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ईपुर गांव के पास एक छोटे से क़स्बे में रहने वाले मोहन (बदला हुआ नाम) जब मज़दूरी करके घर वापस लौटे तो अचानक से उन्हें दिल का दौरा पड़ा और उनकी मौत हो गई। क़रीब तीस साल के मोहन के तीन छोटे बच्चे है। मोहन की पत्नी ने बताया कि उनको हल्की सर्दी और बुख़ार था और फिर अचानक से उन्हें दिल का दौरा पड़ गया। मोहन की कोरोना जांच नहीं करवायी गई थी क्योंकि इस मौसम में बढ़ते सर्दी-जुकाम को गांव में अभी भी सामान्य मानकर नज़रंदाज़ किया जा रहा। यह सिर्फ़ एक घटना नहीं है, गांव में आए दिन इस तरह की मौतों के बारे में सुनने को मिल रहा है। कोरोना की दूसरी लहर के दौरान हुए पंचायती चुनाव के बाद से गांव में स्थिति और भी ख़राब होती जा रही है। गांव में उपलब्ध सीमित दवा दुकानों में बुनियादी दवाएं मिलना भी मुश्किल हो रहा है।

अमिनी गांव की अनीता (बदला हुआ नाम) बताती है, “दीदी हमारे रिश्तेदारों में कई लोगों को कोरोना के लक्षण थे। तीन रिश्तेदार की मौत भी हो गई लेकिन किसी का भी कोरोना टेस्ट नहीं हो पाया, क्योंकि गांव में उस समय कहीं भी कोरोना जांच नहीं हो रही थी। जांच करवाने के लिए हम लोगों को बनारस के एक सरकारी अस्पताल जाना पड़ता, जहां अस्पताल के बाहर ही मरीज़ दम तोड़ रहे थे और ये भी निश्चित नहीं था कि जाने पर जांच हो ही जाएगी। मेरे गांव के एक-दो लोग जांच के लिए गए लेकिन उनकी रिपोर्ट आने दो हफ़्ते से ज़्यादा का समय लग गया।”

गांव के इन हालातों को देखने के बाद हमारी संस्था में भी पंद्रह दिन का अवकाश किया गया, लेकिन घर से हम सभी गांव की महिलाओं और किशोरियों के संपर्क में रहे, जिससे किसी भी तरह की आपातक़ालीन स्थिति में हमलोग उनकी मदद कर सकें और उन तक सही सूचना पहुंचा सकें। इन पंद्रह दिनों में मैंने पचास से अधिक महिलाओं से बात की जो अलग-अलग गांवों से थीं। इस बातचीत में हमने सिर्फ़ सूचना पहुंचाने का ही नहीं बल्कि महिलाओं की कोरोना को लेकर सही समझ विकसित करने के लिए भी काम किया, जिसमें मैंने पाया कि महिलाओं और किशोरियों की जानकारी सोशल मीडिया में कोरोना को लेकर फैली अफ़वाहों से ज़्यादा प्रभावित थी।

ग्रामीण क्षेत्रों में कोरोना की स्थिति काफ़ी उतार-चढ़ाव भरी है। लोगों का मानना है कि जब इस साल पिछली बार की तरह सख़्ती नहीं है क्योंकि संक्रमण उतना ज़्यादा नहीं है, जो उनकी सबसे बड़ी भूल साबित हो रही है।

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अदमा गांव की गीता (बदला हुआ नाम) से जब मैंने कोरोना और इसके लक्षण के बारे में बात की तो उन्होंने कहा, “दीदी कोरोना की सर्दी-खांसी बहुत अलग रहती है। इसमें जब सर्दी होती है तो लगातार सांस फूलती है और शरीर पर चक्कते पड़ने लगते हैं।” मैंने जब उनसे इस जानकारी का माध्यम पूछा तो उन्होंने बोला कि उन्हें ये सब बातें मोबाइल से पता चली है। वहीं, कॉलेज में पढ़ने वाली नेहा (बदला हुआ नाम) से जब मैंने कोरोना होने पर दवाओं के साथ-साथ घरेलू उपायों पर चर्चा की तो उसने बताया, “मैम कोरोना होने पर सुबह-शाम नाक और कान में नींबू का रस डालना चाहिए और चार-पांच बार काढ़ा पीना चाहिए।” गीता की तरह ही नेहा की इस जानकारी का स्रोत भी सोशल मीडिया था।

कोरोना की दूसरी लहर के बाद से जब चारों तरफ़ मौत का कोहराम मचने लगा और मीडिया में ये इसकी खबरें आने लगी तब सरकार ने पंचायती चुनाव के बाद कोरोना की जांच के लिए गांव की तरफ़ रुख़ किया। लेकिन सच्चाई ये है कि सरकार ने काफ़ी देर की है क्योंकि उससे पहले जीयो के तेज नेटवर्क ने हर घर में कोरोना को लेकर भ्रांतियों को फैला दी हैं, जिसे दूर करने में बहुत समय लगने वाला है। ऐसा नहीं है कि गांव में कोरोना को लेकर सौ प्रतिशत भ्रांतियां ही हैं, कुछ लोग हैं जो कोरोना को लेकर काफ़ी जागरूक हैं पर ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम है। ध्यान देने वाली बात ये भी है कि ऐसे लोग ज़्यादातर उच्च तबके के है, जिनकी आर्थिक स्थिति काफ़ी बेहतर है। वहीं गरीब मज़दूर परिवार के हिस्से में बस मोबाइल के ज़रिये फैल रही भ्रांतियां ही हैं।

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गांव में कोरोना के केस बढ़ाने में शादी-ब्याह भी अहम भूमिका निभा रहे है। इन दिनों गांव में ख़ूब शादियां हो रही हैं, जिसके बाद कोरोना के मामले तेज़ी से बढ़ रहे हैं। शादी-ब्याह करने वाले परिवार शादी के दौरान इस गलतफ़हमी में दिखाई पड़ते हैं कि कोरोना सिर्फ़ शहरों में है। इसके बाद शादी में आनेवाले अधिकतर रिश्तेदार अस्पतालों के चक्कर काटने को मजबूर हैं क्योंकि इसबार उत्तर प्रदेश में संपूर्ण लॉकडाउन नहीं है, इसलिए दबे पांव सभी काम ज़ारी हैं। इसबार प्रशासन की चौकसी भी पिछली बार की तरह सख़्त नहीं है, इसके चलते लोग शादी-ब्याह के कार्यक्रम कर रहे हैं। अब गांव में कोरोना टीकाकरण की प्रक्रिया शुरू हो गई है, ऐसे में लोग शादी के बाद सारे परिवार-रिश्तेदार टीका लेने पहुंच रहे हैं और कई बार टीका लेने के बाद कोरोना होने की शिकायत भी कर रहे हैं पर वास्तविकता ये है कि जब वे शादी जैसे भीड़भाड़ वाले में कार्यक्रम में हिस्सा लेकर कोरोना से संक्रमित हो जा रहे हैं। साथ ही टीके को लेकर उनमें ये गलतफहमी भी है कि टीका लेने के बाद उन्हें कोरोना का संक्रमण नहीं हो सकता है।

ग्रामीण क्षेत्रों में कोरोना की स्थिति काफ़ी उतार-चढ़ाव भरी है। लोगों का मानना है कि जब इस साल पिछली बार की तरह सख़्ती नहीं है क्योंकि संक्रमण उतना ज़्यादा नहीं है, जो उनकी सबसे बड़ी भूल साबित हो रही है। हल्के सर्दी-जुकाम के बीच अचानक युवाओं को हार्ट अटैक आ जाना अभी लोगों को सचेत नहीं कर पा रहा है। इसके साथ ही चूंकि लोग अभी भी सर्दी-जुकाम को सामान्य मानकर जांच नहीं करवा रहे है इसलिए कोरोना के आंकड़ों में उनकी गिनती नहीं हो पा रही है और इस तरह कोरोना के संक्रमण को रोकने के लिए बनाई जा रही योजनाएं भी सीधेतौर पर प्रभावित हो रही हैं। ज़मीनी स्तर पर हम कोरोना के संक्रमण को रोकने के लिए लगातार फ़ोन के माध्यम से संपर्क में हैं। हमें मालूम है कि ये बहुत सीमित प्रयास है पर छोटे बदलावों से ही हम किसी बड़े बदलाव की कल्पना कर सकते हैं। इसलिए अपनी इन बातचीत को उजागर कर गांव की स्थिति को उजागर करने का प्रयास भी जारी है, इस उम्मीद के साथ कि प्रशासन उचित नीति के साथ काम करे और लोग इन नीतियों को सरोकार से जोड़ने में सहयोग दें।    

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तस्वीर साभार: Reuters

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