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सिमोन डी बोउवार की किताब ‘द सेकेंड सेक्स’ के अंग्रेज़ी अनुवाद का इंट्रोडक्शन नोट लिखते हुए जूडिथ थ्रूमैन ने लिखा था “उस अक्टूबर, मेरी एक रिश्तेदार जो बोउवार की समकालीन थी मुझसे मिलने अस्पताल आई। मैं एक दिन की थी, उन्होंने मेरे झूले पर लगे टैग पर पढ़ा, “लड़की हुई है!” अगले झूले में एक और नवजात शिशु था जिसके टैग पर लिखा था, “लड़का हुआ है।” वहां हम लेटे थे, स्त्री के वस्तु होने और पुरुष के उपभोक्ता होने की सीमारेखा से दूर, जो हमारा भविष्य गढ़ने वाला था।” जेंडर शब्द सामाजिक ढांचे में पैदा होता। वहीं से जन्म लेता है ‘जेंडर रोल’। जेंडर रोल मतलब एक समाज की तय की गई मर्द और औरत की परिभाषा और भूमिका। हर समाज के इन तय किए गए पैमाने थोड़े-बहुत अलग हो सकते हैं हो लेकिन इन पैमानों को हमेशा बनाए रखने में समाज की भूमिका हर जगह मौजूद है। जेंडर रोल कैसे काम करता है इसे व्यवहारिक स्तर पर समझने के लिए थ्रूमैन का लिखा देखिए। वह कहती हैं कि जन्म के समय दो बच्चों को नहीं पता होता है कि उनके शरीर के आधार पर जिस लिंग में उनका जन्म हुआ उस वज़ह से समाज उन्हें क्या सुविधाएं देगा या कौन सी नहीं देगा।

किसी भी समाज में लड़के और लड़की को अलग तरह से परवरिश और सुविधाएं दी जाती हैं। खाना पकाना, घर की सफाई, कढ़ाई-बुनाई का काम, लड़की के हिस्से आता है। लड़की को गृहणी बनने की ट्रेनिंग देना परिवार अपना फ़र्ज़ मानता है। विवाहित औरतों से गलती होने जाने पर उन्हें दिए जाने वाले ताने जैसे “घरवालों ने नहीं सिखाया” इसी सोच से निकला मुहावरा है जिसका इस्तेमाल एक सामान्य व्यवहार है। ज़्यादातर अरेंज़्ड शादियों के समय लड़कियों के संदर्भ में रखे गए सवाल इस बात पर आधारित होते हैं कि क्या वह लड़की समाज के तय पैमाने पर खरी उतरती है या नहीं। आर्थिक रूप से स्वतंत्र लड़कियां इस मामले में अपवाद के तौर पर नहीं देखी जा सकती। उन्हें आर्थिक फैसले लेने की थोड़ी स्वतंत्रता भले मिल जाए लेकिन अपनी जेंडर आधारित भूमिकाओं से वे पूरी तरह बच निकलने में रोज़ उसी तरह संघर्षरत होती हैं जैसे अन्य लड़कियां।

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औरतों के साथ कुछ विशेषणों का जुड़ना जैसे, लड़कियां सफ़ाई पसंद होती हैं, लड़कियों में सहनशीलता ज्यादा होती है, औरत का अस्तित्व मातृत्व के एहसास के बाद ही पूरा होता है, जेंडर रोल से ही आती हैं। पुरुषों की बात करें तो उनपर भी यह मानसिकता उसी तरह थोपी गई है जैसे औरतों के ऊपर। किसी लड़के के सजने-संवरने, मेकअप करने की इच्छा रखने, स्वभाव से नर्मदिल होने को औरत जैसा होना कहा जाता है।  हाल ही में वरुण ग्रोवर ने अपने इंस्टाग्राम स्टोरी पर तस्वीर डाली जिसमें उन्होंने नेलपॉलिश लगा रखी थी और लिखा था,“क्यों नेल पेंट पूछने वालों को मेरा बड़ा साधारण सा जवाब, क्योंकि नेल पेंट लगाने के बाद मेरे नाखून बड़े ही सुंदर लगते हैं कम से कम मेहनत में, मैं आश्चर्यचकित हूं कि ज्यादा से ज्यादा लोग इसे क्यों नहीं लगाते…. मैं हैरान हूं कि नाखून रंगने जैसे मामूली काम को आप जेंडर से जोड़कर कैसे देख सकते हैं।” वरुण ने एक बार अपने नेलपॉलिश लगे नाखूनों की तस्वीर ट्वीट करते हुए एक लड़के का समर्थन किया था जिसे सोशल मीडिया पर लिपस्टिक लगाकर तस्वीर डालने की वजह से ट्रोल किया जा रहा था। 

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जेंडर शब्द सामाजिक ढांचे में पैदा होता। वहीं से जन्म लेता है ‘जेंडर रोल’। जेंडर रोल मतलब एक समाज की तय की गई मर्द और औरत की परिभाषा और भूमिका।

अपने आप को सुंदर रखना, अपने पसंद के रंग,कपड़े मेकअप पहनना सिर्फ़ औरतों के हिस्से नहीं है। कोई भी व्यक्ति ऐसा कर सकता है। उसकी जेंडर आइडेंटिटी चाहे कुछ भी हो। आर बाल्की द्वारा निर्देशित फ़िल्म ‘की और का’ की कहानी देखें तो अर्जुन कपूर के पात्र को हाउस हसबेंड बनना होता है, यानि पत्नी कामकाजी हो और पति घर संभाले। ऐसा होना जेंडर रोल को चुनौती देना है क्योंकि घर में पैसे लाने का भार पुरुषों पर डाला जाता है, औरतों को घर के बाहर काम करने देने की आज़ादी सामान्य बात नहीं है। किसी क्लास में अगर यह आज़ादी दी जाती है तो वह बहुत सारी शर्तों के साथ आती है। मर्द का नौकरीपेशा न होना समाज की नज़र में उसे कमतर मर्द बनाता है। जबकि औरतों को काम करने की इजाज़त देकर समाज का एक हिस्सा ख़ुद को प्रगतिशील मान इतराता है।

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भाषा के स्तर पर देखें तो जेंडर रोल बड़े व्यापक ढंग से वहां मौजूद है। “लड़कियों की तरह रोना”,”औरतों चुगलखोर होती हैं” “मर्द को दर्द नहीं होता”, “मर्द बनो” जैसे मुहावरे दिखने में हानिकारक हो सकता है ना लगें, ये समाज की सोच का आईना हैं। छोटे लड़कों को शारीरिक मजबूती और हिंसक खेल ऑनलाइन या ऑफ़लाइन खेलने को प्रेरित किया जाता है। उसकी इच्छा न भी हो तो उससे मर्द बनने के परिभाषा की दुहाई देकर उस तरफ धकेलने की कोशिश होती है। लड़कियों को गुड़िया, घर-घर खेलने की तरफ़ रूचि रखने को सिखाया जाता है, कई बार यह सब वे अपने आसपास देखकर ख़ुद उसी खांचे में ढलने की कोशिश करने लग लाते हैं।

खाना पकाना, सफ़ाई, सजना, गाड़ी चलाना, कपड़ों का चुनाव जैसी बातें व्यक्ति की निज़ी दिलचस्पी और लाइफ़-स्किल्स सीखने का विषय हैं। इन्हें किसी जेंडर से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। भावनाएं जैसे रोना, हंसना, गुस्सा करना सभी इंसान में एक तरह से मौजूद होते हैं। सामाजिक परिवेश हमें एक तरह की भावनाओं को छिपाने और एक तरह की भावनाओं को ज़ाहिर करने का स्पेस जेंडर के आधार पर देता है। अब जबकि हम जेंडर फ्लूइड जैसी जेंडर आइडेंटिटी की बात करते हैं, यानी कि व्यक्ति दिमाग़ और मन से खुद को कभी पुरुष होने के क़रीब पाता है, कभी स्त्री, कभी दोनों, या कभी दोनों नहीं, ऐसे में जेंडर रोल के रूढ़िवादी समाजिक तरीक़े को तोड़े बिना जेंडर, सेक्स, जेंडर आइडेंटिटी पर चर्चा अधूरी प्रतीत होती है।

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तस्वीर साभार : bread.org

मेरा नाम ऐश्वर्य अमृत विजय राज है, मिरांडा हाउस से 2021 में दर्शनशास्त्र से स्नातक है। जन्म और शुरुआती पढ़ाई लिखाई बिहार में हुई। इसलिए बिहार के कस्बों और गांव का अनुभव रहा है। दिल्ली आने के बाद समझ आया कि महानगर से मेरे लोग मीलों नहीं बल्कि सालों पीछे हैं। नारीवाद को ख़ासकर भारतीय संदर्भ में उसकी बारीकियों के साथ थ्योरी में और ज़मीनी स्तर पर समझना, जाति और वर्ग के दख़ल के साथ समझना व्यक्तिगत रुचि और संघर्ष दोनों ही है। मुझे आसपास की घटनाएं डॉक्यूमेंट करना पसंद है, कविताओं या विज़ुअल के माध्यम से। लेकिन कभी कभी/हमेशा लगता है "I am too tired to exist".

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