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“क्या आप वैक्सीन लगवा चुके हैं?” यह एक ऐसा सवाल है, जो भारत के अधिकतर लोग आजकल एक दूसरे से पूछते नज़र आएंगे। कुछ लोग तो इसका जवाब देने में सक्षम है और कुछ नहीं, खासकर महिलाएं और हाशिये पर गए समुदाय। भारत में कोविड-19 के टीकाकरण अभियान का पहला चरण 16 जनवरी से शुरू हो चुका है। पहले चरण में स्वास्थ्य देखभाल करने वाले फ्रंटलाइन वर्कर्स के टीकाकरण को स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा अनुमति दी गई थी। वहीं, दूसरे चरण में 45 साल से ऊपर के लोगों को टीकाकरण करने के अनुमति मिली। मार्च के महीने तक आते- आते भारत में वैक्सीन वरिष्ठ नागरिकों तक सीमित संख्या में पहुंचने लगी थी।

हिंदुस्तान टाइम्स में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक लुधियाना के दयानंद मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल (डीएमसीएच) के स्वास्थ्य विभाग द्वारा मार्च में दी गई रिपोर्ट के आंकड़ों से पता चला है कि कोविड -19 का टीका लगाने के लिए आगे आने वाली बुज़ुर्ग महिलाओं की संख्या बुज़ुर्ग पुरुषों की तुलना में कम है। अस्पताल ने वरिष्ठ नागरिकों के आंकड़ों का अध्ययन किया, जिन्होंने मार्च के महीने में अस्पताल में टीका लगाया और पाया कि कुल 10,079 लोगों ने टीकाकरण करने के लिए रजिस्ट्रेशन किया है, जिनमें से 5,576 (55%) पुरुष थे जबकि 4,503 (45%) महिलाएं थीं।

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अब इस समय में, जहां कोरोना की दूसरी लहर का प्रकोप हमारे देश में अपने उच्चतम शिखर पर जा चुका है, वहां वैक्सीन जैसी मूलभूत सेवाओं तक की पहुंच में भी लैंगिक अंतर सामने आने लगा है। इसके पीछे बहुत से कारण देखे जा सकते हैं। जैसे कि महिलाओं को वैक्सीन के बारे में पर्याप्त जानकारी न होना। महज़ महिलाओं के पास ही क्यों, भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को इसके बारे में जानकारी न होना और उनके पास कोविन साइट पर अपना रजिस्ट्रेशन करने के लिए मोबाइल और इंटरनेट की सुविधा ना होना, जैसे बहुत से कारण भी मौजूद हैं। वहीं, बात अगर महिलाओं के संदर्भ में करें तो सोशल मीडिया पर महिलाओं के टीकाकरण को लेकर कई गलत खबरें और सूचनाएं फैलाई जा रही हैं। उदाहरण के तौर पर यह कि महिलाओं को पीरियड्स के दौरान वैक्सीन नहीं लेना चाहिए या वैक्सीन लगवाने से उनके गर्भधारण करने की क्षमता पर असर पड़ सकता है। सोशल मीडिया पर वैक्सीन सुरक्षा के संबंध में ऐसी गलत सूचनाएं मिलने के कारण महिलाएं इस पर ध्यान देने से हिचकिचा रही हैं।

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भारत के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक 17 मई 2021, तक कुल 7.56 करोड़ पुरुष और 6.75 करोड़ महिलाओं का टीकाकरण किया गया। वहीं, अन्य की श्रेणी में कुल 20, 269 लोगों का टीकाकरण किया गया है। महिलाओं की कम भागीदारी के साथ-साथ टीकाकरण की प्रक्रिया में ट्रांस समुदाय के लोगों की भागीदारी भी न के बराबर है। महिलाओं और ट्रांस समुदाय के लोगों का वैक्सीन लगवाने के लिए आगे ना आने का सबसे बड़ा कारण स्वास्थ्य के मुद्दे पर इनका हाशिये पर होना है। वर्ग, लिंग, जाति, धर्म, यौनिकता अलग-अलग आधारों जैसे पर हाशिये पर गए समाज का अपने अधिकारों के प्रति सचेत न होना हमारे देश में यह जैसे एक आम बात है। वैक्सीन लगवाने के लिए इन समुदायों के पास पहचान पत्र जैसे आधार कार्ड और ड्राइविंग लाइसेंस का न होना भी वैक्सीनेशन में इनकी भागीदारी को कम करता है।

वहीं, देखा जाए तो पितृसत्तात्मक सोच के चलते हमारे समाज में महिलाओं के अपने निर्णय लेने की शक्ति भी सीमित होती है और यही कारण उन्हें उनके स्वास्थ्य संबंधी फैसले लेने से रोकता है। स्वास्थ्य की श्रेणी में आसानी से देखा जा सकता है कि कैसे महिलाएं हमेशा पुरुषों से पीछे रही हैं। अगर हम आधिकारिक आंकड़ों पर गौर करें तो हमें पता चलेगा कि राष्ट्रीय स्तर पर टीकाकरण की प्रक्रिया में लैंगिक अंतर 4 प्रतिशत से भी अधिक है लेकिन दिल्ली और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में जहां कोविड के मामले दूसरे राज्यों से अधिक हैं, यहां लैंगिक अंतर 10 प्रतिशत से भी अधिक है। भारत की राजधानी जैसे शहरी इलाकों में लैंगिक अंतर इतना दिख रहा है, तो हमें हाशिये पर गए ग्रामीण क्षेत्रों के आंकड़ों की बात तो छोड़ ही देनी चाहिए। भारत के केवल चार राज्यों केरल, कर्नाटक, छत्तीसगढ़ और हिमाचल प्रदेश ने अब तक पुरुषों की तुलना में अधिक महिलाओं का टीकाकरण किया है। वहीं, नगालैंड और जम्मू और कश्मीर में देश में पुरुष- महिला टीकाकरण संख्या में लगभग 14 प्रतिशत का व्यापक अंतर है।

समाज की लैंगिक असमानता वाली सोच टीकाकरण की प्रक्रिया में भी अपना अपना भरपूर योगदान देती है। बात अगर ग्रामीण क्षेत्रों की करें तो यहां वैक्सीन और वैक्सीनेशन सेंटर की कमी, जागरूकता और जानकारी का अभाव भी लोगों की कम भागीदारी का एक मुख्य कारण है। भारत में वैक्सीन की कमी होना भी एक आम बात दिखाई पड़ रही है। जिनके पास इंटरनेट और स्मार्टफोन की सुविधा है, उनके लिए भी कोविन पोर्टल में स्लॉट का मिलना जैसे ना के बराबर है। भारत में वैक्सीन की कमी को पूरा करने के साथ- साथ, हमें लैंगिक अंतर को भी कम करने की भी ज़रूरत है ताकि हम भारत के हर एक नागरिक को समान रूप से वैक्सीन उपलब्ध करा सके। हमें भारत के कोने-कोने तक वैक्सीन के बारे में पर्याप्त जानकारी लोगों के साथ साझा करनी होगी ताकि कोई भी व्यक्ति इस समय की मूलभूत सुविधा से वंचित ना रह सके।

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तस्वीर साभार : Independent

मेरा नाम वांशिक पाल है| दिल्ली विश्वविद्यालय के गार्गी कॉलेज की छात्रा हूँ| दिल्ली में ही हमेशा से रही हूँ, तो दिल्ली की गलियों को ही देखा है, लेकिन ताज्जुब की बात तो यह है की अभी तक पूरी दिल्ली नहीं देखी| बात करें मेरे बारें में तो अभी तक मुझे इतना ही पता है, जितना मेरे आधार कार्ड पर फिट हो सकें| अपने बारें में कभी इतनी गहराई में सोचनें का मौका ही नहीं मिला, क्योंकि अभी तक के सारे फैसले घरवालों ने लिए है| अब सोचती हूँ, तो लगता है जैसे अभी तक तो कुछ किया ही नहीं है| बाकी पेंटिंग करना, गाने सुनना, किताबें पढ़ना और छोटे बाल रखना मेरे कुछ शौक है| हर जगह गलतियाँ करना जैसे मेरा एक मात्र काम है| बाकी ज़िंदगी में कुछ नया सीखने की कोशिश में लगी रहती हूँ, लेकिन उनसे बोर भी बहुत जल्दी हो जाती हूँ| सिनेमा देखना, गानों के साथ गाने गाना और आस पास की कहानियों को अपने फोन में रखना जैसे एक मात्र प्यार है| बाकी हर एक बात पर "क्यों?" पूछना पसंद करती हूँ|

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