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भारतीय समाज में महिला और उनसे जुड़ी परेशानियों को हमेशा से ही अनदेखा किया जाता रहा है। यह पित्तृसत्तात्मक समाज में बिल्कुल सामान्य-सी बात है। हमारे घरों में महिला स्वास्थ्य को कोई खास अहमियत नहीं दी जाती है इस व्यवस्था के कारण खुद महिलाएं भी खुद के स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही दिखाती हैं। बरसों से चली आ रही पितृसत्तात्मक परवरिश के कारण ही है कि एक महिला खुद को कम महत्व देती है। हर माह होने वाले मासिक चक्र यानि पीरियड्स को लेकर समाज में आज भी अनेक प्रकार की भ्रांतियां हैं। आज भी पीरियड्स को एक बीमारी कहा जाता है। खुलकर पीरियड्स की बातें करना अश्लीलता की श्रेणी में ला दिया जाता है। रूढ़िवादी विचारों के कारण घरों में महिला के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार होता है। पीरियड्स के दौरान मंदिर और रसोई में जाने की अनुमति नहीं दी जाती है। उसे ‘अपवित्र’ बताकर अलग-थलग कर दिया जाता है। अंधविश्वास के चलते पीरियड्स के दौरान शारीरिक पीड़ा के साथ और अधिक मानसिक तनाव का भी सामना करना पड़ता है।

कोविड-19 महामारी ने जीवन के हर पहलू को प्रभावित किया है। इसके चलते महिलाओं ने भी अपने स्तर पर अनेक तरह की समस्याओं का सामना किया। अधिक तनाव होने के कारण पीरियड में देरी और लॉकडाउन के कारण पैड्स और अन्य सैनिटरी प्रॉडक्ट्स की उपलब्धता में बाधा का सामना करना पड़ रहा है। बहुत बड़ी संख्या में हमारे देश में लोग अपने पीरियड्स के दौरान पुराना कपड़ा या अन्य उपलब्ध सामान का इस्तेमाल करने के लिए मजबूर हैं। कोरोना महामारी के कारण जो लोग पैड्स का इस्तेमाल कर पाते थे, उन्हें भी इससे वंचित होना पड़ा।

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शहरी क्षेत्र में संसाधनों की उपलब्धता तो फिर भी देर-सवेर हो ही जाती है। गांव-कस्बों में रहने वाली लड़कियों और महिलाओं को इस कारण ज्यादा परेशानी उठानी पड़ रही है। ग्रामीण क्षेत्र में बहुत सी लड़कियां और महिलाएं हैं जो सरकारी स्कूल और स्वयंसेवी संस्थाओं से मिलनेवाले सैनटरी पैड्स पर निर्भर रहती हैं। वहीं, ग्रामीण इलाकों में बहुत से लोग ज़िला या ब्लॉक स्तर पर जाकर बाजार से पैड्स खरीदती हैं। कोरोना की दूसरी लहर के दौरान लागू हुए लॉकडाउन की वजह से स्कूल व साहयता संस्थान की सेवा बंद है। गांव-देहात के क्षेत्र में पहले से ही महिलाएं और लड़कियां घर से बाहर कम निकलती हैं। ऐसे में लॉकडाउन के चलते और यातायात व्यवस्थ्या ठप होने के कारण वे पूरी तरह घरों में बंद रहने पर मजबूर हैं।

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परिवार के पुरुष सदस्यों के सामने खुलकर पीरियड्स पर बात न करने की वजह से भी महिलाएं पैड्स की मांग नहीं कर पाती हैं। शिवानी जिनका गांव उनके ज़िले से महज 5 किलोमीटर की दूरी पर है, परिवहन साधन की सीधी सुविधा न होने कारण सामान्य दिनों में भी उन्हें अपने कॉलेज आने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ती है। आधा रास्ता तय करने के लिए वह अपने परिवार के किसी सदस्य पर निर्भर रहती हैं। उनका कहना है कि पहले लॉकडाउन से अब तक मैं अपने घर से बाहर नहीं निकली हूं। कॉलेज बंद है इस कारण घर वाले किसी और काम के लिए शहर जाने की इजाज़त भी नहीं देते हैं। उन्होंने हमेशा सैनेटरी पैड्स शहर से ही खरीदे हैं। लॉकडाउन के बाद से पैड की जगह कपड़ा इस्तेमाल करना पड़ रहा है जो कि बहुत ही असहज होता है।

शहरी क्षेत्र में संसाधनों की उपलब्धता देर-सवेर से हो जाती है। गांव-कस्बों में रहने वाली लड़कियों और महिलाओं को इस कारण ज्यादा परेशानी उठानी पड़ रही है।

दूसरी ओर तालाबंदी के कारण बहुत-सी कामकाजी महिलाओं को अपनी नौकरी गंवानी पड़ रही है या वर्क फ्रॉम होम की वजह से अधिक कार्यभार और तनाव का सामना करना पड़ रहा है। शहरी महिलाएं भी लॉकडाउन के कारण पीरियड्स प्रॉडक्ट्स की उपलब्धता में कमी का सामान कर रही है। एवरटीन द्वारा वर्ल्ड मेंस्ट्रुअल हाइजीन डे पर जारी किया गया मेन्स्ट्रुअल हाइजीन सर्वे मुख्य रूप से कोविड-19 और लॉकडाउन में महिलाओं ने पीरियड्स से जुड़ी किस तरह की समस्याओं का सामना किया है जैसे विषय पर केंद्रित है। इस सर्वे में दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद और कोलकात्ता जैसे शहरों की महिलाओं ने हिस्सा लिया। सर्वे में शामिल महिलाओं में से 41 प्रतिशत ने पीरियड में देरी यानि अनियमिता का सामना किया। 64.5 प्रतिशत महिलाओं का कहना है कि कोविड के कारण उनके तनाव का स्तर बढ़ गया है जो अनियमता का एक प्रमुख कारण है। सर्वे में शामिल एक-तिहाई से अधिक ने माना है कि उन्होंने इस दौरान मेन्स्ट्रुअल फ्लो में भी कमी महसूस की है। वही 20 प्रतिशत ने कोविड के दौरान पीरियड मिस होने की बात भी कही है। 29.2 प्रतिशत ने प्रतिक्रिया दी है कि महामारी के कारण पीरियड सामान्य दिनों से अधिक दर्द भरे रहे हैं। वहीं, 28.8 फीसद महिलाओं ने क्लॉटिंग की समस्या का भी ज्रिक किया। 

लॉकडाउन ने उत्पादन के प्रत्येक क्षेत्र को प्रभावित किया है। सैनेटरी नैपकिन उत्पादन में कमी और सप्लाई न होने के कारण भी बाजार में इसकी कमी देखी गई है। दूर-दराज के गांव में तो लड़कियां और भी ज्यादा इसका सामना कर रही है। कोविड समस्या से पहले भी बड़ी संख्या में महिला अपनी पीरियड्स के दिनों में पैड की जगह पुराना कपड़ा, राख या रूई का इस्तेमाल करती हैं। पैड्स का मंहगा होना इसका एक कारण है। शहरी क्षेत्र में रहने वाली सुप्रिया का कहना है कि सरकार द्वारा उपलब्ध कराए जाने वाले पैड्स की गुणवत्ता बाज़ार में उपलब्ध ब्रैंड्स के सैनेटरी पैड्स के मुकाबले बेहद खराब है। मंहगे होने के बावजूद भी वह बाजार में उपलब्ध ब्रांड के पैड्स खरीदने पर मजबूर हैं। उनका कहना है कि सरकार को कम दाम के साथ-साथ गुणवत्ता पर भी ज्यादा ध्यान देना चाहिए। सरकार देश की महिलाओं के स्वास्थ्य के प्रति सजगता दिखाते हुए सस्ते पैड्स की योजना तो शुरू करती, वहीं दूसरी और 12 प्रतिशत जीएसटी लगाकर टैक्स भी वसूल करती है। अधिकतर महिलाएं जिनका काम घर-परिवार में रहकर रसोई तक ही सीमित है, उनकी स्वयं की कोई आर्थिक निर्भरता नहीं होती है। वहां उसके स्वास्थ्य से जुड़ी सामग्री पर सरकार टैक्स लेती है।

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तस्वीर साभारः Times of India

मैं पूजा राठी पश्चिमी उत्तर-प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर की रहने वाली हूँ। अपने आसपास के माहौल मे फ़िट नहीं बैठती हूँ।सामाजिक रूढ़िवाद, जाति-धर्मभेद, असमानता और लैंगिक भेद में गहरी रूचि है। नारीवाद व समावेशी विचारों की पक्षधर हूँ। खुद को एक नौसिखिया मानती हूँ, इसलिए सीखने की प्रक्रिया हमेशा जारी रखती हूँ।

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