इंटरसेक्शनलजेंडर गालियों का केंद्र हमेशा महिलाएं ही क्यों होती हैं ?

गालियों का केंद्र हमेशा महिलाएं ही क्यों होती हैं ?

इन गालियों का संबंध होता है केवल महिलाओं की ‘योनि’ से क्योंकि पितृसत्ता में महिला का जीवन और उसकी इज्ज़त-आबरू सब कुछ सिर्फ योनि से जुड़ा हुआ है।

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और एक-दूसरे से संपर्क करने के लिए वह कई तरीकों का इस्तेमाल करता है। इन्हीं में से एक तरीका है, भाषा। कहा जाता है कि इंसान की खूबी होती है उसकी भाषा। भाषा के साथ ही आती है अभद्र भाषा जिसका इस्तेमाल भी कमोबेश हर इंसान करता है और जिसे हम गाली-गलौच के नाम से भी जानते हैं। अकसर जब भी कोई बहस झगड़े में तब्दील होने वाली होती है तो गालियों की बौछार भी शुरू होने लगती है। लड़ाई चाहे दो मर्दों के बीच ही क्यों न हो रही हो लेकिन गाली एक- दूसरे की मां, बहन, बेटी और पत्नी को ही दी जाएगी। आम बोलचाल में भी ये गालियां बेहद सामान्य तरीके से इस्तेमाल की जाती हैं। इन गालियों में महिला-विरोधी शब्द इस्तेमाल किए जाते हैं जो उनके चरित्र पर सवाल उठाते हैं और उनके साथ होनेवाली यौन हिंसा को भी जायज़ ठहराते हैं।

इन गालियों का संबंध होता है केवल महिलाओं की ‘योनि’ से क्योंकि पितृसत्ता में महिला का जीवन और उसकी इज्ज़त-आबरू सब कुछ सिर्फ योनि से जुड़ा हुआ है। ये गालियों वाली भाषा जिसकी जड़ें पितृसत्तात्मक सोच से जुड़ी हैं, महिलाओं को कमतर मानने और उनका दमन करने की भावना से संबंधित है। हमारे समाज में महिलाओं को घर की ‘इज्ज़त’ का प्रतीक समझा जाता है और उनका अस्तित्व कुछ गिने- चुने रिश्तों में बांध दिया गया है जिसमें वह इंसान होने के अलावा मां, बहन, बेटी, पत्नी तक ही सीमित रह जाती हैं। महिलाओं के चरित्र, उनके शरीर को पुरुष अपनी संपत्ति समझते हैं जिसे उनके मुताबिक संभालकर सुरक्षित रखने की ज़रूरत होती है। अगर इसे बचाना है तो महिलाओं को घर की दीवारों के अंदर रखने की परंपरा अपनाई जाती है। यही सोच इस बात को जन्म देती है कि अगर आपको किसी को अपमानित करना है या तंग करना है तो उनके घर की महिलाओं को गाली दे दीजिए और उनका अपमान हो जाएगा। इसी वजह से महिलाएं गालियों का केंद्र बन जाती हैं।

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डीएनए इंडिया के मुताबिक, वीमंस स्टडीज़ विशेषज्ञ और टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज, हैदराबाद की प्रोफेसर डॉ लक्ष्मी लिंगम इस विषय पर कहती हैं, “गालियां यह दर्शाती हैं कि हमारा समाज महिलाओं के साथ कैसा व्यवहार करता है। गालियां उस शोषण को बने रहने में मदद करती हैं जो महिलाओं के शरीर, उनकी कामुकता और यहां तक ​​​​कि उनके प्रजनन को नियंत्रित करना चाहता है। जो व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति के गाली देने पर गुस्सा हो जाता है, वह इसीलिए नहीं कि उसे गाली में उपयोग किए गए शब्द ठीक नहीं लगे, बल्कि इसलिए कि इससे उसके घर की महिलाओं के चरित्र और कामुकता पर सवाल उठाए गए हैं जिनको वह अपनी संपत्ति मानता है।” यह गालियां देकर और दूसरों को नीचा दिखाकर पुरुष तो अपने अहं को संतुष्ट कर लेते हैं लेकिन जब महिलाएं भी बिना किसी हिचक के मां-बहन की गालियां देती हैं तो थोड़ा आश्चर्य होता है।

गालियों का संबंध होता है केवल महिलाओं की ‘योनि’ से क्योंकि पितृसत्ता में महिला का जीवन और उसकी इज्ज़त-आबरू सब कुछ सिर्फ योनि से जुड़ा हुआ है।

आप चाहे आप किसी की तारीफ कर रहे हैं, गुस्सा ज़ाहिर कर रहे हैं या दोस्तों के साथ मस्ती कर रहे हैं, हर बात में अक्सर हमें महिलाओं पर केंद्रित गालियां सुनने को मिलती हैं। इसका उदाहरण हमें सोशल मीडिया पर भी देखने को मिलता हैं जहां आए दिन हर तरह के कंटेंट में गालियों का अंबार होता है। वेब सीरीज़ में तो बड़ी सहजता से गालियां दी जाती हैं, कभी गुस्से में तो कभी हल्की- फुल्के अंदाज में और कभी मस्ती में गालियां हर जगह होती हैं। महिलाओं पर केंद्रित गालियां देना और सुनना अब एक न्यू नॉर्मल बन चुका है। उदाहरण के तौर पर यूट्यूब पर चर्चित कैरी मिनाटी के वीडियोज़ देखिए। एक शख़्स जो कंटेंट क्रिएट करने के नाम पर सिर्फ गालियां देता है, ऊपर से उसके वीडियो वायरल भी हो जाते हैं। ऐसे न जाने कितने और कैरी मिनाटी सोशल मीडिया पर मौजूद हैं। यह समझ नहीं आता कि ऐसी गालियां देकर और सुनकर लोग इन पर खिलखिलाकर हंस कैसे लेते हैं। मेरे खुद के जानने वाले कितने ही लोग गालियां देते हैं और फिर उसे सही ठहराते हुए कहते हैं कि गालियां भी अभिव्यक्ति का एक माध्यम है।

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भाषा व्यक्ति के साथ-साथ समाज को भी अभिव्यक्त करती है। गालियों के अलावा भी ऐसे सैकड़ों उदाहरण मिल जाएंगे जहां महिलाओं को भाषाई प्रतीकों के माध्यम से दोयम दर्जे का माना जाता है। “मर्द के सीने में दर्द नहीं होता, लड़कियों की तरह क्यों रो रहे हो,” जैसे उदाहरण हमारे व्यवहार में रच- बस गए हैं। अगर कोई चीज़ कमज़ोर, कोमल और छोटी है तो वह स्त्रीलिंग की श्रेणी में आती है। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जिन्हें हम रोजमर्रा की जिंदगी में उपयोग करते हैं। वहीं अब तक राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री जैसे शब्दों के समकक्ष कोई स्त्रीलिंग या जेंडर न्यूट्रल शब्द ईजाद नहीं हो पाया है। ऐसा लगता है कि कभी सोचा ही नहीं गया था कि कोई महिला या क्वीर समुदाय से आने वाला व्यक्ति भी राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री जैसे पदों पर बैठ सकते हैं।

वह तो भला हो नारीवादी आंदोलनों का कि कुछ हद तक भाषा में बदलाव आया है। जैसे, अंग्रेजी में चेयरमैन की जगह चेयरपर्सन, अध्यक्ष की जगह अध्यक्षा जैसे शब्दों का चलन हुआ है। फिर भी अभी व्यवहार में इन शब्दों का उपयोग नहीं हो पाया है। अगर हमें समाज में बदलाव लाना है तो शुरुआत भाषा से करनी पड़ेगी। जिस प्रकार जातिसूचक शब्द बोलने पर पाबंदी लगाई गई है, वैसे ही इन महिला-विरोधी गालियों पर भी संज्ञान लेना चाहिए। जिस भाषा को माध्यम बनाकर शोषक वर्ग वंचित तबकों का शोषण करता आया है, उसी भाषा के ज़रिए मुक्त भी हुआ जा सकता है। ऐसे में आवश्यक है कि हम अपनी भाषा को सुधारें और भविष्य को बेहतर बनाने में अपनी भूमिका निभाएं।

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तस्वीर : गूगल

About the author(s)

मेरा नाम पारुल शर्मा है। आईआईएमसी, नई दिल्ली से 'हिंदी पत्रकारिता' में स्नातकोत्तर डिप्लोमा और गुरु जांबेश्वर यूनिवर्सिटी, हिसार से मास कम्युनिकेशन में एम.ए. किया है। शौक की बात करें तो किताबें पढ़ना, फोटोग्राफी, शतरंज खेलना और कंटेंपरेरी डांस बेहद पसंद है।

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