात्मक परिणाम दे सकते हैं, इस बात की गहराई को मैं अपने जीवन की एक घटना से समझाना चाहूंगी। बांग्ला भाषा में क्रिया का प्रयोग बिना ‘लिंग’ को दर्शाये किया जा सकता है। जब कुछ बांग्ला वाक्यों को मैंने गूगल ट्रांसलेशन में अनुवाद किया तो, वहां महिलाओं के लिए निर्धारित रूढ़िवाद के अनुसार ही परिणाम दिए। जैसे, बांग्ला में ‘शे सुनदोर’ को ‘She is beautiful’, ‘शे रोजगार कोरे’ को ‘He earns’, ‘शे रान्ना कॉरे’ को ‘She is cooking’, ‘शे गारी चालाए’ को ‘He is driving’। इसी तरह अन्य वाक्यों में अनुवाद का परिणाम भी एआई में मौजूद अवधारणाओं पर आधारित मिला। गूगल जैसे विश्वसनीय सर्च इंजन पर करोड़ों लोग निर्भर करते हैं। ऐसे में, इस तरह के परिणाम किसी भी साधारण व्यक्ति के संकीर्ण सोच का कारण बन सकती है।     

आज विज्ञान तेजी से प्रगति कर रहा है। आने वाले दिनों में भारत में एआई का प्रयोग सुरक्षा, उत्पाद, चिकित्सा से लेकर आम जीवन में और अधिक होने की संभावना है। इस पूर्वाग्रह का अधिक प्रचलित होने का एक अहम कारण विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित (स्टेम) से संबंधित क्षेत्रों में महिलाओं का कम प्रतिनिधित्व है। वर्ल्ड इकनॉमिक फोरम के अनुसार दुनिया भर के शोधकर्ताओं में औसतन महज 30 फीसद महिलाएं हैं। विश्व में पुरुषों की तुलना में एक तिहाई से भी कम छात्रा गणित और इंजीनियरिंग जैसे विषयों में उच्च शिक्षा प्राप्त करती हैं। जहां 49.8 फीसद पुरुष स्टेम में स्नातक कर इस क्षेत्र में नौकरी कर रहे हैं, वहीं सिर्फ 12.4 फीसद महिलाएं इस क्षेत्र में स्नातक कर नौकरियां कर रही हैं। स्टेम के क्षेत्रों में काम करने वाली महिलाओं को अकसर कम ख्याति प्राप्त होती है। साथ ही, समान काम के लिए पुरुषों के तुलना में कम वेतन प्राप्त करती हैं। सतत विकास लक्ष्यों तक पहुंचने के लिए किसी भी देश का विज्ञान के क्षेत्र में लैंगिक समानता के चुनौती को पार करना महत्वपूर्ण है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में महिलाओं और लड़कियों को तकनीकी क्षेत्रों में अध्ययन और काम के बढ़ावे के लिए की गए प्रयासों के बावजूद इस क्षेत्र में आज भी महिलाओं की सहभागिता बहुत कम है। आज आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की दुनिया में मौजूद महिलाओं के लिए पूर्वाग्रहों को दूर करने की ज़रूरत है ताकि इसके अंतर्गत बनाए जाने वाली मशीनें, रोबॉट्स और डेटा सेट भी रूढ़िवादी सोच से मुक्त हो। विज्ञान पर निर्भर होते इस दुनिया में वैश्विक स्तर पर तकनीकी भूमिका और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में महिलाओं का नेतृत्व परम आवश्यक है।

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तस्वीर साभार : Female Entrepreneurs

कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज से हिंदी में बी ए और पंजाब टेक्निकल यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की पढ़ाई करने के बाद बतौर पत्रकार और शिक्षिका मैंने लम्बे समय तक काम किया है। बिहार और बंगाल के विभिन्न क्षेत्र में पले-बढ़े होने के कारण सामाजिक रूढ़िवाद, धार्मिक कट्टरपन्त, अंधविश्वास, लैंगिक और शैक्षिक असमानता जैसे कई मुद्दों को बारीकी से जान पायी हूँ। समावेशी नारीवादी विचारधारा की समर्थक, लैंगिक एवं शैक्षिक समानता ऐसे मुद्दें हैं जिनके लिए मैं निरंतर प्रयासरत हूँ।

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