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बस में बैठे यात्री उस वक्त आश्चर्य से भर जाते हैं जब उन्हें मालूम होता है कि उनकी बस को एक महिला चला रही है। कुछ लोग खुशी जाहिर करते हैं, तो कुछ तंज कसते हैं कि वह ड्राइवर उन्हें बस सही-सलामत घर पहुंचा दे। जी हां, हमारे समाज की यही सोच है कि हर काम हर कोई नहीं कर सकता है। जाति, धर्म, लिंग के आधार पर सामाजिक व्यवस्था ने स्त्री-पुरूष को अलग-अलग खांचों में बांटा हुआ है। हम इक्कीसवीं सदी में रह रहे हैं। हमारा समाज रूढ़िवादी प्रचलित मान्यता और सोच से घिरा हुआ है या यूं कहे कि उसकी नींव में ही जड़ता आ गई है। हर क्षेत्र में इन्हीं भेदभाव के साथ हम आगे बढ़ रहे हैं और वैचारिक रूप से उन्हीं रूढ़िवादी मान्यताओं का लिबास ओढ़े हुए हैं। महिला-पुरुष में असमानता हमारे समाज की हर शाखा में शामिल होकर सामज में लैंगिक भेद को बढ़ा रही है। पित्तृसत्ता की गहरी सोच हमारी सामाजिक संरचना और क्रियाओं को विभेद के बल बढ़ा रही हैं, जिसमें हर मोड़ पर महिला प्रताड़ित हो रही है। यह विचारधारा व्यवस्था के हर क्रम में स्त्री की उपस्थिति पर सवाल करती है, उसे अयोग्य बताकर उसकी क्षमता को नकारती है।

एक लड़की क्या करेगी, क्या पढ़ेगी और तो और क्या पहनेगी यह सब भी समाज में सदियों से चली आ रही पितृसत्तात्मक सोच के आधार पर तय होता रहा है। परिवार, समाज, धर्म, नैतिकता यह सबकुछ एक महिला के जीवन के फैसलों पर हावी होते हैं। “लड़की हो तुम ये काम नहीं कर सकती, एक औरत इस काम में फिट नहीं बैठेगी” जैसी सोच के कारण आज भी हमें देश के अधिकतर क्षेत्रों में पहली महिला की नियुक्तियों का इंतज़ार है। आज़ादी के 70 से भी अधिक सालों के बाद बहुत से क्षेत्र और पदों पर जब पहली महिला की नियुक्ति होती है तो हम गर्व से सीना फुला बैठते हैं। महिला सशक्तिकरण अभियान की सफलता पर ढींगें भरते नज़र आते हैं।

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समाज में हर पेशा महिलाओं के लिए सुरक्षित नहीं है ऐसी सोच पितृसत्तात्मक व्यवस्था में बस चुकी है। दुनिया में शिक्षा और पेशे को भी को लिंगभेद के तहत बांटा गया है। महिला को उसकी शारीरिक बनावट के आधार पर कमतर आंककर उसे कमज़ोर माना जाता है। दैनिक जीवन और शिक्षा के क्षेत्र में बचपन से ही लड़की को उनकी अयोग्यता का पाठ पढ़ाया जाता है। उदाहरण के तौर पर अक्सर लड़कियों से यह कहा जाता है कि विज्ञान की पढ़ाई उनकी समझ नहीं आएगी, लड़कियों का गणित कमज़ोर होता है आदि। उनके लिए टीचर की नौकरी सही है, बैंक की नौकरी सुरक्षित है जैसी बातों के साथ ही लड़कियों के करियर के बारे में यह पितृसत्तात्मक समाज खुद ही फैसले ले लेता है। महिलाओं के लिए सुरक्षित कहे जाने वाले टीचिंग, बैंकिंग जैसे क्षेत्रों में भी पुरुषों की ही संख्या ज्यादा है। बिजनेस स्टैंडर्ड की मानव संसाधन मंत्रालय के द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के आधार पर बनी रिपोर्ट कहती है कि भारत में करीब 12 लाख अध्यापक हैं जिसमें 58 प्रतिशत पुरुष और 42 प्रतिशत महिलाएं हैं। ऐसा तब है जब इस पितृसत्तात्मक समाज में टीचिंग महिलाओं के लिए सुरक्षित पेशा माना जाता है, जिसमें रहकर महिलाएं काम के साथ घर को आसानी से संभाल सकती हैं।    

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हमनें अपने गांव-घरों में यह भी देखा है कि महिला श्रमिकों को उनके काम के बदले बहुत कम वेतन या फिर कुछ भोजन या कपड़ा दे दिया जाता है। कई आंकड़े और रिपोर्ट्स बताती हैं कि समान काम के लिए एक पुरुष को महिला से अधिक वेतन मिलता है और ऐसा लगभग संगठित और असंगठित दोंनो ही क्षेत्रों में होता है। संगठित और असंगठित हर क्षेत्र में महिलाएं समाज वेतन के लिए संघर्ष करती हैं। साल 2019 में मॉन्स्टर सैलरी इंडेक्स सर्वे बताता है कि भारत में महिलाएं समान काम के लिए पुरुषों से 19 प्रतिशत कम वेतन पाती हैं।

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कोविड-19 ने कैसी बढ़ाई चुनौतियां

दुनिया में श्रम के क्षेत्र में महिलाओं को सबसे अधिक असमानता का सामना करना पड़ता है। कोरोना महामारी ने इन चुनौतियों को और बढ़ा दिया है। लॉकडाउन के चलते बहुत से लोगों की नौकरी छूट गई और महिलाएं इस छंटनी की पहली कतार में खड़ी दिखी। कोविड-19 के चलते नौकरी गंवानेवालों में महिलाओं की संख्या अधिक है। अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय संस्थानों की कई रिपोर्ट्स महामारी के चलते श्रम क्षेत्र में हुए जेंडर गैप पर अपनी चिंता जाहिर कर चुकी हैं। संगठित और असंगठित दोंनो ही क्षेत्रों में महिलाओं को काम से हाथ धोना पड़ रहा है। इसका सरल उदाहरण यह है कि घरों में हाउसहेल्प का काम करने वाली महिलाओं को तुरंत ही उनके काम से छुट्टी दे दी गई। हफ्ते या महीने की दी गई छुट्टी बहुत-सी घरेलू कामगार महिलाओं के लिए अब तक जारी है। महिलाओं के लिए कौन सा पेशा सुरक्षित होता कौन सा नहीं, इसी सोच के कारण ही महिला कर्मचारियों, श्रमिकों की संख्या पुरुषों के मुकाबले बहुत पीछे है। आर्थिक सशक्तिकरण, लैंगिक भेदभाव को मिटाने का एक उपाय है। कोविड-19 महामारी के इस वक्त में जब अर्थव्यवस्था बेहद खराब दौर में है। लोगों के पास काम नहीं है, या फिर उन्हें अपनी नौकरी गंवानी पड़ रही है। ऐसी स्थिति में महिलाओं को पहले काम से निकाला गया।

कोविड-19 महामारी ने विश्वभर में लैंगिक भेदभाव को और गहराया है। वर्ल्ड इकॉनमिक फोरम द्वारा जारी की गई ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट, 2021 के अनुसार कोविड-19 के कारण अधिक महिलाओं को काम गंवाना पड़ा। एक अनुमान के मुताबिक 3.9 फीसद पुरुषों के मुकाबले नौकरी करने वाली महिलाओं में से 5 प्रतिशत को उनके काम से निकला दिया गया। इसी रिपोर्ट के अनुसार पूरी दुनिया से लैंगिक भेद दूर करने के लिए 135 वर्ष से अधिक का समय लगेगा। लैंगिक भेद को कम करने के लिए आशा की बहुत छोटी खिड़की खुली है। पहले से ही महिलाओं की हर कार्य क्षेत्र में भागीदारी कम है। इस भेद को मिटाने का पहला उपाय यही है कि महिलाओं की भागीदारी ज्यादा से ज्यादा सुनिश्चित की जाए। रिपोर्ट के अनुसार शैक्षिक, स्वास्थ्य, मीडिया कम्यूनिकेशन, उपभोक्ता, रिटेल, फांइनेशियल सर्विस, इन्फोर्मेशन टेकनॉलजी के क्षेत्र में बड़े पैमाने पर महिलाओं की नियुक्ति करनी होगी। मल्टी-स्टॉकहोल्डर, पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप मॉडल को अपनाकर कार्यक्षेत्रों में मौजूद जेंडर गैप का कम किया जा सकता है। वहीं, महिलाओं के कार्यक्षेत्र में बढ़ोतरी लाने के लिए उनमें सामाजिक सुरक्षा की भावना को मज़बूत करना होगा और महिलाओं को अधिक से अधिक मैनेजमेंट में शामिल कर नेतृत्व की जिम्मेदारी सौंपनी होगी।

महिलाओं के लिए काम पर वापसी के रास्ते भी नहीं आसान

महिलाओं को काम में वापसी करने में भी कई समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। काम के मामले में पुरुषों के मुकाबले महिलाओं को पहले से ही कम वरीयता मिलती थी। कोविड-19 के बाद महिलाओं के लिए अवसर और भी सीमित हो गएं हैं। अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की एक रिसर्च के अनुसार महामारी के समय में छूटे काम में वापसी के लिए महिलाओं को अधिक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। इस पेपर के अनुसार लॉकडाउन के बाद महिलाओं की नौकरी खोने की संभावना सात गुना अधिक थी। वहीं, काम पर न लौटने की संभावना ग्यारह गुना अधिक। शादीशुदा कामकाजी महिलाओं की दोबारा काम पर न लौटने की संभावनाएं भी बढ़ी हैं। नौकरी छूटने के बाद से जो लोग दोबारा काम पर आए हैं उनमें से अधिकतर पुरुष कृषि, व्यापार या निर्माण के क्षेत्र में दैनिक वेतन या फिर स्वरोजगार के क्षेत्रों में चले गए। दूसरी ओर, महिलाओं के पास स्वरोज़गार के विकल्प बहुत ही ज्यादा सीमित हैं।

लैंगिक भेद पर आधारित सामाजिक दशा में बदलाब लाने के लिए अधिक से अधिक संख्या में महिलाओं को घर से बाहर निकल कर काम करना होगा। सभी कार्यक्षेत्रों में महिला की मौजूदगी उसकी सामाजिक व आर्थिक दोनों दशा को बदल सकती है। शारीरिक क्षमता कोई बाधा नहीं है जिसकी वजह से बेवजह महिला को कमत्तर आका जाये। वह हर तरह का काम करने की क्षमता और उसके लिए समान वेतन का भी अधिकार रखती है। भारतीय संविधान में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जहां लिंग, जाति, धर्म के आधार पर किसी काम को करने के लिए मनाही हो।  

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तस्वीर साभार : मुहीम ‘एक सार्थक प्रयास’

मैं पूजा राठी पश्चिमी उत्तर-प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर की रहने वाली हूँ। अपने आसपास के माहौल मे फ़िट नहीं बैठती हूँ।सामाजिक रूढ़िवाद, जाति-धर्मभेद, असमानता और लैंगिक भेद में गहरी रूचि है। नारीवाद व समावेशी विचारों की पक्षधर हूँ। खुद को एक नौसिखिया मानती हूँ, इसलिए सीखने की प्रक्रिया हमेशा जारी रखती हूँ।

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