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डॉ रक्षा गीता 

छोटी थी शायद आठवीं कक्षा में, जब मम्मी बड़े ही लगन से काम करते हुए, बहुत ही मगन से एक गीत गा रही थी, गुनगुना रही थी, “तुम गगन के चंद्रमा हो, मैं धरा की धूल हूं।” मुझे भी बहुत सुंदर लग रहा था कि उसमें एक पंक्ति आई, “तुम क्षमा, मैं भूल हूं।” मैंने मम्मी से पूछा कि इस लाइन का क्या मतलब है तो मम्मी ने बताया कि स्त्री से गलती हो भी जाए तो पुरुष उसे माफ़ कर देता है और यह उसकी महानता है। पर जो मुझे समझ आया कि मेरा होना ही एक भूल है यानी लड़की का होना और पुरुष सदियों से इस भूल को माफ करता आया है और इसे हमारे सौभाग्य के रूप में परिभाषित किया गया है। खैर यह ज़रूर था कि कुछ तो था जो ठीक नहीं था जिसे मेरा मन मानने को तैयार नहीं था पर यह गीत मन में कहीं बैठ गया। एक समय आया कि मैं प्रश्नों का पिटारा लिए घूम रही हूं किसने पुरुष को गगन का चंद्रमा बना दिया। चलो मान भी लेते हैं कि वह गगन का चंद्रमा है लेकिन स्त्री धरा की धूल क्यों है? यह समझ लीजिए कि वह बीज प्रश्न है जिसने मेरे मन को बहुत विचलित किया और मैं एक ऐसी यात्रा पर निकल पड़ी जिसमें मुझे हर स्थान पर इसी प्रकार के गीतों की गूंज-अनुगूंज सुनाई पड़ने लगी, जहां फिल्मी गीतों में स्त्री अपने आप को धन्य मानती है कि पुरुष ने उसको स्वीकार किया।

‘अनपढ़’ फिल्म का गीत, “आपकी नजरों ने समझा प्यार के काबिल मुझे” फिर उसकी वह लाइन “जी हमें मंजूर है आपका हर फैसला” हर फैसला? ऐसे कैसे? बिना सोचे-समझे उसने शादी कर ली तो उसकी हर बात मान लेंगे, वह परमेश्वर जो बन गया। जबकि पुरुष के लिए श्रीमती जी का मतलब है, “ज़रूरत है, ज़रूरत है, ज़रूरत है, एक श्रीमती की, कलावति की, सेवा करे जो पति की।” कोई भी फिल्मी गीत उठाकर देख लें सभी पैमाने पितृसत्तात्मक समाज द्वारा गढ़े गए हैं। उसके इतर एक औरत खलनायिका के रूप में ही मानी जाएगी। “पिया तुम हो सागर मैं प्यासी नदी हूं,” हम जानते हैं कि नदी सबकी प्यास बुझाती है और सागर में मिलने के बाद किसी काम की नहीं रहती क्योंकि खारा पानी किसकी प्यास बुझाएगा? सभ्यता के तमाम शुभारंभ नदी के किनारे ही मिलते हैं, सागर किनारे तो जंगल मिलते हैं।

क्या यह उसकी प्रकृतिगत विवशता है कि नदी सागर में विलीन हो जाना चाहती हैं या सामाजिक नियमों, परंपराओं, धार्मिकता के बहाने से उसे सागर की ओर मोड़ा जा  रहा है। क्यों अनिवार्य है उसके लिए सागर में ही मिल जाना? नदी कोई भी हो, किसी भी दुनिया की हो, छोटी हो, बड़ी हो, सागर में ही विलीन होना उसकी नियति बना दिया गया, उसने भी इसे ख़ुशी ख़ुशी स्वीकार लिया। दूसरी ओर धरा की धूल से सृष्टि का निर्माण होता है जबकि चांद में तो है न पानी है न जीवन-सृष्टि के संकेत! फिर भी देखिए ना, चांद बनके कितना इतरा रहा है यह पुरुष। करवा चौथ का व्रत इसी चांद का महिमामंडन है, स्त्री भूखे रहकर इसी चांद की तो सेवा करती है। “तुम्हीं मेरे मंदिर, तुम्हीं मेरी पूजा तुम्ही देवता हो, मुझे देखकर तुम जरा मुस्कुरा दो नहीं तो मैं समझूंगी मुझसे खफ़ा हो। मैं हूं एक छोटीसी माटी की गुड़िया, तुम ही प्राण मेरे तुम ही आत्मा हो,” यानी उसका अस्तित्व एक गुड़िया से अधिक कुछ नहीं। जाने-अनजाने गीतकार स्त्री के यथार्थ को प्रकट कर रहा है और स्त्री ने मानों गांठ बांध ली कि पुरुष किसी भी बात से खफा न हो जाए इसलिए उसकी निरंतर सेवा करनी है क्योंकि रिमोट (प्राण) तो उसके कब्जे में है।

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सिनेमाई गीतों की भाषा और साहित्य की भाषा को परखते हुए समझ आया कि फ़िल्मी गीतों की भाषा के मूल में पूरी तरह से पुरुष समाज के षड्यंत्र के तहत पितृसत्तात्मक मानसिकता बैठी हुई है, जिसे छिपी हुई पितृसत्तात्मक सोच के आलोक में देखना होगा। जहां मां ,पत्नी, बेटी को महिमामंडित कर उनसे उनका पूरा अस्तित्व समर्पित करने की अपेक्षा की गई है। यह छिपी हुई पितृसत्तात्मक मानसिकता प्रेम, त्याग, उदारता, बलिदान, दैवीय गुणों की अपेक्षा के आवरण में हमारे भीतर छिपी हुई है। फ़िल्मी गीतों के शब्दजाल को काट वास्तविकता को समझने का यह मेरा छोटा सा प्रयास है। सिनेमा और साहित्य की भाषा में तकनीकी अंतर है जहां साहित्य की भाषा की रचनात्मकता से समझौता नहीं करती, वहीं फ़िल्मी गीतों की भाषा संगीत या धुनों पर निर्भर होती है। साहित्य की भाषा संवेदना पर अधिक बल देती है। विषय को मार्मिक बनाना उसका उद्देश्य रहता है जबकि गीतों की भाषा लोकप्रियता के मानदंडों के अनुकूल फूहड़ता की चरम तक भी पहुंच जाती है। “चोली के पीछे क्या है, आज करूंगा तेरे साथ गन्दी बात, इश्क कमीना” हां साहिर, नीरज, कैफ़ी, गुलजार, आनंद बक्षी, शैलेन्द्र, मजरूह सुलतान पुरी जैसे गीतकारों ने भाषा के सुंदर प्रयोग किए हैं लेकिन मानसिकता पुरुषवादी ही है। इसलिए उनके गीत स्त्री जीवन में कुछ क्रांतिकारी परिवर्तन ला पाते संभव न हो पाया। यह तथ्य भी किसी से छिपा नहीं की पूरा का पूरा फिल्म उद्योग पुरुषों के कब्जे में है। यदि कोई स्त्री फिल्म बनाना चाहे तो पैसा लगाने वाला अधिकतर पुरुष ही होता है ओर पूंजीपतियों के सामाजिक सरोकार नहीं ही होते फिर स्त्री के सरोकार कहां सम्भव है।   

स्त्री की तुलना कभी चांद, कभी फूल आदि से की गई, यह तो उसकी सुंदरता का पैमाना भर है यानी उसकी देह फूलों जैसी कोमल, नाजुक, वह मासूम हो, चांद सी चमकदार हो। यह है तो पुरुष की आवश्यकता के अनुकूल, उसकी ज़रूरत है स्त्री की देह ऐसी नाज़ुक हो वरना वह विवाह संस्था में फिट नहीं बैठ पाएगी। आपको क्या लगता है यह विवाह संस्था स्त्री की आर्थिक स्वतंत्रता के बाद कमजोर पड़ गई, नहीं इसे और मजबूत बना दिया गया है चाहे वह कितना ही कर ले “मुझे दफ्तर को देर हो रही जरा जल्दी से काफी बनाना बीवी हूं मैं बावर्ची नहीं मुझे आता नहीं कॉफ़ी बनाना” और यह तब है जब दोनों को ऑफिस जाना है। आर्थिक स्वतंत्रता कहूं या और ज्यादा जिम्मेदारियों का बोझ लेकिन आत्मनिर्भर होने के बाद भी पुरुष परमेश्वर का उसके जीवन में होना अनिवार्य है क्योंकि विवाह संस्था में पंजीकरण अनिवार्य है। स्त्री के लिए विवाह एक ऐसी जीवन पॉलिसी है जिसका भुगतान वह पल-पल करती है और बाजार ने इसकी अनिवार्यता को और अधिक पुख्ता किया है। फ़िल्मी दुनिया के वैवाहिक गीत, लोक गीतों के धरातल से बिलकुल विपरीत यूटोपिया का निर्माण करने लगे हैं। विवाह स्त्री और पुरुष के लिए कितना ज़रूरी या गैर-ज़रूरी है इस पर कोई बात नहीं होती बल्कि स्त्री की आकांक्षाओं, महत्वकांक्षाओं, हसरतों को बाजार ने अपने हिसाब से निर्मित कर दिया है। वह तो प्रेम में सराबोर होना चाहती है जिसे दुनिया तोहमत कहती है। उसका वह तोहमत उठाने को जी चाहता है लेकिन बाज़ार की चकाचौंध में उसे सजने-संवरने के जो कारण पैदा किए हैं वो तो मानो विवाह जैसी संस्था में पंजीकृत होकर ही में ही पूरे हो सकते हैं।

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ऐसा उसके मन में बिठा दिया गया है, “सजना है मुझे सजना के लिए “, “ये तेरा सजना संवरना बिन साजन के बेकार है” यानी वो अपने मन से सज भी नहीं सकती विवाह के समय ब्यूटी पार्लर्स में जो लाखों के पकैज़ उपलब्ध हैं उसका अनुभव हर लड़की लेना चाहती है और ये लोभ मोह को बढ़ावा देता है। फ़िल्मी गीतों का नकली संसार। “मेरे हाथों में हरी-हरी चूड़ियां मुझे भा गई हरी है चूड़ियां, देख मिलती हैं तेरी -मेरी चूड़ियाँ ,तेरे जैसी सहेली मेरी चूड़ियां, गोरी घूंघट में मुखड़ा छुपाओ न ये तो नैना लड़ाने की रात है। ” यश चोपड़ा, सूरज बड़जात्या, करन जौहर आदि फिल्म्कारों ने तो अति कर दी है। “मेरे हाथों में नौ-नौ चूड़ियां हैं, कोई सहरी बाबू दिल लहरी बाबु पग बांध गया घुंगरू मैं छम छम नचदी फिरा” उसको शादी ब्याह के नाम पर श्रृंगार के नाम पर इतना भाव चढ़ा दिया कि वह तन-मन की सुध गंवा बैठी और उसे इस बात का भी गिला नहीं कि इस संस्था द्वारा उसके अस्तित्व का बचा हुआ लाड़-प्यार जो मां के घर में था एक पल में तिरोहित हो जाने वाला है। उसे ससुराल जाने के लिए ही तैयार किया जाता है , उसकी मानसिकता किसी ‘ऐप’ की तरह काम करने लगती है जिसका निर्माता एक पुरुष है।

स्त्री की तुलना कभी चांद, कभी फूल आदि से की गई, यह तो उसकी सुंदरता का पैमाना भर है यानी उसकी देह फूलों जैसी कोमल, नाजुक, वह मासूम हो, चांद सी चमकदार हो। यह है तो पुरुष की आवश्यकता के अनुकूल, उसकी ज़रूरत है स्त्री की देह ऐसी नाज़ुक हो वरना वह विवाह संस्था में फिट नहीं बैठ पाएगी।   

समय के साथ-साथ स्त्री ने सुंदरता के झांसे से निकलना आरंभ किया और उसने कहा कि मैं कोई चांद-वांद नहीं हूं, मुझमें सूरज सा तेज है। “शोला-शोला, शोला से डरना” सिलसिला का यह गीत पुरुषों को रास नहीं आया। पहली पहली बार देखा ऐसा जलवा, ये लड़की है या शोला। अब एक लड़की में प्रखरता, तीक्ष्णता, तेवर, अब पुरुष कैसे बर्दाश्त करेगा। “लुटे न जवानी में जो शोलों का मज़ा तो बोलो वो आदमी है क्या, यानी आदमी के लिए स्त्री मज़े लेने के लिए ही है और कोई भावना नहीं कोई अस्तित्व नहीं। “आंखों में गुस्सा है, लबों पर गाली है” विनम्र झुकी आखों वाली मौन लड़की का गुस्सा और गाली कैसे बर्दाश्त करेगा। भले ही गालियां उनके खुद के मुखश्री से तकियाकलाम की तरह निकलती हैं जो स्त्री अंगों का अपमान करने वाली ही होती हैं। “खुद को क्या समझती है, इतना अकड़ती है, लड़की है या छड़ी है पटाखे की लड़ी, शोला है फुलझड़ी है, देखो यारों, देखो खुद को समझती है क्या.. हमने खाई है कसम तोड़ेंगे इसका गुरूर हम” और 90 के दशक में भी अगर लड़की कॉलेज जा रही है तो वह किसी काम से नहीं जाएगी क्योंकि “आई है कॉलेज में पढ़ने के लिए जब देखो तैयार है लड़ने के लिए” इसलिए भी माता-पिता, रिश्तेदार कहते थे कि लड़की कॉलेज जाएगी तो बिगड़ जाएगी।

आमिर खान और माधुरी दीक्षित की फिल्म “दिल” में लड़की के गुरूर को तोड़ने की बात की गई है। फिर बाद में शाहिद कपूर जैसा सिरफिरा गा लेता है “आज करूंगा तेरे साथ गंदी बात” सारी हदें उसने तोड़ डाली एक लड़की के लिए उसके मन में जो भी विकृतियां हैं, वह मानसिकता इस गीत में दिख जाती है। वास्तव में यही मानसिकता है हर पुरुष की एक स्त्री को लेकर। वह या तो उसके आगे झुक जाए वरना वह तेज़ाब का सामना करे। आज भी फ़िल्मी संसार पितृसत्तात्मक सोच से अलग फ़िल्में नही बनाता। अगर स्त्री आज़ाद ख्याल हो रही है तो सारा श्रेय उसकी देह को ही दिया जाता है। तभी जब कभी प्यार में अगर ब्रेकअप होता है तो वह मेकअप से दर्द को छिपा लेती है, “दिल पे पत्थर रख के मुंह पे मेकअप कर लिया ..मेरे सैंया जी से आज मैंने ब्रेकअप कर लिया ।” पूरे गीत में ब्रेकअप के सेलिब्रेशन में उसका दर्द भी दिखाई देगा। अब यदि उस प्रेमी से उसका विवाह हो जाता तो? वह स्त्री स्वयं को पुरुष के चरणों में अर्पित कर ,पूर्णतया समर्पित होकर, सौभाग्यवान मानती और उसके जीवन का एकमात्र लक्ष्य पितृसत्तात्मक समाज की मान्यताओं पर खरा उतरना बाकी रह जाता।

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भाषा का समाजशास्त्र और गीतों की भाषा पर विचार करें तो हर समाज की एक भाषा होती है और हर भाषा के अपने सामाजिक संदर्भ होते है इसलिए कोमल, लज्जा समर्पण, त्याग की मूर्ति, छुईमुई आदि जैसे शब्दों के संदर्भ स्त्री से जुड़ते हैं जबकि वीर, शौर्य, बल, युद्ध आदि शब्द सुनते ही पहले पुरुष की छवि आती है। फिल्मों में गीतों की भाषा की बात करें तो वे भी अपवाद नहीं हैं। हमारे फ़िल्मी गीत हमारे जन-मानस में रचे बसे हैं और गीतों में हमारा समाज। “सिमटी सी शरमाई सी” “आपकी नज़रों ने समझा प्यार के काबिल हमें, भला है बुरा है जैसा भी है मेरा पति मेरा देवता है, तुम गगन के चंद्रमा हो मैं धरा की धुल हूं, “जैसे गीत यदि स्त्री की सामाजिक दशा, मनोदशा को प्रकट करते हैं तो “ज़रूरत है ज़रूरत है इक श्रीमती की, सेवा करे जो पति की, चांद-सा रोशन चेहरा, जुल्फों का रंग सुनहरा, भीगे होंठ तेरे प्यासा दिल मेरा, रूप तेरा मस्ताना, जैसे सैकड़ों गीत पुरुष की उस मानसिकता को ही प्रकट करते हैं जहां वह स्त्री को भोग के अतिरिक्त कुछ नहीं मानता। इक बुत बनाऊंगा तेरी और पूजा करूंगा, जैसे गीतों में जड़ देवीरूप की कामना करता है पर सामाजिक समानता की चाहना रखने वाले गीत हमें कम ही मिलेंगे “थोड़ा तुम्हारा थोड़ा हमारा आएगा फिर से बचपन हमारा, हम दोनों मिल के कागज़ के दिल पे” आदि लेकिन स्त्री की आशंकाएं हमेशा साफ़ झलकती हैं, उदाहरण के तौर पर, “तेरा मेरा प्यार अमर फिर क्यों मुझकों लगता है डर, लग जा गले कि फिर ये हसीं रात हो न हो” आदि आदि। 

 “जिस पथ पर चला उस पथ पर मुझे आंचल तो बिछाने दे” गाने वाली7 नायिका को क्या इतना भी सहज ज्ञान नहीं कि उसने अपने पद को कितना गिरा दिया, लेकिन पुरुषवादी सोच चाहे महिला हो या पुरुष वाह-वाह कर रहा है क्योंकि उसे इसी प्रकार की नारी की अपेक्षा है। वहीं, नायक गाता है, “तू जो मेरे सुर में सुर मिला ले तो जिंदगी हो जाए सफल“, यानी स्त्री को ही पुरुष के सुर में सुर मिलाना होगा वह अपना कोई सुर बना सकती और सुर /समझौता तो स्त्री करे लेकिन जीवन किसका सफल हो रहा है पुरुष का। नायक नायिका के लिए सात रंग के सपने ही बुन सकता है यथार्थ की दहलीज पर आते ही उसके होश फाख्ता हो जाते हैं और नायिका को गाना पड़ता “है मोसे छल कि यह जाए हाय रे हाय सैयां बेईमान” बेईमान सैया के तो कई गीत है बावजूद इसके उसका समर्पण खत्म नहीं होता।

स्त्री के संबंध में पुरुष सीधा कहता है, जो रोज यूं ही जाओगी तो किस तरह निभाओगी,  थोड़ी देर जी तो लूं, नशे के घूंट पी तो लूं. यानी स्त्री का साथ उसके लिए एक नशे से बढ़कर कुछ नहीं। वह बार-बार कह रही है कि मुझे जाने दो लेकिन नायक कोई जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं। हां, आने वाले समय में सोच में बदलाव आया तो है जैसे कि नायक कहता है “बहुत खूबसूरत मगर सांवली सी” “मगर” शब्द सांवले रंग के प्रति हमारी सोच की धज्जियां उड़ा  देता है लेकिन गीत इतनी खूबसूरती से फ़िल्माया गया है, मधुर है कि हमारा ध्यान उसपर नहीं जाता। पूरा गीत एक सांवली लड़के के मन की बात कहता है जो मासूम और नाजुक (कमजोर) है, वह सपने देखने में भी इसलिए डर रही है क्योंकि वह सांवली है पर हम उस गीत को एन्जॉय करके रह जाते हैं। एक महत्त्वपूर्ण तथ्य यह भी है की नायक गोरे रंग का लड़का है पर उसका सांवली लड़की की ओर आकर्षित होना सौन्दर्य के प्रतिमानों को तोड़ता भी है परंतु तुलना में यह कम है। फिल्मी गीतों में मां और बहन की छवियों की बात फिर कभी।

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तस्वीर साभार : Youtube

(यह लेख डॉ रक्षा गीता ने लिखा है, जो दिल्ली विश्वविद्यालय में सहायक आचार्या हैं)

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