समाजख़बर कोरोना की दूसरी लहर के दौरान उत्तर प्रदेश के एक गांव से मेरा अनुभव

कोरोना की दूसरी लहर के दौरान उत्तर प्रदेश के एक गांव से मेरा अनुभव

सवाल ये है कि गांव का ग़रीब आदमी, जो मेहनत मजदूरी और खेती करके रोटी-मकान-कपड़ा के संघर्ष में उलझा हुआ है, क्या इस 'सिस्टम' में जिंदा रह पाएगा?

दो दिन पहले सुबह उठते ही भाई ने सांस लेने में दिक्कत की शिकायत की। आस-पास रोज़ाना बढ़ते मौत के आंकड़ों के बीच सबने इसे कोरोना का लक्षण माना और घबरा गए। यह डर इसलिए भी बढ़ गया क्योंकि ज़िले के पीएचसी और सीएचसी की स्थितियां, जो सामान्य दिनों में भी बेहद ख़राब रहती हैं, कोरोनाकाल में पूरी तरह बेपटरी हो चुकी हैं। मेरे गांव और पड़ोस के गांवों में कोई सरकारी या प्राइवेट अस्पताल तो दूर, एक मेडिकल स्टोर तक नहीं है। इसलिए किसी भी स्वास्थ्य समस्या का शुरुआती इलाज घरेलू नुस्खे से किया जाता है। इसके बाद मरीज़ों को पास के कस्बे के एक ‘नामी झोला छाप’ डॉक्टर को दिखाया जाता है। यह झोला छाप डॉक्टर क्षेत्र के लोगों की सभी तरह की चिकित्सकीय समस्याओं में काम आता है।

ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसे झोला छाप डॉक्टरों की भरमार होती है। आपने ज़रूर ही बिहार चुनाव के दौरान वेबसाइट द लल्लनटॉप में फीचर्ड ‘झोला छाप’ डॉक्टर का वीडियो देखकर हंसी आई होगी, लेकिन वह वीडियो उत्तर प्रदेश और बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था पर एक अट्टाहास था। इन इलाकों में ऐसे डॉक्टरों की बड़ी संख्या मौजूद है, जो सामान्य दिनों में तो अनुभव या अंदाज़े पर दवा देकर काम चला ले रहे थे, लेकिन कोरोनाकाल में न तो उनके पास पर्याप्त चिकित्सकीय उपकरण उपलब्ध हैं, न ही दवाओं की जानकारी। साथ ही, समय विशेष में मरीज़ की मानसिक स्थिति को कैसे संभालना है, इस मामले में भी उनके पास कोई ‘प्रोफ़ेशनल ट्रेनिंग’ नहीं है, इसलिए वहां जाकर हमें कोई फ़ायदा नहीं हुआ। आनन-फानन में हम लोग ब्लॉक में स्थित प्राइमरी हेल्थ सेंटर गए, लेकिन सुबह 7 बजे के क़रीब वहां कोई मौजूद नहीं था। अंत में हमने जान-पहचान के एक प्राइवेट डॉक्टर को दिखाने की सोची और उसके लिए दो घंटे का सफ़र करके ग़ाज़ीपुर पहुंचे। सोचिए, इन परिस्थितियों के बीच अगर मरीज़ की हालत बहुत गंभीर होती तो क्या होता? क्या उसे बचा पाना संभव होता, शायद नहीं।

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यह कोई पहला केस नहीं है, बल्कि ऐसे न जाने कितने ही केस अलग-अलग जिलों में मौजूद हैं। दरअसल, गांवों में कोरोना के बारे में जागरूकता के अभाव में लोग बचाव नहीं कर रहे हैं और तंत्र की ओर से ज़िम्मेदारीपूर्वक काम न करने के कारण जांच भी नहीं हो रही है, जिसका नतीजा यह है कि लोग लगातार एक-दूसरे के संपर्क में आते जा रहे हैं और संक्रमण फैलने से मौतों के आंकड़ें बढ़ते जा रहे हैं। आलम यह है कि पिछले तीन हफ़्तों में उत्तर प्रदेश में कोविड-19 से मरने वालों का आंकड़ा दोगुना हो चुका है। मेरे अपने क्षेत्र में 21 अप्रैल के बाद से लगभग 10-12 ऐसी मौतें हुई हैं, जिनमें मरने का कारण मालूम नहीं है। जनमानस के मन में ‘अकारण’ होकर दर्ज ये मौतें असल मे कोरोनावायरस की शिकार हैं।

सवाल ये है कि गांव का ग़रीब आदमी, जो मेहनत मजदूरी और खेती करके रोटी-मकान-कपड़ा के संघर्ष में उलझा हुआ है, क्या इस ‘सिस्टम’ में जिंदा रह पाएगा?

बढ़ता संक्रमण और ज़िले में इलाज़ के विकल्प ?

गांवों में संक्रमण फैलने का सबसे बड़ा कारण यहां की जीवनशैली और जागरूकता का अभाव है। दरअसल, जुखाम-बुखार को यहां बहुत हल्के में लिया जाता है और अक्सर देसी दवाइयों या नुस्खों का सहारा लेकर टाल दिया जाता है। इस तरह, कोरोना से शुरुआती लक्षणों को लोग सामान्य जुखाम-बुखार समझते हैं और रोज़मर्रा की प्रक्रिया में लगे रहते हैं। खांसी बढ़ने या सांस की समस्या पर भी झोला छाप डॉक्टरों से सलाह ली जाती है, जो फिलहाल इसे इसे गेहूं के भूसे से जोड़कर देखता है और इस तरह समस्या का सामान्यीकरण कर दिया जाता है।

साथ ही, इन क्षेत्रों के प्राइवेट और सरकारी दोनों की जगहों पर उचित स्वास्थ्य उपकरणों का अभाव है। कुछेक जगहों पर, जहां ये चीजें हैं भी, डॉक्टर उन्हें ढंग से ऑपरेट नहीं कर पा रहे हैं। अपने भाई को ज़िले के प्राइवेट अस्पताल में ले जाने पर जब मैंने ऑक्सिजन जांचने की बात की तो पहले उस डॉक्टर ने मना कर दिया। फ़िर कई बार कहने पर ऑक्सीमीटर निकालकर लगाया गया लेकिन डॉक्टर को ऑक्सीमीटर की रीडिंग देखने ही नहीं आ रही थी। वह पल्स रेट को ऑक्सिजन सैचुरेशन (SPO2) समझ रहा था और रीडिंग देखकर मुझसे कहने लगा, “आप लोग समझते नहीं हैं, देखिए तो, आपके भाई का ऑक्सीजन गंभीर कोविड मरीज़ों से भी कम है, इसीलिए तो चेक नहीं करते हैं हमलोग, ठीकठाक लोग भी चिंता करने लगते हैं।” बाद में, मेडिकल स्टोर पर दवाई लेने जाने पर मैंने विटामिन-सी के बारे में पूछा। चार से पांच मेडिकल स्टोर घूमने पर भी दवाई कहीं नहीं मिली। उस प्राइवेट अस्पताल के बाहर कई मरीज़ थे, जिनकी हालत ख़राब थी, लेकिन फिर भी उनके साथ के लोगों ने न मास्क लगाया था, न ही अपने आप को सैनिटाइज़ कर रहे थे।

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महामारी और वर्ग

किसी भी आपदा का सबसे अधिक प्रभाव कमज़ोर व पिछड़े तबकों पर पड़ता है। ग्रामीण क्षेत्रों में अधिकतर लोग खेती किसानी करके जीवन निर्वाह करते हैं, ऐसे में कोरोना संक्रमित होने पर उनके पास किसी अच्छे डॉक्टर से सलाह लेना, दवाई चला पाना, ऑक्सिजन या वेंटिलेटर का इंतज़ाम करना संभव नहीं है। योगी सरकार भले ही कहती आ रही है कि राज्य में ऑक्सिजन की कमी नहीं है या हालात काबू में हैं, लेकिन असलियत में ऐसा है नहीं। बीती रात मेरे एक रिश्तेदार की मां कोरोना पॉज़िटिव पाई गईं। कम्युनिटी हेल्थ सेंटर में पर्याप्त जगह न होने के कारण उन्हें ज़िला अस्पताल रेफ़र किया गया। ज़िला अस्पताल के डॉक्टरों ने कहा कि उनके पास कुछ घंटों के लिए ही ऑक्सिजन है। इस परिस्थिति में परिवार के लोग बाहर से ऑक्सिजन जुटाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन बाहर इसकी कालाबाज़ारी शुरू हो चुकी है और विक्रेता मुंहमांगी कीमत मांग रहे हैं। 

सवाल ये है कि गांव का ग़रीब आदमी, जो मेहनत मजदूरी और खेती करके रोटी-मकान-कपड़ा के संघर्ष में उलझा हुआ है, क्या इस ‘सिस्टम’ में जिंदा रह पाएगा? दवाइयों से लेकर इंजेक्शन तक, सबकी कमी पाई जा रही है। मेडिकल स्टोर पर ऑक्सीमीटर जैसे ज़रूरी उपकरण मौजूद नहीं हैं। ट्रांसपोर्ट की कमी और खर्चे के कारण लोग मरीज़ को मोटर-साइकिल पर बैठा कर ले जा रहे हैं। अभी तक जो महाविध्वंस शहरों में था, अब गांवों तक पहुंच चुका है लेकिन यहां लोग बिना दर्ज हुए मरते जा रहे हैं। अमीर आदमी एक लाख की ऑक्सीजन खरीद कर अपनी जान बचा सकता है, लेकिन जो जीवनभर वित्तीय अस्थिरता में रहा हो, वे क्या करें, इसका जवाब किसी के पास नहीं है।

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कोरोना और बढ़ता अंधविश्वास

क्षेत्र में लगातार होती मौतें लोगों को कोरोना वायरस के प्रति सचेत करने से अधिक उन्हें डरा रही हैं, यह डर धार्मिक आधार पर फैल रहा है। मेरे आस-पास के गांवों में औरतें इसे काली और पृथ्वी देवियों का प्रकोप मानकर चल रही हैं। पड़ोस में रहने वाली रीता देवी कहती हैं, “धरती का बोझ बढ़ चुका है और आजकल के अधार्मिकों की हरकतों के कारण देवी नाराज़ हैं।” यह पूछने पर कि वह ऐसा क्यों सोचती हैं, वह अपने पुजारी और देवी की साझी बातचीत का हवाला देती हैं। अंधविश्वास इस कदर बढ़ गया है कि औरतें रोज़ाना काली के मंदिर पर धार चढ़ाती हैं और उनसे प्रार्थना करती हैं। एक ओर जहां ईश्वर के क्रोध को लेकर वे इतनी चिंतित हैं, वहीं दूसरी ओर, किसी भी किस्म के स्वास्थ्य उपाय का प्रयोग करने से बचती हैं। मास्क लगाने को हास्यास्पद समझते हुए औरतें लजाकर मास्क लगाने वालों का मज़ाक उड़ाती हैं। 

इस गम्भीर समय में पुजारी, सिस्टम और सरकारों के इस खेल को समझना जरूरी है क्योंकि प्रार्थना-पूजा का रोज़गार लगातार चल रहा है, पुजारी आसानी से औरतों को देवी को मनाने की प्रक्रिया के लिए ‘कन्विंस’ कर ले रहा है लेकिन मौतों का बढ़ता यह आंकड़ा भी ‘मास्क’ लगाने के लिए उन्हें तैयार नहीं कर पाता। प्रदेश की योगी सरकार 2022 के विधानसभा चुनावों के लिए जाग चुकी है, गायों के लिए थर्मल स्कैनर और ऑक्सीमीटर लगाया जा रहा है। लोगों के लिए केवल भाषण हैं, जो लगातार टीवी पर आकर ‘सब काबू में है’ कहकर प्रेषित किया जा रहा है। सोशल मीडिया पर ऑक्सीजन की मांग करने वालों और उपलब्ध कराने वालों को यहां अपराध घोषित किया जा चुका है, लेकिन धांधली और कालाबाज़ारी पर कोई रोक नहीं है।अभी भी प्रशासन उसी ढीलढाल के साथ चल रहा है और वो दिन दूर नहीं जब यहां भी सामूहिक लाशों के ढेर बनकर तैयार होंगे लेकिन उन्हें दर्ज नहीं किया जा सकेगा, वे सब भी ‘अकारण’ होंगे।

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तस्वीर साभार : Reuters

About the author(s)

मेरा नाम गायत्री है. आजकल मैं हिन्दी-साहित्य पढ़ने की कोशिश में लगी हूँ. मेरा गाँव उत्तर-प्रदेश के पूर्वांचल क्षेत्र में पड़ता है. खाली समय में गाय चराना और चाय पीना मुझे पसंद है. यहाँ दर्ज लेख मेरे सामने घट रही घटनाओं के प्रतिबिम्ब हो सकते हैं.

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