FII Hindi is now on Telegram

कोरोना वायरस की वजह से पूरा विश्व तबाही का सामना कर रहा है। पिछले दो सालों से इस महामारी की वजह से लोगों का जीवन अस्त-व्यस्त हो चुका है। लेकिन इस महामारी ने जिनका जीवन सबसे ज्यादा प्रभावित किया है वह हैं औरतें और हाशिये पर गए सभी समुदाय। इस महामारी की वजह से औरतों के जीवन और दिनचर्या पर दोहरी मार पड़ी है खासकर कामकाजी औरतों पर क्योंकि काम के साथ-साथ उन्हें घर की जिम्मेदारियों को भी पहले की तुलना में ज्यादा निभाना पड़ रहा है। जैसे, स्वच्छता का ख्याल रखना, बच्चों या परिवार के सभी लोगों की सेहत का ख्याल रखना, उनके स्वच्छता का ख्याल रखना, और साथ ही साथ उन्हें घर से जुड़े बाकी काम करना। इन सब की वजह से औरतों में मानसिक तनाव और अवसाद की स्थिति भी पहले की तुलना में ज्यादा बढ़ी है।

डेलॉयट द्वारा जारी की गई ग्लोबल रिपोर्ट, ‘विमेन एट द वर्क: ए ग्लोबल आउटलुक’ के अनुसार सर्वे में शामिल करीब 80 फीसद औरतों का कहना है कि महामारी के दौरान उनका कार्यभार पहले की तुलना में ज्यादा हो गया है। यह सर्वेक्षण 5000 औरतों के बीच 10 देशों में किया गया है। इसके अनुसार महामारी के बाद औरतों की मानसिक स्थिति में 35 फ़ीसद और काम के दौरान प्रेरणा में 29 फ़ीसद की गिरावट देखी गई। पिछले वर्ष 2020 में जब पूरे विश्व में लॉकडाउन लगा तब दुनिया भर की कंपनियों ने दावा किया था कि वह कार्यस्थल पर विविधता के एजेंडा को तेजी से बढ़ाएंगे लेकिन डेलॉयट की रिपोर्ट के अनुसार 2020 में इसके विपरीत कार्यस्थल पर लैंगिक समानता की स्थिति और बदतर हो गई।

और पढ़ें : औरतों के लिए क्यों ज़रूरी है अपनी पहचान और अपना काम

औरतों के उनके काम छोड़ने का सबसे बड़ा कारण उनके कंपनी के नियोक्ता (एंपलॉयर) द्वारा काम के लिए महामारी के दौरान लचीलापन नहीं देना है। रिपोर्ट के मुताबिक जब वास्तव में कंपनी ने उन्हें वह लचीलापन प्रदान कराया तब वे काम के दौरान उतनी उत्सुक नहीं दिखी जितना की वह पहले थी। रिपोर्ट के अनुसार औरतों का कहना है कि महामारी की वजह से उनका पहले से ज्यादा समय घरेलू कामों में, परिवार, बच्चों के देखभाल में बीतता है। बार अगर भारत की करें तो यहां लगभग 78 फीसद औरतों का कहना है कि अधिकतर घरेलू कामों और घर के प्रबंधन की जिम्मेदारी उनकी होती है। भारतीय औरतें ज्यादातर बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारी खुद ही लेती हैं और इन सब के बीच कंपनी/ संस्थान के काम को पूरा कर पाना उनके लिए बेहद मुश्किल होता है। महामारी के पहले दफ्तर के सारे काम करने के लिए उन्हें पर्याप्त वातावरण मिलता था क्योंकि वह ऑफिस वगैरह जाकर इन कामों को पूरा करती थीं लेकिन अब महामारी के बाद घर पर रहकर ही उनसे घर के साथ-साथ दफ्तर के सारे कामों को पूरा करने की उम्मीद की जाती है।

कामकाजी महिलाओं की गंभीरता को दर्शाती यह रिपोर्ट, निम्नलिखित आंकड़े सामने लाती है:

1- पूरे विश्व में सिर्फ 22% औरतों को लगता है कि उनके नियोक्ता उनके काम और उनके व्यक्तिगत समय के बीच सीमा स्थापित करने में मदद करते हैं।

2- 51% औरतें अपने करियर को लेकर पहले की अपेक्षा आशाहीन चुकी है।

Become an FII Member

3- 42% औरतों को लगता है कि उनका करियर अब उतना जल्दी नहीं बढ़ रहा जितनी जल्दी उसे बढ़ना चाहिए था।

4- भारत में 57% औरतें अपनी मौजूदा नौकरी को अगले दो साल के अंदर छोड़ने के बारे में सोच रही हैं।

5- भारत में सिर्फ 31% औरतों को लगता है कि उनके नियोक्ता की सहायता उनके लिए पर्याप्त थी।

6- कोविड-19 महामारी आने के बाद सर्वे में शामिल 51% भारतीय महिलाएं अपने करियर को लेकर आशाहीन हो गई हैं।

7- दुनियाभर में महिलाएं नौकरी की सुरक्षा से भी परेशान है। 31% औरतों का कहना है कि महामारी के दौरान मानसिक रूप से इतना परेशान होने के बावजूद भी वह नौकरी नहीं छोड़ पाती क्योंकि ऐसा करने से उनका करियर प्रभावित होगा।

8- 33% औरतों को लगता है कि ऐसा करने से उन्हें महत्वपूर्ण परियोजनाओं से परे कर दिया जाएगा।

9- 15% औरतों का कहना है कि यदि वे हमेशा अपने नियोक्ता के लिए उपस्थित नहीं रहेंगी तो उन पर उनके नौकरी और व्यक्तिगत जीवन में से कोई एक चुनने के लिए दबाव डाला जाएगा।

10- 52% ने पिछले एक साल के दौरान किसी प्रकार का उत्पीड़न या सूक्ष्म आक्रामकता का सामना किया है।

और पढ़ें : कामकाजी महिलाओं पर घर संभालने का दोहरा भार लैंगिक समानता नहीं| नारीवादी चश्मा

यह परिणाम कामकाजी महिलाओं की वर्तमान स्थिति को काफी निराशाजनक चित्रित करते हैं। रिपोर्ट तैयार करने के दौरान डेलॉयट के शोधकर्ताओं ने नियोक्ताओं के एक ऐसे समूह के बारे में बताया जिन्हें ‘लैंगिक समानता नेता’ कहा जाता है। ये वे नेता हैं जो महामारी के दौरान सफलतापूर्वक अपने कर्मचारियों की मदद करते हैं और एक समावेशी वातावरण बनाने की कोशिश करते हैं। हालांकि ये लैंगिक समानता नेता सर्वे में शामिल केवल 4 फीसद लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं। जब डेलॉयट के शोधकर्ताओं ने कम समावेशी संस्थानों की तुलना उन संस्थानों से कि जहां लैंगिक समानता नेता थे तो परिणाम काफी आश्चर्यजनक मिले। जब बात उत्पादकता, प्रतिधारणता और संतुष्टता की आती है तब लैंगिक समानता नेता वाले संस्थान का प्रदर्शन काफी संतोषजनक था। इन संस्थानों में अपनी उत्पादकता से लगभग 70% औरतें संतुष्ट थी वहीं कम समावेशी वाले संस्थानों में यह आंकड़ा केवल 29% था। मनोवैज्ञानिक तौर पर संस्थान या कंपनी में एक सुरक्षित, भरोसेमंद और समावेशी माहौल पैदा करने के कई लाभ हैं। जैसे वहां की औरतें आत्मविश्वास से लबरेज होती हैं, उन्हें यह विश्वास होता है कि उनका करियर आगे बढ़ रहा है उन पर मानसिक दबाव भी कम होता है जिसका असर उनके काम पर भी दिखता है।

और पढ़ें : महिलाओं को मिलना चाहिए उनके घरेलू श्रम का हिसाब


तस्वीर साभार : Scroll

A very simple girl with very high aspirations. An open-eye dreamer. A girl journalist who is finding her place and stand in this society. A strong contradictor of male-dominant society. Her pen always writes what she observes from society. A word-giver to her observations.

Follow FII channels on Youtube and Telegram for latest updates.

नारीवादी मीडिया को ज़रूरत है नारीवादी साथियों की

हमारा प्रीमियम कॉन्टेंट और ख़ास ऑफर्स पाएं और हमारा साथ दें ताकि हम एक स्वतंत्र संस्थान के तौर पर अपना काम जारी रख सकें।

फेमिनिज़म इन इंडिया के सदस्य बनें

अपना प्लान चुनें

Leave a Reply