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विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा कोरोना को महामारी घोषित किए हुए अब एक साल से अधिक हो चुका है। भारत में कोरोना की दूसरी लहर ना सिर्फ जानें ले रही है बल्कि इसकी भयावह स्थिति लोगों की कार्य क्षमता, आय, रोज़गार और आने वाले दिनों में स्वस्थ और सुखद रहने के आसार को भी खतरे में डाल रही है। पूरी दुनिया में कोई भी देश अब तक कोविड-19 को पूरी तरह ठीक करने के किसी भी निश्चित उपाय का दावा नहीं कर पाई है। लेकिन इस कठिन परिस्थिति में भी भारत दुनिया का एक ऐसा अनोखा देश है जहां लगातार अलग-अलग माध्यमों से न सिर्फ विज्ञापन निर्माताओं बल्कि धार्मिक गुरुओं, नेताओं और कलाकारों द्वारा कोरोना को खत्म करने या रोकने के ‘रामबाण’ तरीके बताए जा रहे हैं। विश्व कोविड-19 से सुरक्षा और उसके इलाज के लिए भले वैज्ञानिक नजरिया अपना रही हो, भारत में आम जनता ही नहीं खुद सरकार भी इस अनसुना, अनदेखा वायरस से लड़ने के लिए अवैज्ञानिक रूढ़िवादी तरीके सुझाती नजर आ रही है।

इस मार्च जब महामारी दोबारा बढ़ने लगी, विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग ने ऋषिकेश स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में कोविड-19 रोगियों के एक समूह में उनके ठीक होने में गायत्री मंत्र का जाप और प्राणायाम योग अभ्यास की गुणवत्ता को जांचने के लिए फंड दिया। बता दें कि यह चिकित्सीय परीक्षण औपचारिक रूप से भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद में भी पंजीकृत किया गया था जो मानव परीक्षणों के लिए एक अनिवार्य शर्त है। उधर, हाल ही में उत्तर प्रदेश में बीजेपी के बलिया ज़िले के विधायक सुरेंद्र सिंह ने कोविड-19 से लड़ने के लिए लोगों से ‘गौमूत्र’ पीने का आह्वान किया। उन्होंने गौमूत्र पीते हुए अपना एक वीडियो जारी किया था जिसमें उन्होंने दावा किया कि सिर्फ कोरोना ही नहीं बल्कि इससे खतरनाक महामारी को भी गौमूत्र से खत्म किया जा सकता है। बीते दिनों भोपाल से बीजेपी सांसद प्रज्ञा ठाकुर ने भी कोविड-19 को हराने में गौमूत्र पीने की बात की। उन्होंने खुद के स्वस्थ रहने के पीछे गौमूत्र पीने का मंत्र बताया और दूसरों से भी इस बात की अपील की। याद दिला दें कि कोरोना के कठिन परिस्थिति में इन्हें जमीनी तौर पर कार्यरत ना देखकर पिछले और इस साल भी उनके लापता होने के पोस्टर शहर में कई जगह दिखाई दिए थे। प्रज्ञा खुद स्तन कैंसर से पीड़ित थीं और कैंसर दोबारा न हो इसके लिए उन्हें बाइलैटरल मास्टक्टोमी करवानी पड़ी। बीते दिनों उनकी तबीयत हो गई थी और उन्हें एयरलिफ्ट कर मुंबई के अस्पताल में इलाज के लिए लाया गया था।

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गाय, गौमूत्र या हिन्दू धर्म से जुड़ी मान्यताओं के अचानक महत्व बढ़ जाने में कोई चमत्कार नहीं है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज महामारी के दौरान भी गाय, गौमूत्र या हिन्दू धर्म से जुड़ी मान्यताओं जैसे अभ्यासों की बात हो रही है।पिछले कई सालों से केंद्र सरकार की नीतियां, घटनाओं और बीजेपी नेताओं के गैर-जिम्मेदार बयानों का लेखाजोखा किया जाए, तो यह समझने में कोई मुश्किल नहीं होती कि क्यों आज महामारी के दौरान भी विज्ञान की नहीं, धार्मिक ज्ञान और ऐसे अभ्यासों की बात हो रही है। हालांकि चिकित्सा के नाम पर अंधविश्वास भी भारत में कोई नई बात नहीं लेकिन महामारी के बीच सोशल मीडिया में कहीं गर्म पानी या काढ़ा पीने मात्र से, तो कहीं भाप लेने से कोरोना को खत्म करने या कोरोना संक्रमण से बच पाने का दावा किया जाना ना सिर्फ लोगों के लिए घातक सिद्ध हो सकता है बल्कि मानवता का विज्ञान और विकास से नाता टूटने में अहम भूमिका निभा सकता है। खुद आयुष मंत्रालय भी अपनी वेबसाईट पर सुखी खांसी या गले की खराश तक के लिए ऐसे कई नुस्खे सुझा रही है।

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गाय, गौमूत्र या हिन्दू धर्म से जुड़ी मान्यताओं के अचानक महत्व बढ़ जाने में कोई चमत्कार नहीं है। पिछले कई सालों से केंद्र सरकार की नीतियां, घटनाओं और बीजेपी नेताओं के गैरजिम्मेदार बयानों का लेखाजोखा किया जाए, तो यह समझने में कोई मुश्किल नहीं होती कि क्यों आज महामारी के दौरान भी विज्ञान की नहीं, धार्मिक ज्ञान और ऐसे अभ्यासों की बात हो रही है।

पिछले दिनों इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डॉ नवजोत सिंह दहिया ने बाबा रामदेव और उनके सहयोगी आचार्य बालकृष्ण के खिलाफ़ कोविड-19 रोगियों के इलाज बारे में कथित रूप से घबराहट पैदा करने के लिए शिकायत दर्ज की। डॉ.दहिया ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया कि बाबा रामदेव लोगों को डॉक्टरों से इलाज नहीं कराने और उनके लिए अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल कर, जानबूझकर कोविड-19 से प्रभावित रोगियों के इलाज के दिशा-निर्देश का उल्लंघन कर रहे हैं। ऐसी ही एक और घटना में गुजरात फूड एंड ड्रग रेगुलेटर ने राजकोट के आयुर्वेदिक दवा निर्माता, शुक्ला अशर इम्पेक्स प्राइवेट लिमिटेड द्वारा उत्पादित कोविड-19 के इलाज के भ्रामक दावों के लिए शोकॉज़ नोटिस जारी किया था।

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पिछले साल रामदेव की कंपनी पतंजलि ने कोरोनो वायरस का इलाज करने का दावा किया था। रामदेव ने पतंजलि मुख्यालय में कोरोनो संक्रमण को ठीक करने वाली पहली आयुर्वेदिक दवा ‘कोरोनिल’ निकाली थी। उन्होंने यह भी कहा कि हालांकि अब तक दुनिया भर के वैज्ञानिक समुदाय इस संक्रामक बीमारी के प्रभावी इलाज को ढूंढने और विकसित करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, आयुर्वेद ने उसका हल निकाल लिया है। हैरानी की बात तो यह थी कि केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ हर्ष वर्धन खुद रामदेव के कोरोनिल के प्रक्षेपण में शामिल हुए थे।

कोरोनिल के लॉन्च के दौरान रामदेव, केंद्रीय मंत्री डॉय हर्षवर्धन और नितिन गडकरी

पतंजलि द्वारा कोरोनिल को मंजूरी दिए जाने के दावों के बीच विश्व स्वास्थ्य संगठन ने यह स्पष्ट किया है कि उसने कोरोनो वायरस बीमारी के इलाज के लिए किसी भी पारंपरिक दवा को मंजूरी नहीं दी है। लेकिन पिछले दिनों केंद्रीय शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक के आधिकारिक ट्विटर अकाउंट से रामदेव के इस तथाकथित कोरोना के इलाज की दवाई ‘कोरोनिल’ को हरिद्वार के कोरोना रोगियों को मुहैया कराने तक की बात कर चुके हैं और मरीजों के लिए कोरोनिल उपलब्ध कराने के लिए उन्हें धन्यवाद कर चुके हैं। द प्रिन्ट में छपी एक रिपोर्ट अनुसार उत्तराखंड के आयुर्वेद विभाग ने खुलासा किया कि पतंजलि के लाइसेंस के लिए कोरोना वायरस का उल्लेख नहीं किया गया था। इसके बाद महाराष्ट्र और राजस्थान सरकार ने पतंजलि का आयुष मंत्रालय से मंजूरी नहीं लेने का संज्ञान लेते हुए इसे विज्ञापन दिखाने या कोरोनिल बेचने के खिलाफ स्पष्ट चेतावनी दी गई।

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पिछले दिनों अहमदाबाद में कुछ लोगों द्वारा गाय के गोबर से स्नान और उसी अवस्था में योग करने के एक वीडियो सामने आया जबकि गोबर से कोरोना वायरस ठीक होने या न होने से जुड़ा कोई वैज्ञानिक प्रमाण दूर-दूर तक मौजूद नहीं है। हाल में, मेरठ के बीजेपी नेता गोपाल शर्मा शंख बजाते और ‘पवित्र धुंआ’ लिए रिक्शा पर रास्तों में घूमते नजर आए। उन्होंने दावा किया कि पवित्र धुआं हवा में फैले वायरस को रोकेगा और उन्हें वातावरण में ही मार देगा। उन्होंने कहा कि उस पवित्र धुआं से हवा में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ेगी और बदले में लोगों को कोरोना से ठीक होने में मदद मिलेगी। वहीं मध्य प्रदेश की संस्कृति मंत्री उषा ठाकुर ने कोविड-19 की तीसरी लहर को रोकने के लिए ‘यज्ञ’ आयोजित करने का सुझाव दिया। इतना ही नहीं, केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने तो पिछले वर्ष यह तक दावा किया था कि ‘भाभीजी पापड़’ खाने से कोरोना वायरस से लड़ने के लिए एंटीबॉडी बनाने में मदद मिलेगी। पिछले दिनों बीजेपी नेता और पूर्व मुख्य मंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने यहाँ तक कह डाला कि वायरस एक जीवित प्राणी है। इसलिए उसे भी जीने का अधिकार है।  

गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश में महामारी के बीच भी योगी सरकार हर जिले में गायों की सुरक्षा के लिए हेल्प डेस्क स्थापित करने के निर्देश जारी किए। साथ ही सभी गौशालाओं में कोविड-19 प्रोटोकॉल का सख्ती से पालन करने, मास्क पहनने और थर्मल स्क्रीनिंग का उपयोग अनिवार्य कर दिया गया है। एक ओर ऐसे निर्णय और दूसरी ओर राज्य के आम जनता और अस्पतालों के किसी भी प्रकार के चिकित्सा के लिए जरूरतों की कमी बताने पर सरकार द्वारा रोक, जनता की त्रासदी को बढ़ाना ही नहीं बल्कि मानवाधिकार से वंचित करना है। इस बीच सरकार के साथ मिलकर काम कर रहे 200 से अधिक वैज्ञानिकों ने प्रधानमंत्री को आईसीएमआर के कोविड-19 डेटा तक उनके व्यापक पहुंच के लिए अनुरोध कर चुके हैं। मौजूदा हालात को ध्यान में रखते हुए, वैज्ञानिकों ने नए वेरिएंट के लिए बड़े पैमाने पर जीनोमिक निगरानी पर व्यवस्थित संग्रह और समय पर डेटा जारी करने की आवश्यकता पर जोर दिया। असहाय स्थिति में आम जनता का किसी चमत्कार का इंतज़ार करना या अत्यधिक धार्मिक प्रवृत्ति दिखाने के पीछे अक्सर अपने प्रियजनों को खो देने का डर काम करता है। ऐसे में सत्ता या समाज के प्रभावशाली व्यक्तियों का यह दायित्व है कि वे विज्ञान की बातें करें, अंधविश्वास की नहीं। दुआओं के आधार पर भले बॉलीवुड फिल्मों में हीरो बच जाता हो, लेकिन विज्ञान के बुनियाद पर आगे बढ़ती दुनिया में डॉक्टर्स लोगों को ऐसी बातों से दूर रहने की सलाह देते हैं।

पिछले साल देश में कई जगह अचानक कोरोना देवी की पूजा की खबर सामने आई थी। आज बाज़ार में एंटी वायरस दावे के साथ एयर-प्यूरिफायर, कीटाणुनाशक पेंट, फल और सब्जी साफ करने वाले रसायन से लेकर नाक के अंदरूनी भाग को धोने तक की दवा निकल गई है। रोग प्रतिरोधक शक्ति बढ़ाने के नाम पर हर तरह की जड़ी-बूटी वाले सामान बिक रहे हैं। अकसर दिशाहीन अवस्था में चिंता और अनिश्चितता के बीच खरीददार को सामान की विशुद्धता या गुणवत्ता परखने की बात याद नहीं रहती। यह गौर करने वाली बात है कि दुनिया के ऐसे विकसित देश जहां लोगों को आज बिना मास्क के बाहर जाने की इजाजत दी जा रही है, वहां महामारी पर सही रणनीति, चिकित्सा और वैक्सीन से काबू पाई गई है। सवाल यह भी है कि ऐसी भ्रामक बातों या विज्ञापनों पर विश्वास करती आम जनता को सरकार एक साल में भी सही दिशा क्यों नहीं दे पाई या क्यों विज्ञापन मानक परिषद  कलाकारों द्वारा प्रचारित ऐसे विज्ञापन जनता को दिखाने पर राजी हुई। लगातार डॉक्टरों के अनुरोध और सलाह के बावजूद, महामारी से जूझती जनता को ऐसी चीजों के झांसे में रखना और जागरूकता के नाम पर केवल फोन पर मास्क पहनने या दूरी बनाए रखने की सलाह देना, सरकार की विफलता का एक और प्रमाण है।

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तस्वीर साभार : thewirehindi

कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज से हिंदी में बी ए और पंजाब टेक्निकल यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की पढ़ाई करने के बाद बतौर पत्रकार और शिक्षिका मैंने लम्बे समय तक काम किया है। बिहार और बंगाल के विभिन्न क्षेत्र में पले-बढ़े होने के कारण सामाजिक रूढ़िवाद, धार्मिक कट्टरपन्त, अंधविश्वास, लैंगिक और शैक्षिक असमानता जैसे कई मुद्दों को बारीकी से जान पायी हूँ। समावेशी नारीवादी विचारधारा की समर्थक, लैंगिक एवं शैक्षिक समानता ऐसे मुद्दें हैं जिनके लिए मैं निरंतर प्रयासरत हूँ।

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